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देश की परियोजनाओं में निवेश का बन रहा उचित परिवेश

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  October 06, 2019

सरकार एक राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन तैयार करेगी जिसमें 100 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली नई तथा पुनर्निर्माण परियोजनाओं को शामिल किया जाएगा। इसके तहत निवेशकों को जानकारी दी जाएगी कि इनमें से कौन सी परियोजना क्रियान्वयन के किस स्तर पर है। इससे निवेशकों को यह तय करने में आसानी होती है कि उक्त परियोजना में निवेश करें या नहीं। सैद्धांतिक तौर पर इसका स्वागत होना चाहिए। इससे पता चलता है कि सरकार बुनियादी ढांचा क्षेत्र में प्रधानमंत्री के 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश के लक्ष्य को लेकर गंभीर है। इसे समझने के लिए इस संदर्भ को देखना जरूरी है। विदेशी निवेशकों, खासतौर पर बीमा और पेंशन फंड जैसी स्थिर पूंजी रखने वाले निवेशकों के साथ बातचीत में प्रोजेक्ट पाइपलाइन का जिक्र बार-बार आने की एक वजह है। भारत को अभी भी निवेश के मामले में जोखिम भरा माना जाता है। निवेशकों को न केवल प्रतिफल कम मिलने की आशंका रहती है या वे मुद्रा अवमूल्यन से होने वाले नुकसान से चिंतित रहते हैं बल्कि उनको विफल परियोजनाओं में निवेश से सारी पूंजी गंवाने का खतरा भी रहता है। नियामकीय या वैधानिक बाधाएं तो हैं ही। कई बार भारतीय साझेदार अपेक्षा पर खरे नहीं उतरते। भारत की विवाद निस्तारण प्रणाली और प्रशासनिक तथा नियामकीय ढांचा ऐसी आशंकाओं की अहम वजह हैं।

 
यही कारण है कि वैश्विक निजी निवेशक किसी परियोजना में निवेश करने के पहले साझेदार या गारंटर के रूप में भारत सरकार का साथ चाहेंगे। कई लोग यह अनुमान लगाते हैं कि पूंजी को बड़ा नुकसान रोकने के लिए राज्य को जोखिम में साझेदार बनाना सही है। यह अपने आप में गलत अवधारणा नहीं है। दिक्कत यह है कि इससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है। जरूरत ऐसे तरीके निकालने की है जिनके जरिये सरकार साझेदार बने और देश के बारे में राजनीतिक और नीतिगत अनिश्चितता को समाप्त करने का काम करे। उसे बिना खजाने पर बोझ डाले जोखिम में शामिल होना होगा। सरकारी निगरानी वाली प्रोजेक्ट पाइपलाइन यह काम प्रभावी तरीके से कर सकती है क्योंकि सरकार परियोजना स्तर पर रेटिंग एजेंसी के रूप में पेश आती है। ऐसे में दी गई वित्तीय सहायता के लिए समुचित जोखिम-प्रतिफल स्तर का आकलन किया जा सकता है।
 
ऐसी पाइपलाइन अपने आप जोखिम कम नहीं करती है। बल्कि यह जोखिम को स्पष्ट रूप से सामने रखती है। इससे अनिश्चितता कम होती है। अगर सही तरीके से डिजाइन किया जाए तो यह उपलब्ध सूचना के आधार पर बाजार विकास में भी मददगार साबित हो सकती है। ऐसा आवश्यक नहीं कि नई सूचना का पता सरकार ने पाइपलाइन निर्माण के दौरान ही लगाया हो। यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि ढेर सारे सरकारी अंकेक्षक ऐसी सूची में शामिल होने वाली परियोजनाओं की जांच में लग जाएंगे। ऐसी किसी भी कोशिश को मध्यम अवधि में बाधाओं का सामना करना पड़ेगा क्योंकि राज्य के पास क्षमता और निगरानी के लिए संसाधन सीमित हैं। इसके बजाय जरूरत इस बात की है कि परियोजना के बारे में ऐसी सूचना पर साझेदारी हो जो पहले से सार्वजनिक हो। इस जानकारी को संभावित निवेशक से साझा किया जाना चाहिए। 
 
यह सवाल उठ सकता है कि क्या ऐसे में अनुमान बेमेल भी हो सकते हैं। कई निवेशक परियोजना पाइपलाइन को देखकर यह मान सकते हैं कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से इन परियोजनाओं की गारंटी दे रही है। सरकार ऐसा कोई दावा शायद ही करे। सच तो यह है कि सरकार अल्पावधि में गारंटी देने की स्थिति में ही नहीं है। अगर अग्रिम अनुमान सही नहीं हुए तो भविष्य में दिक्कत हो सकती है। सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने वाले किसी भी अन्य कदम की तरह इस मामले में भी जोखिम को स्पष्ट कर चुनिंदा निजी परियोजनाओं में निजी निवेशकों को आकृष्ट करने का मामला भी हमेशा सांठगांठ और भ्रष्टाचार की आशंका से घिरा रहेगा। सरकार को पाइपलाइन इस प्रकार तैयार करनी होगी कि वह वास्तविक या स्पष्ट अनियमितताओं से बचे।
 
वैसे इस विचार में काफी संभावनाएं हैं। एक अन्य पहलू है जो इसमें और सुधार लाएगा: ऐसी किसी भी परियोजना का भारत को जलवायु की दृष्टि से अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में क्या असर होगा, इसका आकलन किया जा सकता है। जो बुनियादी परियोजनाएं ग्रामीण इलाकों को सक्षम बनाती हैं या उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने अथवा ग्राह्यता के मामले में उपयोगी होती हैं, उन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए। निवेश का अंतिम निर्णय तो जोखिम और प्रतिफल के आधार पर ही होगा लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण मानक परिसंपत्ति से जुड़ा जोखिम अहम हो सकता है, वहीं वातावरण में बढ़ती गर्मी के बारे में भी पूरी जानकारी रहनी आवश्यक है।
 
अंत में, हमारे पास कभी इतना बढिय़ा विचार नहीं रहा जिसे देश की अफसरशाही नष्ट न कर सके। चीजों को इस प्रकार नष्ट करने की सबसे अहम वजह है निजी क्षेत्र के लिए और उसके साथ काम न करने की मंशा। पाइपलाइन तैयार करने और उसका नियमन करने वालों को साफ बता दिया जाना चाहिए कि यह उपाय सरकार, परियोजना क्रियान्वयन या मतदाताओं के नहीं बल्कि निवेशकों के काम का है। एक मान्य धारणा यह है कि भारत विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने में सक्षम नहीं है। देश अपने परंपरागत दंभ के साथ निवेशकों से संपर्क नहीं कर सकता। उसे निवेशकों के बारे में यह भी नहीं सोचना चाहिए कि वे मामूली लाभ या रियायतों के चक्कर में होंगे। जरूरत यह है कि उनकी जरूरतों को सुना जाए और उन्हें पूरी जानकारी दी जाए। भारत में ऐसी विनम्रता देखने को नहीं मिली। पाइपलाइन परियोजना अपने आप में एक विज्ञापन है। यह एक भरोसेमंद योजना है जो सरकार और पूंजी के बीच विश्वास का रिश्ता कायम करती है। इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए।
Keyword: infrastructure, pipeline, india, projects,,
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