बिजनेस स्टैंडर्ड - बुनियादी ढांचा क्षेत्र को चाहिए वित्तीय संस्थान
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बुनियादी ढांचा क्षेत्र को चाहिए वित्तीय संस्थान

विनायक चटर्जी /  October 07, 2019

अगर भारत को बुनियादी क्षेत्र में 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य हासिल करना है तो उसे एक विकासात्मक वित्तीय संस्थान की जरूरत है। बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
प्रधानमंत्री ने 2019 से 2024 तक देश में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 100 लाख करोड़ रुपये निवेश का लक्ष्य रखा है। भारत को इस स्तर के निवेश की जरूरत है और अगर हम जीसीएफआई (जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर बुनियादी क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण) के चश्मे से देखें तो यह आंकड़ा सही लगता है। लेकिन बुनियादी क्षेत्र की मौजूदा स्थिति और सार्वजनिक खर्च बढ़ाने में तंगी को देखते हुए एक कारगर और खास विकासात्मक वित्तीय संस्थान (डीएफआई) के बिना इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल होगा। 
 
जून 2017 में बिज़नेस स्टैंडर्ड में मैंने एक इन्फ्राटॉक लेख में इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड का पुनर्गठन करने की बात कही थी ताकि यह एक कारगर भूमिका निभा सके। उसके बाद से एक व्यापक और ज्यादा कारगर डीएफआई की जरूरत और बढ़ गई है। वर्ष 2019 सरकारी बैंकिंग व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक उल्लेखनीय वर्ष होगा क्योंकि सरकार बड़े पैमाने पर सरकारी बैंकों का विलय कर रही है। लेकिन बुनियादी क्षेत्र के वित्तपोषण में भी सुधार की गुंजाइश है। अगर यह सफल हुआ तो इससे देश में बुनियादी क्षेत्र में निवेश के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव होंगे। 
 
देश में बुनियादी क्षेत्र को वित्त प्रदान करने वाले मौजूदा संस्थानों इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी, हाउसिंग ऐंड अर्बन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन (रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन के अधिग्रहण के साथ अब बड़ी कंपनी) और इंडियन रेलवे फाइनैंस कॉरपोरेशन के विलय का प्रस्ताव है। इससे एक नई सर्वोच्च वित्तीय संस्था का गठन होगा। इसका गठन संसद द्वारा पारित कानून के जरिये होना चाहिए और कई संस्थाओं के विनियमन से छूट मिलनी चाहिए। निश्चित रूप से देश को इस तरह की संस्था की जरूरत है और इसके बहीखाते का आकार तीन चरणों की प्रक्रिया में 20 लाख करोड़ रुपये का होना चाहिए। इसमें से दो लाख करोड़ रुपये इक्विटी पूंजी हो और कर्ज नौ गुना होना चाहिए। उसे मौजूदा सरकार की बेहतर अंतरराष्ट्रीय छवि का फायदा उठाते हुए विदेशों से सस्ती दर पर दीर्घावधि पूंजी जुटाने का अधिकार होना चाहिए। सरकार ने बुलेट ट्रेन के लिए 90 हजार करोड़ रुपये का ऋण 50 साल के लिए 0.1 फीसदी के ब्याज पर देने के लिए जापान को राजी करके अपनी इस क्षमता का प्रदर्शन किया है। इसके ऋण का पुनर्भुगतान ऋण मिलने के 15 साल बाद शुरू होगा। 
 
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अब भी बुनियादी क्षेत्र की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों से वसूली का प्रयास कर रहे हैं। वे इस सुस्ती को दूर करने की स्थिति में नहीं हैं। किसी भी स्थिति में परिसंपत्ति-देनदारी में बेमेल की गलती को दोहराया नहीं जाना चाहिए। विदेशी इन्फ्रास्ट्रक्चर फंडों ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में दिलचस्पी दिखाई है लेकिन उनके निशाने पर कम जोखिम वाली पुरानी कार्यशील परिसंपत्तियां हैं। अब जब राजकोषीय घाटा 4 फीसदी तक पहुंचने वाला है तो बुनियादी क्षेत्र पूरी तरह सरकारी वित्तपोषण पर निर्भर नहीं रह सकता।
 
