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पीएम-किसान के बजाय राज्यों की किसान योजनाओं की गहरी पैठ

अभिषेक वाघमारे और संजीव मुखर्जी /  October 08, 2019

पंजाब के तरनतारन के एक किसान मंजीत सिंह (बदला हुआ नाम) यह नहीं समझ पा रहे हैं कि देश भर में लागू नकदी हस्तांतरण योजना प्रधानमंत्री कृषि सम्मान निधि योजना (पीएम-किसान) के तहत मिलने वाली रकम की तीसरी किस्त उन्हें क्यों नहीं मिल पा रही है। उनकी तीसरी किस्त को उनकी मातृभाषा के कारण खारिज कर दिया गया। उनका आधार सत्यापन विफल हो गया क्योंकि संबद्ध बैंक के रिकॉर्ड अंग्रेजी में थे जबकि आधार की जानकारी गुरुमुखी में। पीएम-किसान के तहत 2,000 रुपये की तीसरी किस्त को हासिल करने के लिए आधार सीडिंग यानी आधार को बैंक एवं योजना से लिंक करना अनिवार्य है। लेकिन मंजीत इन समस्याओं से जूझने वाले एकमात्र किसान नहीं हैं। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 20 सितंबर तक आधार सत्यापन में समस्याओं के कारण तीसरी किस्त के करीब 3.61 करोड़ लेनदेन विफल हो गए। तीसरी किस्त अगस्त से नवंबर 2019 की अवधि के लिए है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'कुछ जगहों से हमें शिकायत मिली है कि लाभार्थी के आधार और बैंक खाते में नाम को अलग-अलग तरीके से लिखा गया है। इससे सीडिंग प्रक्रिया बाधित हो रही है और नकदी का हस्तांतरण नहीं हो पा रहा है।'

 
इस योजना की वेबसाइट से पता चलता है कि अब तक (7 अक्टूबर तक) 7.3 करोड़ पंजीकृत लाभार्थियों में से लगभग 24 फीसदी लाभार्थियों को ही तीसरी किस्त की रकम मिली है। अधिकारियों कहना है कि इस योजना का दायरा बढ़कर अब 8.6 करोड़ लाभार्थियों का हो चुका है। हालांकि अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि इस प्रकार की बाधाएं नवंबर तक दूर हो जाएंगी। इस प्रकिया को दुरुस्त करने के लिए सुधार एवं त्वरित सीडिंग के लिए एक वेब विकल्प तैयार किया जा रहा है। लेकिन आधार सीडिंग में समस्या पीएम-किसान योजना के तहत नकदी हस्तांतरण की रफ्तार सुस्त पडऩे का महज एक कारण है। यहां तक कि दूसरी किस्त (अप्रैल से जुलाई) में भी महज 57 फीसदी लाभार्थियों को ही नकदी हासिल हुई जबकि उस समय आधार सीडिंग को अनिवार्य नहीं किया गया था।
 
पीएम-किसान के मुकाबले ओडिशा की कालिया योजना और तेलंगाना की रैयत बंधु योजना के तहत करीब 80 फीसदी लाभार्थी किसान/मजदूरों को वैध नकद किस्त प्राप्त हो चुकी हैं। दोनों राज्यों के आधिकारिक आंकड़ों से यह जानकारी मिलती है। पीएम-किसान के तहत हरेक किसान परिवार को तीन किस्तों में सालाना 6,000 रुपये देने का वादा किया गया है जबकि रैयत बंधु के तहत प्रत्येक खेतधारक को प्रति सीजन 5,000 रुपये प्रति एकड़ देने का वादा किया गया है। ओडिशा में कालिया योजना के तहत राज्य के हरेक लघु एवं सीमांत किसान को एक ही किस्त में सालाना 12,500 रुपये देने का वादा किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि केंद्र सरकार की यह योजना विभिन्न राज्यों में इसी तरह की योजनाओं के मुकाबले क्यों पिछड़ रही है? हालांकि ये सभी योजनाएं नकद हस्तांतरण कार्यक्रम के दायरे में आती हैं लेकिन उन्हें लागू करने के तरीके अलग-अलग हैं।
 
अधिक प्रभावी तरीके से डेटा का उपयोग कर रहे राज्य
 
ओडिशा (कालिया) 2011 की जनगणना के उपयोग और कुछ अनुमानों के आधार पर लाभार्थियों का निर्धारण करता है। ओडिशा के प्रधान सचिव (कृषि) सौरभ गर्ग ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'राज्य का कृषि विभाग लाभार्थियों की पुष्टि के लिए धान खरीद के डेटाबेस, सब्सिडी रिपॉजिटरी और खाद्य सुरक्षा सूची के मौजूदा आंकड़ों का उपयोग करता है।' इसके अलावा राज्य के विभाग ने सभी ग्राम पंचायतों का दौरा कर ओडिशा में सभी किसानों और भूमिहीन श्रमिकों के आंकड़ों की पुष्टि की है। गर्ग ने कहा, 'हमने जनवरी से मार्च के दौरान यह अभियान चलाया था और ब्लॉक स्तरीय एवं जिला स्तरीय समितियों में डेटा की छानबीन की थी। हमें 1.2 करोड़ आवेदन प्राप्त हुए थे जिसमें से 64 लाख को लाभार्थी निर्धारित किया गया था और अब तक 51 लाख लाभार्थियों को रकम मिल चुकी है।' उन्होंने कहा कि इससे ओडिशा को आंकड़ों में अधिकतर अनियमितताओं को दूर करने में मदद मिली।
 
