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भारतीय दुग्ध उद्योग कर रहा आरसीईपी व्यापार समझौते का विरोध

संजीव मुखर्जी /  October 08, 2019

भारत में उपभोक्ता जिस कीमत पर दूध खरीदते हैं, उसका 70 फीसदी से अधिक हिस्सा सीधे किसानों को जाता है। इसकी वजह ऑपरेशन फ्लड प्रथम और द्वितीय के दौरान स्थापित की गई अनोखी सहकारी व्यवस्था है। जैसे-जैसे भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) के तहत अपनी वार्ता की स्थिति को अंतिम रूप देने के करीब पहुंच रहा है, भारतीय दुग्ध उद्योग ने इसके खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया है। उसका कहना है कि सीमा शुल्क में कमी से उसके हितों का व्यापक नुकसान होगा। 

 
आरसीईपी भारत का अब तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी व्यापार समझौता है। आसियान ब्लॉक के दस देशों के साथ भारत के मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर आधारित आरसीईपी में वे सभी देश शामिल होंगे जिनका आसियान के साथ व्यापार समझौता है। इनमें भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और भारतीय दुग्ध उद्योग की दृष्टि से सबसे अहम न्यूजीलैंड शामिल होंगे। बातचीत इस मुद्दे पर केंद्रित है कि न्यूजीलैंड को भारत में तेजी से बढ़ रहे दुग्ध उत्पादों के बाजार के साथ-साथ शराब, सेब और कीवी के बाजार में उतरने की अनुमति दी जाएगी और इसके बदले में न्यूजीलैंड अपने यहां भारतीय पेशेवरों (नर्स, चार्टर्ड अकाउंटेंट और आईटी विशेषज्ञ) के लिए नियमों को आसान बनाएगा। लेकिन दोनों देशों के दुग्ध उद्योग में भारी अंतर के कारण यह लेनदेन थोड़ा ज्यादा जटिल है। 
 
न्यूजीलैंड दुग्ध और दुग्ध उत्पादों का दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक है। इंटरनैशनल ट्रेड सेंटर के मुताबिक 2018 में वैश्विक निर्यात में न्यूजीलैंड की करीब 20 फीसदी यानी 5.4 अरब डॉलर की हिस्सेदारी है। इसकी तुलना में भारत का निर्यात कुछ भी नहीं है। अभी भारत में अधिकांश दूध और दुग्ध उत्पादों के आयात पर 64 फीसदी सीमा शुल्क लगता है। इसमें 60 फीसदी सीमा शुल्क और 4 फीसदी काउंटरवेलिंग ड्यूटी शामिल है। भारतीय दुग्ध उद्योग की दलील है कि सीमा शुल्क में कमी से करीब 10 करोड़ ग्रामीण परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुग्ध कारोबार से जुड़े हैं। भारत में यह क्षेत्र पूरी तरह से असंगठित है। इनमें से 77 फीसदी परिवारों में छोटे और सीमांत किसान शामिल हैं। 
 
भारत में उपभोक्ता जिस कीमत पर दूध खरीदते हैं, उसका 70 फीसदी से अधिक हिस्सा सीधे किसानों को जाता है। इसकी वजह ऑपरेशन फ्लड प्रथम और द्वितीय के दौरान स्थापित की गई अनोखी सहकारी व्यवस्था है। भारत में कभी दूध की भारी कमी थी लेकिन इन अभियानों के कारण भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन पाया। न्यूजीलैंड में उपभोक्ता दूध की जो कीमत चुकाते हैं उसमें किसानों की हिस्सेदारी 30 फीसदी है और दुग्ध उद्योग में केवल 20,000 किसान जुड़े हैं। इनमें से कई के पास जो जमीन है वह भारत के किसानों से कई गुना ज्यादा है। न्यूजीलैंड अपने वार्षिक दुग्ध उत्पादन का करीब 93 फीसदी निर्यात करता है जो करीब 2.05 करोड़ टन है। भारतीय दुग्ध कंपनियों का कहना है कि अगर न्यूजीलैंड अपने सालाना दूध और दुग्ध उत्पादों का केवल 5 फीसदी भी भारत को निर्यात करता है तो यह मात्रा भारतीय उत्पादों की कीमतों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त होगी। मोटे अनुमानों के मुताबिक न्यूजीलैंड के महंगे दुग्ध उत्पादों का सालाना निर्यात का महज 5 फीसदी भारत में सभी तरह के दूध और दुग्ध उत्पादों के 28 फीसदी बाजार को कब्जाने के लिए पर्याप्त होगा। इसमें स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी), चीज और बटर भी शामिल है। 
 
जाहिर है कि सीमा शुल्क घटाने के खिलाफ कई तर्क हैं। अगर देश में सस्ते आयात की अनुमति दी गई तो भारतीय दुग्ध कंपनियों को दूध खरीद की अपनी कीमतों में कटौती करनी पड़ेगी क्योंकि एसएमपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भारतीय कीमतों से बहुत कम है। इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 160 से 170 रुपये प्रति किलो है जबकि भारत में यह 280-290 रुपये किलो है। मान लीजिए कि एक किलो एसएमपी बनाने में 10 किलो दूध लगता है तो खरीद को आयात के साथ प्रतिस्पद्र्घी बनाने के लिए भारत में दूध खरीद कीमत 10-11 रुपये प्रति लीटर होनी चाहिए। यह छोटे दुग्ध किसानों के लिए भयावह होगा जो कई सालों तक कीमतों के कम रहने के बाद पिछले कुछ सप्ताह में खरीद दरों में मामूली बढ़ोतरी के कारण उम्मीद पाले हुए हैं। 
 
अगर खरीद कीमतों में गिरावट आती है तो भारतीय किसानों को करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। ग्रामीण क्षेत्र में इसके गंभीर नतीजे होंगे। एनएसएसओ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2003 से 2013 के बीच पशुपालन से आमदनी 14.3 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर से बढ़ी। देश की कुल कृषि उपज में दुग्ध उद्योग की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी (7 लाख करोड़ रुपये) है और यह दुनिया की सफल दास्तानों में शुमार है। 1997 से दुनिया में दूध का उत्पादन 2 फीसदी की वार्षिक चक्रवृद्घि दर से बढ़ा जबकि भारत में इसकी रफ्तार 4.5 फीसदी रही। 
 
आरसीईपी वार्ता की अगुआई कर रहे वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों को दुग्ध क्षेत्र की आशंकाएं निर्मूल लगती हैं। आरसीईपी वार्ता में शामिल एक वार्ताकार ने कहा, 'भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है। कुछ श्रेणियों में महंगे विदेशी उत्पादों का आयात बढ़ सकता है लेकिन इस बात की कोई वजह नहीं है कि पूरा क्षेत्र इससे प्रभावित होगा।' दुग्ध उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उन्हें यह तर्क हजम नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा, 'अगर दलील यह है कि महंगे दुग्ध उत्पादों का आयात बढ़ जाएगा तो फिर उन पर सीमा शुल्क कम करने की क्या जरूरत है। कुछ लोग ही इनका इस्तेमाल करते हैं।' कुल मिलाकर यह पेचीदा मामला है। सरकार भारतीय पेशेवरों और छोटे तथा सीमांत किसानों में से किसी तरजीह देगी? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्ता के गलियारों में किसकी बात सुनी जाती है।
Keyword: milk, dairy, RCEP,,
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