आजादी के बाद से डीएफआई ने दशकों तक देश में परियोजनाओं के वित्तपोषण और उद्यमियों की पीढ़ी तैयार करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उद्योग में परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए कई संस्थान बनाए गए। ये ऐसी परियोजनाएं थीं जिन्हें उस समय वाणिज्यिक बैंक ऋण नहीं देते थे। इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया, इंडस्ट्रियल फाइनैंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और इंडस्ट्रियल क्रेडिट ऐंड इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का गठन उस दौर में किया गया जब स्वदेशी उद्योग के लिए शायद ही कोई निजी क्षेत्र की पूंजी उपलब्ध थी लेकिन भारत में तत्काल उद्यमिता और औद्योगिक आत्मनिर्भरता विकसित करने की जरूरत थी। 
 
हालांकि समय बीतने के साथ इन संस्थाओं को सुधारों से पूर्व के दौर की विरासत के रूप में देखा जाने लगा। देश और दुनिया में ऐसे डीएफआई का सुनहरा दौर 1950 से 1970 के दशकों के बीच था। हालांकि 1980 के दशक तक इनमें से कई का निजीकरण होने लगा, वे बंद हो गए या फिर आईसीआईसीआई और आईडीबीआई की तरह परंपरागत वाणिज्यिक बैंकों में बदल गए। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) और इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी (आईडीएफसी) को लगा कि उनका अधिकार क्षेत्र क्षेत्रवार डीएफआई तक सीमित नहीं है और उन्होंने अपना खुद का रास्ता चुना। हाल में गठित नैशनल इनवेस्टमेंट ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड (एनआईआईएफ) खुद को प्लेटफॉर्म आधारित इक्विटी निवेशक के तौर पर देखता है। 
 
फिर भी तथाकथित राष्ट्रीय विकास बैंक (एनडीबी) वास्तव में कभी दूर नहीं हुए। इसकी भूमिका विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी नहीं रही जिन्होंने भारत में बुनियादी क्षेत्र की कई योजनाओं का वित्तपोषण किया है। बोस्टन यूनिवर्सिटी के रोजेरियो स्टुडार्ट और केविन पी गलागेर ने 2016 में एक अध्ययन में बताया कि एनडीबी में दुनिया की दिलचस्पी फिर से बढ़ी है क्योंकि कोरिया और चीन जैसे देशों की आर्थिक सफलता में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। जहां बुनियादी क्षेत्र और उद्योग के लिए वित्तपोषण की बात है तो कई नव औद्योगिक देश एनडीबी को बहुस्तरीय संस्थानों से बेहतर विकल्प मानते हैं। इसकी वजह यह है कि पैसों को कैसे खर्च किया जाना है, इसका फैसला लेने में उन्हें ज्यादा अधिकार हासिल हैं। अध्ययन के मुताबिक दुनिया के 250 एनडीबी के पास कम से कम 5 लाख करोड़ डॉलर की परिसंपत्तियां हैं जो नामी-गिरामी बहुस्तरीय वित्तीय संस्थाओं से कहीं अधिक है। 
 
ब्राजीलियन डेवलपमेंट बैंक (बीएनडीईएस) इस बात का प्रबल उदाहरण है कि एनडीबी की क्या भूमिका होनी चाहिए। इसकी स्थापना भी 1950 के दशक में की गई थी लेकिन अपने भारतीय समकक्षों के उलट यह अब भी डीएफआई की भूमिका निभा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्राजील के वित्त बाजार ऐतिहासिक रूप से ज्यादा विकसित नहीं रहे हैं और वहां ब्याज दर अधिक है जबकि वाणिज्यिक बैंकों का जोर अल्प से मध्यावधि ऋण पर रहता है। दीर्घावधि ऋण बीएनडीईएस के दायरे में आता है। 2008 के वित्तीय संकट के बाद उपजे नकदी संकट में जब दूसरे वाणिज्यिक बैंकों ने ऋण देना बंद कर दिया था तो ब्राजील की सरकार ने बीएनडीईएस को ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया। इक्कीसवीं सदी में भारत में एक बार फिर डीएफआई का समय है और इस बार उसकी जिम्मेदारी बुनियादी क्षेत्र के लिए धन का प्रबंध करना है। 
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: infrastructure, pipeline, india, projects,,
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