बिजनेस स्टैंडर्ड - जल उपयोग के तरीके पर पुनर्विचार की दरकार
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जल उपयोग के तरीके पर पुनर्विचार की दरकार

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  October 07, 2019

दक्षिण अफ्रीका की कार्यकर्ता जैकी किंग को नदियों में पारिस्थितिकी प्रवाह की जरूरत पर बल देने के लिए वर्ष 2019 के विश्व जल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। आज यह मुद्दा अहम है कि पानी की बढ़ती जरूरत एवं जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ते जोखिम के दौर में अपनी नदियों के अधिकारों को कैसे बहाल किया जाए? हमें समझना होगा कि नदियों के प्रवाह का मुद्दा असल में सत्ता की राजनीति से जुड़ा है। नदियों के अधिकारों का सवाल उस समय बेहद जटिल एवं राजनीतिक हो जाता है जब पानी की कमी हो और अधिकारों को चुनौती दी जा रही हो।

 
भारत जैसे देशों में पानी अनाज पैदा करने में लगे करोड़ों किसानों को दिया जाता है। लेकिन आज शहरों के साथ-साथ उद्योगों की संख्या भी बढ़ रही है। जद्दोजहद इस बात पर है कि इस प्राकृतिक संसाधन के पुराने एवं नए उपभोक्ताओं के बीच पानी का पुनर्वितरण कैसे हो? यह काम बेहद कठिन है। इस पुनर्वितरण से तनाव पैदा होता है और कुछ जगहों पर यह खूनी संघर्ष का भी रूप ले लेता है। बाकी दुनिया के साथ अपने मतभेदों को समझना भी जरूरी है। पहले ही विकसित हो चुकी दुनिया मसलन यूरोप में पानी का वितरण मुख्य रूप से शहरों एवं उद्योगों को ही होता है क्योंकि आजीविका की तलाश में लोग शहरों में ही बस चुके हैं। लेकिन भारत में अब भी करोड़ों लोग खेतों में काम करते हैं और उन्हें अपनी आजीविका के लिए पानी की जरूरत है।
 
समस्या यह भी है कि शहर एवं उद्योग पानी तो लेते हैं लेकिन इसके बदले वे अपशिष्ट पदार्थ एवं प्रदूषण देते हैं। वे नदियों को नष्ट कर देते हैं और इस तरह पहले से ही कम उपलब्ध पानी और भी लुप्त हो रहा है। लिहाजा इस संघर्ष में नदियों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाता, उनमें प्रवाह के लिए पानी ही नहीं है। लेकिन एक और समस्या है। नदी के पास समुचित जल नहीं होने से वह इंसानों के पैदा किए हुए अवशिष्ट को बहाकर ले भी नहीं जा पाती। यह अपनी सफाई खुद नहीं कर सकती है और रोज कई मौतें मरती है। 
 
यह सब कुछ जलवायु परिवर्तन के युग में घट रहा है। तथ्य यह है कि हमें जल प्रबंधन के बारे में अपनी समझ एवं जानकारी के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। आज बारिश होती है तो आसमान से बूंदें नहीं गिरती है, सैलाब आता है। वर्ष 2019 के मॉनसून में ही हम भारी एवं बहुत भारी बारिश के 1,000 से अधिक मामले देख चुके हैं, कई जगहों पर एक ही दिन में औसत बारिश की तुलना में 1,000-3,000 फीसदी अधिक बारिश हुई है। नतीजतन, इन जगहों पर बाढ़ आ गई। इससे भी बुरी बात यह है कि बाढ़ के बाद सूखे के हालात बन गए क्योंकि अतिवृष्टि वाले स्थानों पर अतिरिक्त पानी सहेजने के लिए जरूरी ढांचा ही नहीं है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है, तालाबों एवं पोखरों को बरबाद किया जा चुका है। इस तरह सूखे के समय बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। यह सामान्य न होकर बेहद असामान्य बात है। याद रखें कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दिखने तो अभी बस शुरू हुए हैं। आगे चलकर तापमान और बढ़ेगा।
 
हमें अत्यधिक बारिश के दौर में बांधों की भूमिका पर भी सिरे से सोचने की भी जरूरत होगी। बांधों का निर्माण पानी इक_ा करने और प्रवाह के नियमन के लिए किया गया था। लेकिन अब पानी को इस तरह रखना काफी जोखिम भरा होता जा रहा है क्योंकि बांधों के प्रबंधकों के पास अत्यधिक बारिश की स्थिति में इक_ा पानी छोडऩे के सिवाय कोई चारा नहीं रह जाता है। अचानक पानी छोड़े जाने से बाढ़ एवं प्रलय जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। इससे व्यापक स्तर पर जनजीवन नष्ट होता है। इस मुद्दे पर हमें जैकी किंग की अवधारणा पर गौर करने की जरूरत है ताकि हम नदियों के अधिकारों पर निर्णय करने की वास्तविकता का सामना करें। यह एक मौका भी है क्योंकि अगर हम नदियों को पानी का अधिकार देते हैं तो फिर हम कम से भी ज्यादा कर पाना सीख जाएंगे।
 
पहला, कृषि क्षेत्र को पानी के इस्तेमाल पर अधिक समझदारी दिखानी होगी। लेकिन इसका मतलब केवल ड्रिप सिंचाई अपनाना भर नहीं है। इसका यह मतलब भी है कि हम अपने भोज्य पदार्थों में इस तरह बदलाव करें कि कम पानी का इस्तेमाल करने वाले भोजन करें और हम धनी देशों में प्रयुक्त औद्योगिक खेती के तरीकों का इस्तेमाल करते हुए मांसाहारी उत्पाद न तैयार करें। इसके लिए जरूरी होगा कि सरकार फसलों की खरीद के दौरान चावल के बजाय कम पानी में उपजने वाले बाजरे को प्राथमिकता मिले। 
 
दूसरा, शहरों को नदियों से पानी लेने और फिर दोबारा पानी भरने के बारे में सीखना होगा। यहीं पर मल-मूत्र प्रबंधन का बड़ा अवसर भी है जो किफायती होने के साथ टिकाऊ भी है। शहरों को यह पता होना चाहिए कि उन्हें नाले में बहने वाली हरेक बूंद को रिसाइकल कर दोबारा इस्तेमाल करना है। शहरों को यह कहा जाना चाहिए कि वे अपने नाला गिरने वाली जगह से पीने के लिए पानी जुटाएं। ऐसा होने पर शहर अपने अवशिष्ट जल के शोधन के लिए बाध्य होंगे और वह पानी दोबारा जलचक्र में लौट आएगा। इससे जल सुरक्षा भी बढ़ेगी।
 
तीसरा और सबसे अहम, हमें यह अहसास करना होगा कि अत्यधिक एवं असमान बारिश से निपटने का इकलौता रास्ता यही है कि हरेक बूंद को संरक्षित किया जाए और निकासी के लिए समुचित ढांचा बनाया जाए। हरेक जलस्रोत, हरेक नाले को गहरा एवं संरक्षित किया जाए ताकि बाढ़ के पानी को जमा किया जा सके। भारत में जलभंडार प्रणालियां बनाने की असाधारण एवं विविध परंपरा रही है। ये ढांचे हमारे नए मंदिर बनने चाहिए। हरेक नाला, गड्ढा और जलस्रोत को इस तरह संरक्षित किया जाए कि बाढ़ का पानी भूमिगत जल को रिचार्ज करने में इस्तेमाल किया जा सके जो सूखे की स्थिति में काम आएगा। 
Keyword: water, crisis, river,,
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