तेलंगाना भी इससे अलग नहीं है। उसे अपने भूमि रिकॉर्ड को आधुनिक बनाने में दो वर्ष लगे और सरकार ने इस प्रक्रिया में काफी खर्च किया है। साल 2014 में गठित तेलंगाना ने राज्य के सभी भू-स्वामियों का डेटा तैयार किया और उसके बाद राज्य के किसानों के लिए योजना तैयार की। आज 92 फीसदी से अधिक किसानों के पास आधार सीडिंग के साथ डिजिटल पट्टादार पासबुक (भूमि रिकॉर्ड) मौजूद है। राज्य के विभाग ने सुनिश्चित किया कि सभी भू-स्वामियों की सभी प्रविष्टियां और संबद्ध कृषि एवं राजस्व के आंकड़े भरे जाएं। तेलंगाना की निदेशक (भूमि प्रशासन) वी करुणा ने कहा कि भूमि विविदों के समाधान के अच्छे रिकॉर्ड होने के कारण डेटा की सटीकता 2018 की गर्मियों में 75 फीसदी थी जो बढ़कर अब 90 फीसदी से अधिक हो चुकी है। उन्होंने कहा, 'हमारे सभी भूमि रिकॉर्ड ऑनलाइन हैं और वे हमारी वेबसाइट पर पारदर्शिता के साथ उपलब्ध हैं। जिन भूखंडों के लिए कुछ सूचना गायब हैं उसकी जानकारी पोर्टल पर उपलब्ध है और इससे हमें खाइयों को तेजी से पाटने में मदद मिल रही है।'
 
दूसरी ओर केंद्र सरकार कृषि जनगणना के आंकड़ों का उपयोग कर रही है जो हरेक पांच वर्षों के बाद की जाती है। कृषि जनगणना की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह नमूनों के सर्वेक्षण पर आधारित है। दूसरा, इसके दायरे में ऐसे किसान भी शामिल हैं जिनके पास भूमि रिकॉर्ड नहीं है अथवा जो बटाईदार हैं और बिना किसी अनुबंध के खेती करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि सर्वेक्षण से भले ही देश में कृषकों की स्पष्ट तस्वीर मिलती हो लेकिन रिकॉर्ड की कमी के कारण इकाई स्तर पर लाभार्थियों का सही आकलन नहीं हो पाता है।
 
आवेदन खारिज होने की दर घटी, नकदी प्रवाह ध्वस्त
 
पीएम-किसान योजना को दिसंबर 2018 से मार्च 2019 की अवधि के लिए पहली किस्त में आवेदन खारिज होने की दर अधिक होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा था। पात्र लाभार्थियों के आवेदन को वैलिडेशन, संशोधन एवं सार्वजनिक निधि प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) में वैधता जैसे तमाम कदमों से गुजरना पड़ता है। पीएफएमएस केंद्र सरकार के सभी निधियों के लिए भुगतान गेटवे है। लेकिन पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि चालू वित्त वर्ष के दौरान खारिज होने की दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। हुसैन कहते हैं, 'पहली किस्त के मुकाबले दूसरी किस्त में दावे खारिज होने की दर में 75 प्रतिशत की कमी आई। इसके बावजूद, लाभार्थियों को नगदी प्रवाह पहली किस्त की तुलना में दूसरी किस्त में कम रहा।' महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पात्रता खारिज होने की दर सर्वाधिक रही। 
 
लाभार्थियों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए केंद्र और राज्य अलग तरीके अपना रहे हैं। राज्यों ने अपनी योजनाओं के प्रसार के लिए तेज अभियान चलाए हैं जिसमें किसानों के घर तक जाना और उन्हें संबंधित योजना में नामांकित कराना शामिल है। अगर किसी तरह की विसंगति आती है तो राज्य का संबंधित विभाग यह सुनिश्चित करता है कि इसका जल्द समाधान हो जिससे कोई भी पात्र किसान न छूटे। दूसरी ओर, केंद्र की पीएम-किसान योजना के लिए लाभार्थी को अपने बैंक खाते तथा पहचान संबंधी जानकारियां योजना से जोडऩी आवश्यक हैं। 
 
एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'कृषि सर्वेक्षण में किसान के तौर पर वर्गीकृत बहुत से किसान कुछ दूसरी योजनाओं में स्वयं को किसान के तौर पर नामित नहीं कराना चाहते। उन्हें डर है कि इससे उन्हें अन्य लाभ नहीं मिल सकेंगे।' उन्होंने बताया, 'अनावश्यक कागजी काम ने भी कई किसानों को इससे दूर कर दिया।'
 
तेज क्रियान्वयन का समय 
 
अंतत: तेलंगाना और ओडिशा, दोनों राज्यों ने भूमि रिकॉर्ड को अंतिम रूप देने, बैंक खातों को आधार से जोडऩे में काफी समय खर्च किया है। तेलंगाना के करुणा कहते हैं, 'दो वर्ष के समय में हमने आवश्यक जमीनी काम कर लिया जिससे अब तेज क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है।' इस समय तेलंगाना की लगभग 92 प्रतिशत भूमि को उसके मालिक के साथ लिंक कर लिया गया है और जल्द ही 95-97 प्रतिशत के लक्ष्य को पार कर लेगा। शेष भूमि विवादित या बेनामी संपत्ति हो सकती है। दूसरी ओर, केंद्र ने अंतरिम बजट के दौरान फरवरी 2019 में इस योजना की घोषणा की थी और लाभर्थियों की संख्या के ठोस आंकड़े जुटाए बिना ही इसे पूरा करने का विचार कर रही है। 
 
(पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं।)
Keyword: agri, farmer, crop, PM kisan,,
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