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समुद्री मालभाड़े पर आईजीएसटी का मामला न्यायालय में पहुंचा

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली October 08, 2019

भारत में समुद्री मार्ग से माल लाने को लेकर दो विदेशी पक्षों में हुए समझौते के बाद आने वाली लागत पर एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) लगाए जाने के मामले को लेकर आयातकों ने न्यायालय में याचिका दायर की है। इस लागत को तकनीकी रूप से समुद्री मालभाड़ा कहा जाता है। आयातकों की दिल्ली और मुंबई में याचिका लंबित है। वहीं गुजरात उच्च न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर ली है और अपना फैसला सुरक्षित रखा है। आयातकों को लगता है कि इससे विवादास्पद मसले पर स्थिति कुछ साफ हो सकेगी। 
 
खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर और याचियों के वकील अभिषेक रस्तोगी ने कहा, 'समुद्री माल भाड़े पर दो प्रवासी के बीच लेनदेन पर कर संवैधानिक क्षेत्र से परे है और उम्मीद है कि जल्द ही इस पर विवाद खत्म हो जाएगा।' सीजीएसटी अधिनियम के एक प्रावधान में अनुमति दी गई है कि लागत, बीमा और भारत में लाए जाने वासे सामान पर मालभाड़े (सीआईएस) पर बुनियादी सीमा शुल्क और आईजीएसटी दोनों लगाया जा सकता है। साथ ही इन सामानों की आवाजाही के लिए दो विदेशी पक्षों के बीच समुद्री मालभाड़े पर भी आईजीएसटी लगाया जा सकता है।
 
मान लीजिए कि कोई माल पहले वाशिंगटन से लंदन आता है और उसके बाद मुंबई भेजा जाता है। ऐसे में वाशिंगटन और लंदन के बीच मालभाड़े में दो पक्ष शामिल होते हैं। इस लागत में स्टीमशिप कॉस्ट, ब्रोकर का कमीशन, शुल्क, वेसल और पोर्ट के रखरखाव की लागत, मजदूरी आदि शामिल होती है।  रस्तोगी का कहना है कि न्यायालय जाने वाले पक्षों का तर्क यह है कि जब सीआईएफ वैल्यू पर बुनियादी सीमा शुल्क और आईजीएसटी का भुगतान पहले ही कर दिया जाता है तो ऐसे में समुद्री मालभाडे पर एक और कर क्यों होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे दोहरा कराधान होगा क्योंकि समुद्री मालभाड़ा भी सीआईएफ में शामिल होता है। इसके अलावा यह भी मसला है कि दो विदेशी पक्षों के बीच लेनदेन में भारतीय पक्ष कैसे शामिल हो सकता है। 
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