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अब भी 19वीं सदी में अटके जल-उपयोग कानून

मिहिर शाह /  October 08, 2019

लोकप्रिय मगर गलत समझा गया नजरिया यह है कि पानी को केंद्रीय विषय बनाने से भारत के जल संसाधन का बेहतर प्रबंधन किया जा सकेगा। इसकी अहमियत बता रहे हैं मिहिर शाह

 
केंद्र सरकार की तरफ से भारत में पानी संबंधित कानूनों में तत्काल सुधार के लिए गठित समिति की मैंने वर्ष 2015 में अध्यक्षता की थी। भारतीय संविधान में पानी को राज्य का विषय बनाया गया है। भारत में यह धारणा काफी लोकप्रिय रही है कि पानी को केंद्रीय सूची का विषय बनाने से राष्ट्रीय जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकेगा लेकिन यह दोषपूर्ण नजरिया है। हमारी समिति ने इससे अलग रुख अपनाया। एक साझा एवं समान संसाधन के तौर पर पानी की अलग प्रकृति को देखते हुए और जल प्रबंधन की सभी सफल कोशिशों के आधार पर हमने आनुषंगिकता का सिद्धांत अपनाने की वकालत की जिसमें समाधान को समस्या के बेहद करीबी स्तर पर लाने की जरूरत होती है। लिहाजा जल प्रबंधन को हरसंभव स्तर तक विकेंद्रीकृत करने की जरूरत है, जल विवादों के समाधान में प्राथमिक हितधारकों को शामिल किया जाए और संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधन में रेखांकित बिंदुओं को भी ध्यान में रखा जाए।
 
हालांकि उसी समय हमने यह भी माना कि हर दिन पानी को लेकर संघर्ष बढऩे और सघन होने से साझा रवैये और सिद्धांतों के बारे में एक व्यापक राष्ट्रीय मसौदा बनाने की फौरी जरूरत है ताकि पानी का विवेकपूर्ण एवं सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण इस्तेमाल किया जा सके। इसी के साथ संदर्भ-आधारित विवरण में लचीलेपन की भी गुंजाइश रखनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 249 संसद को यह अधिकार देता है कि राष्ट्रीय हित में वह राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। इस तरह समिति ने राष्ट्रीय जल प्रारूप कानून (एनडब्ल्यूएफएल) का एक मसौदा तैयार किया। हमने बेहद सावधानी से यह प्रस्ताव रखा था कि एनडब्ल्यूएफएल को संविधान के अनुच्छेद 252(1) के तहत विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जिसके मुताबिक दो या अधिक राज्यों की विधानसभाएं इस तरह का कानून पारित कराने के लिए संसद को अधिकृत कर सकती हैं। यह एक प्रारूप कानून है और इसका मकसद जल प्रबंधन को केंद्रीकृत करना या पानी को लेकर संवैधानिक स्थिति बदलना नहीं है। इसके स्थान पर यह कानून पानी के संरक्षण, विनियमन और प्रबंधन के सिद्धांतों का एक व्यापक राष्ट्रीय विधिक ढांचा मुहैया कराता है। यह केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन निकायों द्वारा विधायी एवं कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग को नियमित करेगा।
 
एनडब्ल्यूएफएल एक ऐसा नजरिया अपनाने पर जोर देता है जिसमें आम जनजीवन में पानी को केंद्रीय एवं बहुआयामी जगह दी गई है। यह कहता है, 'पानी भारत के लोगों की साझा विरासत है, अपने सभी रूपों में जीवन के वजूद के लिए आवश्यक है, पारिस्थितिकी प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है, आजीविका के लिए बुनियादी जरूरत है, सफाई का एक एजेंट है, कृषि और उद्योग एवं वाणिज्य जैसी आर्थिक गतिविधियों का जरूरी अंग है, परिवहन एवं मौजमस्ती का एक साधन है, जन-समूह, समाज, इतिहास एवं संस्कृति का अविभाज्य अंग है, और कई संस्कृतियों में कुछ हद तक दैवीय मान्यता होने से इसे पवित्र भी माना जाता है।' अमूमन ऐसी सोच नदारद रही है लेकिन भारत में जल नीति एवं कार्यक्रमों का खाका तैयार करते समय इसे मार्गदर्शक माना जाना चाहिए। 
 
