बिजनेस स्टैंडर्ड - बड़े वास्तविक सुधार से ही होगा बेड़ा पार
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बड़े वास्तविक सुधार से ही होगा बेड़ा पार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 06, 2019

देश के कारोबारी जगत में उद्यमिता की भावना जगाने की बात जब तब होती रहती है। देश के राजनेता भी अक्सर इस जुमले का प्रयोग करने लगे हैं। याद करें तो सबसे पहले मनमोहन सिंह और उसके बाद जसवंत सिंह (अटल बिहारी वाजपेयी के वित्त मंत्री) ही दो ऐसे नेताओं के रूप में याद आते हैं जिन्होंने कारोबारी जगत से अपने भीतर यह भावना जगाने की अपील की थी। मोदी सरकार ने भी बीते दिनों अपने तरीके से ऐसा करने का प्रयास किया। इस स्वतंत्रता दिवस को अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के कुछ परिसंपत्ति निर्माताओं से संवाद कायम करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सरकार उनकी इज्जत करती है और यह मानती है कि उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अहम योगदान दिया है।

 
लाल किले के प्राचीर से देश के किसी भी प्रधानमंत्री द्वारा निजी उद्यमिता को बढ़ावा देने वाला यह सबसे मजबूत वक्तव्य था। इसके बाद इस क्रम में कई अन्य कदम उठाए गए: कॉर्पोरेट कर दर में भारी कमी, पूंजीगत लाभ कर में बदलाव और कंपनियों द्वारा कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व (लाभ का दो फीसदी सामाजिक कार्यों में व्यय करना) के उन मामलों को आपराधिक बताने का निर्णय बदल दिया गया जहां कोई निरीक्षक अनुपालन न होने को अपराध ठहरा सकता था। इसी तरह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के पूंजीगत लाभ पर लगने वाला भारी-भरकम कर भी हटा लिया गया है। जोखिम लेने वाली सरकार जिसने एक बार निर्णय लेने के बाद कभी उसे नहीं बदला उसका अपने कदमों को वापस लेना एक नया अनुभव था।
 
सरकार में शामिल कोई व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं करेगा लेकिन पहली बार उसे यह महसूस हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असाधारण निजी लोकप्रियता और दूसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ शासन कर रही सरकार से बढ़कर भी कोई चीज है: वह है बाजार। न्यायपालिका, मीडिया, निर्वाचन आयोग और यहां तक कि पाकिस्तान से भी यह सरकार निपट सकती है लेकिन बाजार की राजनीतिक शक्ति से काबू नहीं किया जा सकता। बीते कई सप्ताहों से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार कारोबारी समुदाय तक पहुंच बना रही हैं। उन्होंने एक के बाद एक संवाददाता सम्मेलनों के माध्यम से बजट की कई दिक्कतदेह व्यवस्थाओं में सुधार किया। वित्त सचिव, जो शायद बुरी खबरों से भरा बजट बनाने वालों में अहम थे, उन्हें पद से हटा दिया गया और उन्होंने समय से पहले सेवानिवृत्ति का आवेदन किया है। बजट के बाद से आरबीआई ने दरों में दो बार कटौती की और उसकी भाषा को भी आर्थिक अखबारों ने शांतिवादी करार दिया है।
 
इसके बावजूद कारोबारी मिजाज में खास सुधार नहीं आया। यहां तक कि विश्व आर्थिक मंच के इंडिया इकनॉमिक समिट में भी कारोबारियों में कोई उत्साह देखने को नहीं मिला। कारोबारी जगत एक ऐसी सेना की तरह नजर आ रहा है जिसका मनोबल टूट चुका है। आप उसे बढिय़ा से बढिय़ा हथियार दे सकते हैं लेकिन अगर सैन्य अधिकारी अपने मन में हार मान चुके हैं तो वे अपने जवानों को जंग में प्रेरित नहीं कर सकते। युद्ध जीतना तो दूर की बात है। नैतिक बल, बल्कि स्वाभिमान की कमी के चलते सरकार लगभग हर शुक्रवार एक के बाद एक अच्छी खबरों की झड़ी लगा रही है लेकिन उनका भी कोई फायदा नहीं नजर आ रहा। कॉर्पोरेट कर में छूट से कारोबारी जगत को 1.45 लाख करोड़ रुपये की सीधी राहत मिली। बाजार में कुछ दिन तेजी देखने को मिली लेकिन उसके बाद वही ढाक के तीन पात।
 
