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तिमाही में एफपीआई ने की 3 अरब डॉलर की निकासी

दीपक कोरगांवकर और पुनीत वाधवा / मुंबई/नई दिल्ली October 08, 2019

कैलेंडर वर्ष 2019 की तीसरी तिमाही में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा (3 अरब डॉलर) की निकासी की, जो अक्टूबर-दिसंबर 2016 की तिमाही के बाद का सर्वोच्च स्तर है और तब उन्होंने इक्विटी बाजार से 31,222 करोड़ रुपये (4.6 अरब डॉलर) की निकासी की थी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने जुलाई और 26 सितंबर के बीच शुद्ध रूप से 21,592 करोड़ रुपये (3.09 अरब डॉलर) के शेयरों की बिकवाली की और यह जानकारी डिपॉजिटरी के आंकड़ों से मिली। हालांकि निकासी की रफ्तार धीमी पड़ी जब सरकार ने कंपनी कर की दर में कटौती का ऐलान किया। यह कैलेंडर वर्ष 2019 की पहली दो तिमाहियों के उलट है जब उन्होंने लगातार दूसरी बार नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार बनने की उम्मीद के बीच 79,080 करोड़ रुपये (11.3 अरब डॉलर) का शुद्ध निवेश किया था।

 
क्रेडिट सुइस वेल्थ मैनेजमेंट के भारतीय इक्विटी शोध प्रमुख जितेंद्र गोहिल ने इक्विटी शोध विश्लेषक प्रेमल कामदार के साथ एक रिपोर्ट में कहा है, 5 जुलाई के बजट के बाद एफपीआई की निकासी बढ़ी थी क्योंकि बढ़त की रफ्तार कमजोर थी और कंपनियों की आय में भी सुस्ती थी। आने वाले समय में भारतीय इक्विटी में तेजी दिख सकती है खास तौर से जब अक्टूबर में आरबीआई ब्याज दरों में कटौती करे और नरम रुख अख्तियार करे। सितंबर 2019 में 3 फीसदी की बढ़त के बावजूद तिमाही के दौरान एफपीआई की बिकवाली से बेंचमार्क सूचकांकों एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स और निफ्टी-50 में क्रमश: 2 व तीन फीसदी की गिरावट आई है और इस तरह से कैलेंडर वर्ष 2019 की तीसरी तिमाही में नकारात्मक रिटर्न दर्ज किया।
 
हालांकि ज्यादातर ब्रोकरेज का नजरिया मध्यम से लंबी अवधि के लिहाज से भारतीय इक्विटी को लेकर तेजी का है और उन्होंने मुख्य सूचकांकों के लिए छह व 12 महीने के लक्ष्य में बदलाव किया है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी कर की दर में कटौती और अन्य राहत पैकेज के चलते हुआ है। उन्हें नहीं लगता कि एफपीआई जल्दी ही भारतीय बाजार लौटने वाले हैं। उदाहरण के लिए इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च को लग रहा है कि वैश्विक मौद्रिक नीतियों के अनुकूल रुख और उच्च अधिभार को लेकर अनिश्चितता दूर करने की सरकार की कोशिश के बावजूद अल्पावधि से मध्यम अवधि में भारत में एफपीआई निवेश में अवरोध बना रहेगा।
 
उन्होंने हालिया रिपोर्ट में कहा है, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मांग में उम्मीद के मुकाबले सुस्त रफ्तार, भूराजनैतिक व व्यापार तनाव और भारत में आर्थिक रफ्तार में आई धीरे-धीरे कमजोरी ने भी जोखिम में योगदान दिया है, जिसने उभरते बाजार में ऋण प्रतिभूतियों की मांग को अवरूद्ध किया है। डाल्टन कैपिटल के प्रबंध निदेशक यू आर भट्ट की राय भी ऐसी ही है और उन्होंने चेतावनी दी है कि अगले छह महीने में निवेश में नाटकीय रूप से तेजी शायद ही आएगी।
Keyword: FPI, invest, equity,,
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