बिजनेस स्टैंडर्ड - आईबीसी-पीएमएलए में किसे प्राथमिकता
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आईबीसी-पीएमएलए में किसे प्राथमिकता

ईशिता आयान दत्त /  October 08, 2019

भूषण पावर ऐंड स्टील के लिए जेएसडब्ल्यू स्टील की समाधान योजना को नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की मंजूरी से दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के लिए दो साल से अधिक समय तक चलने वाली कॉरपोरेट ऋण शोधन अक्षमता समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) पर विराम लगना चाहिए। भूषण पावर ऐंड स्टील भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा तैयार 12 कंपनियों की उस सूची में शामिल है जिनके खिलाफ ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि जेएसडब्ल्यू द्वारा एक अपील दायर की गई थी ताकि ओवरलैपिंग वाले दो प्रमुख कानूनों: धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) और आईबीसी के तहत आपराधिक कार्रवाई के कारण दायित्व एवं संपत्तियों की जब्ती से बचा जा सके।

 
जेएसडब्ल्यू स्टील के संयुक्त प्रबंध निदेशक एवं समूह के मुख्य वित्तीय अधिकारी शेषागिरि राव ने कहा कि मुख्य तौर पर समस्या तब पैदा होती है जब आईबीसी पर पीएमएलए का ज्यादा प्रभाव दिखता है। राव ने कहा, 'चिंता की बात यह है कि पीएमएलए के तहत जारी कुछ मामलों में विपरीत फैसले आ रहे हैं। आज कोई भी बोलीदाता आपराधिक दायित्व को लेकर चिंतित नहीं है। आपराधिक दायित्व उस व्यक्ति का होगा जिसने अपराध किया हो और उसके लिए नए प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या कॉरपोरेट कर्जदार की संपत्तियों को जब्त किया जा सकता है?' भूषण पावर के लिए जेएसडब्ल्यू स्टील की पेशकश करीब 19,350 करोड़ रुपये की है। लेकिन इस मुद्दे पर आईबीसी के तहत दबावग्रस्त इस्पात परिसंपत्तियों के छोटे-बड़े सभी बोलीदाता चिंतित दिख रहे हैं। साथ ही इसकी चिंता उन कर्जदारों को भी सता रही है जो अब पीएमएलए और दिवालिया कानून की विभिन्न धाराओं के तहत फंसते दिख रहे हैं। एक शीर्ष लेनदार ने परिसंपत्तियों की जब्ती पर चिंता जताते हुए कहा कि पीएमएलए के तहत दिए गए फैसलों से अनिश्चितता पैदा हो गई है। उन्होंने कहा कि बोलीदाताओं की नजर बोली को सुरक्षित करने पर है जबकि लेनदार अपनी रकम की वसूली को लेकर चिंतित हैं।
 
एजेडबी ऐंड पार्टनर्स के पार्टनर सुहर्ष सिन्हा ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के प्रवर्तन निदेशालय बनाम ऐक्सिस बैंक मामले में फैसला दिया है कि पीएमएलए और आईबीसी दोनों कानूनों में गैर-विरोधाभासी उपखंड हैं लेकिन उन्हें समान परिस्थितियों में लागू नहीं किया जाता और इसलिए वे अस्तित्व में हैं। आदेश में कहा गया है कि पीएमएलए का उद्देश्य आरडीबीए (पूर्व में आरडीडीबीएफआई ऐक्ट), सरफेसी ऐक्ट और दिवालिया संहिता के उद्देश्यों से अलग है। इसलिए पीएमएलए पर आरडीबीए, सरफेसी ऐक्ट और दिवालिया संहिता हावी नहीं होते हैं। धारा 71 के तहत धन शोधन एवं आपराधिक प्रक्रिया से संबंधित मामलों में पीएमएलए अन्य मौजूदा कानूनों पर  हावी है। हालांकि आईबीसी की धारा 238 के तहत भी एक गैर-विरोधात्मक खंड है जिसके तहत कहा गया है कि किसी भी कानून के तहत कुछ भी असंगत हो तो इस संहिता के प्रावधान हावी होंगे। 
 
एक बोलीदाता ने कहा, 'आईबीसी का मतलब सफेदी करना है और बोलदाताओं ने उसी आधार पर पेशकश की है।' लेकिन अधिकतर बोलीदाताओं को समाधान के बाद विभिन्न सरकारी अधिकारियों से मांग का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चिंता पीएमएलए को लेकर है। सिन्हा के अनुसार, पीएमएलए में या तो संशोधन करना चाहिए अथवा बोलीदाता को कथित आपराधिक दायित्व के मद्देनजर बोली को संशोधित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह रकम किसी एस्क्रो खाते में जमा की जा सकती है। एमवी किनी ऐंड कंपनी की पार्टनर विदिशा कृष्णा ने दो फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रोटोमैक ग्लोबल मामले में एनसीएलएटी के आदेश और पीएमटी मशीन्स (स्टर्लिंग बायोटेक की सहायक इकाई) में मामले में पीएमएलए अपील प्राधिकरण के फैसले से यह स्पष्टï हो जाता है कि पीएमएलए और आईबीसी में कोई ओवरलैप नहीं है। पीएमटी मशीन्स मामले में पीएमएलए अपील प्राधिकरण ने पीएमएलए पर आईबीसी का वर्चस्व बरकरार रखा और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जब्त कुछ संपत्तियों को जारी करने का आदेश दिया। 
 
रोटोमैक ग्लोबल मामले में एनसीएलएटी ने कहा कि किसी भी कानून में दूसरे पर हावी होने प्रभाव नहीं है। हालांकि कृष्णा ने कहा कि इन आदेशों के अनुसार, बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अपराध की अवधि से पहले सुरक्षा हित तैयार किया गया था। इसी को लेकर समस्या है। कृष्णन ने पूछा, 'व्यावहारिक तौर पर कोई लेनदार अपराध की अवधि से पहले संपत्ति पर अपनी दावेदारी कैसे सुनिश्चित कर सकता है।' बोलीदाता भी इन मुद्दों को स्पष्टï होने का इंतजार कर रहे हैं। राव ने कहा कि कुछ मामलों में नियंत्रण में बदलाव पहले ही हो चुका है लेकिन मुकदमेबाजी अभी भी हो रही है। उन्होंने कहा, 'सरकार अथवा अदालतों द्वारा यह स्पष्टï किए जाने की जरूरत है कि क्या कॉरपोरेट कर्जदार की परिसंपत्तियों को जब्त किया जा सकता है। अन्यथा भुगतान करने के बावजूद परिसंपत्तियों के कब्जे को लेकर जोखिम बना रहेगा।' कुछ बोलीदाताओं ने पीएमएलए विशेषकर संपत्ति जब्त करने के संदर्भ में कंपनी मामलों के मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुतियां दी हैं। सरकार ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है और वह बोलीदाताओं के हितों की रक्षा के लिए विस्तृत दिशानिर्देश पर काम कर रही है।
Keyword: JSW steel, NCLT, bhusan power, IBC, PMLA,,
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