यह कानून उच्चतम न्यायालय द्वारा पानी के बारे में दिए गए सभी अहम फैसलों को समाहित किए हुए है, जैसे कि सार्वजनिक न्यासिता का सिद्धांत और पानी के अधिकार की स्वीकृति। उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि 'हमारी विधिक प्रणाली में सार्वजनिक न्यासिता सिद्धांत भी अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा है। राज्य लोक-उपयोग एवं मनोरंजन के निमित्त सभी प्राकृतिक संसाधनों का न्यासी है।' सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि पानी इंसानों के वजूद के लिए बुनियादी जरूरत है और अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार एवं मानवाधिकार का हिस्सा है। इस तरह एनडब्ल्यूएफएल के मुताबिक, पानी भारत के लोगों की साझा विरासत है, जल एवं सभी संबद्ध पारिस्थितिकियों के संरक्षण के लिए सार्वजनिक न्यास में निहित और सबके लिए तर्कपूर्ण निषेधों का विषय है। इसके अलावा राज्य पानी का सभी स्तरों पर जनता का सार्वजनिक न्यास है और सबके फायदे के लिए एक न्यासी के रूप में पानी को संरक्षित के प्रति आबद्ध है।
 
नतीजतन, एनडब्ल्यूएफएल पानी का मुद्दा 21वीं सदी में लेकर आता है जो पानी के बारे में उभरती वास्तविकता, समझ एवं नजरिये को परिलक्षित करता है। विश्वास करना मुश्किल हो सकता है लेकिन हमारा भूजल अब भी 19वीं सदी में बने ब्रिटिश कानूनों से संचालित होता है जिनके प्रावधान जल उपलब्धता में असमानता बढ़ाने और जल उपयोग में असंवहनीयता बढ़ाते हैं। पूर्ण प्रभुत्व का सिद्धांत भूस्वामियों को यह अधिकार देता है कि उनकी जमीन के नीचे का समूचा पानी उनका है। भूजल की कानूनी स्थिति जमीन की चल संपत्ति के बारे में कुछ ऐसी है: जमीन का स्वामित्व रखने वाले लोग उसकी खुदाई कर सकते हैं और अगर खुदाई के क्रम में वह अपने पड़ोसी के कुएं में जमा पानी को बिखेर देता है तो यह कृत्य चोट-रहित नुकसान के दायरे में ही आता है और उस आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
 
अब इसे जल-विज्ञान के जरिये अधिक बेहतर ढंग से समझा जा सकता है कि किसी भी भूखंड के नीचे मौजूद पानी को रिचार्ज के तौर पर नहीं निकाला जा सकता है। अधिकांश जलाशयों के रिचार्ज क्षेत्र उस जलभंडार स्थल का केवल एक हिस्सा भर होता है। इस तरह कई मामलों में किसी भी जमीन के नीचे बह रहे पानी को थोड़ा दूर स्थित जमीन से एक जलाशय को रिचार्ज करना होगा। जब कई लोग एक ही समय पर भूमिगत जल का दोहन करते हैं तो पंपिंग के अलग केंद्रों के बीच जटिल व्यवधान की स्थिति पैदा होने लगती है। भारत में यह बात काफी आम है क्योंकि यहां पर कुएं एक-दूसरे के काफी करीब स्थित हैं। जलस्तर में गिरावट इसी तरह आई है और इसके दुष्परिणामों के खिलाफ कोई विधिक संरक्षण उपलब्ध नहीं होने से करोड़ों लोगों की जिंदगी एवं आजीविका खतरे में पड़ गई है। इसीलिए हमारी समिति ने मॉडल भूजल संरक्षण प्रबंधन विधेयक 2016 का भी मसौदा तैयार किया था जिसमें एनडब्ल्यूएफएल के सिद्धांतों का ही इस्तेमाल किया गया है। यह तर्कसंगत उपयोग के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस तरह से भूजल का इस्तेमाल कर रहा है कि दूसरे लोग पानी के अधिकार से वंचित हो जाते हैं तो उसे गैरकानूनी माना जाएगा। इन कानूनी सुधारों एवं उपायों के बगैर हम पानी की अहमियत को लेकर किए गए बेहतरीन प्रयासों को नजरअंदाज कर सकते हैं। यह नया कानूनी परिप्रेक्ष्य भारत में जल प्रबंधन की दिशा में नवाचार लाने का आधार साबित हुआ है।
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: water, crisis, river,,
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