कर रियायत के बाद 24 सितंबर को शेयर बाजार उच्चतम स्तर पर पहुंचा था। तब से अब तक बीएसई सेंसेक्स को 2.53 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। ब्याज दर में कटौती समेत अन्य पलटे गए फैसले तथा सुधार भी उसी निराशा की स्थिति की भेंट चढ़ गए। दुनिया भर के बाजारों की हालत खराब है लेकिन हमें यह मानना होगा कि तमाम दिशाहीनता, अपरिपक्वता और विषमता के बावजूद वे सत्ता से सच कहना नहीं भूलते। भारत के बाजार निर्भीक होकर वह कर रहे हैं जो मीडिया और न्यायपालिका जैसे बड़े संस्थान शायद करना नहीं चाहते। यानी मोदी सरकार को बुरी खबर सुनाना।
 
पिछली तिमाही में पांच फीसदी की वृद्धि दर झटका देने वाली थी लेकिन केवल उन्हें जो मासूम थे। अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वालों को इस बारे में अंदाजा था। अगर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया तो हालात सुधरने की स्थिति नहीं नजर आती। वह कदम क्या होगा इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं है। क्योंकि अगर अंदाजा होता तो रिजर्व बैंक को वृद्धि दर के पूर्वानुमान केा 6.9 फीसदी से घटाकर 6.1 फीसदी नहीं करना पड़ता। उद्यमिता की भावना को वर्तमान मुनाफा या कर कटौती से उतना प्रोत्साहन नहीं मिलता जितना भविष्य के आशावाद से। उसमें गिरावट आ रही है, खासतौर पर मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नोटबंदी से आर्थिक गति भंग होने के बाद। कारोबार आम लोगों और परिवार से अलग नहीं होते। जब उनको भविष्य अंधकारमय दिखता है तो वे भी नई आय, बचत और हालिया कर छूट जैसे कदमों से मिली राहत को दबा लेते हैं ताकि वह बुरे वक्त में काम आए। वे कारोबार में निवेश करने और जोखिम उठाने का काम तभी करते हैं जब उनमें उत्साह होता है।
 
सीएमआईई का कंपनियों के पूंजीगत व्यय का डेटा पूरा किस्सा बताएगा। दिसंबर 2018 में समाप्त तिमाही में यह 3.03 लाख करोड़ रुपये था जो इस वर्ष मार्च तिमाही तक यह 2.66 लाख करोड़ रुपये रह गया। आगे की दो तिमाहियों में तो यह 84,000 करोड़ रुपये और 99,000 करोड़ रुपये रह गया। एक बार फिर सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि गत तिमाही में तमाम कंपनियों की बिक्री वृद्धि में एक फीसदी की गिरावट आई। इससे पहले ऐसा 2008 की सबसे बुरी तिमाही में हुआ था जब लीमन ब्रदर्स का संकट उत्पन्न हुआ था।  इन आंकड़ों को किसी भी तरह देखें निष्कर्ष यही निकलेगा। तमाम आर्थिक संकेतक नकारात्मक हैं और ऐसा काफी समय से है। कुछ के लिए वैश्विक माहौल को उत्तरदायी माना जा सकता है लेकिन वह बहुत छोटा हिस्सा है। समस्या की जड़ें यहीं हैं। जब मुकेश अंबानी जैसे कारोबारी समेत तमाम बड़े कारोबारी नकदी संभाले हुए हैं या अपना जोखिम कम कर रहे हैं, अपने कर्ज चुकता कर रहे हैं और इंतजार कर रहे हैं तो यह आशा करना सही नहीं है कि बाकी लोग निवेश करेंगे। अगर आप देश के बेहतरीन से बेहतरीन कारोबारी नेताओं से पूछेंगे तो वे कानाफूसियों में ही सही आपको बताएंगे कि सन 1991 के बाद इतनी निराशा कभी नहीं थी न ही आत्म-सम्मान इस कदर कम था। इसके लिए केवल कर अधिकारियों को छापेमारी और गिरफ्तारी करने समेत सौंपे गए बेहिसाब अधिकार ही जवाबदेह नहीं हैं बल्कि फंसे हुए कर्ज से निपटना भी इसकी वजह है। अगर सामान्य उधार लेने वाले से लेकर गंभीर उद्यमी तक सभी वास्तव में खराब कारोबारी चक्र के शिकार हैं और ऋण चोरी न करने वालों को भी उतने ही संदेह से देखा जा रहा है तो उद्यमियों को ऋण लेने और बैंकरों को ऋण देने का प्रोत्साहन कहां से मिलेगा।
 
एक प्रमुख और जानेमाने कारोबारी ने मुझसे कहा कि जोखिम तो हर कारोबार में होता है लेकिन अगर उधारी चुकाने में 30 दिन की देरी होने पर बैंक मेरा नाम डिफॉल्ट करने वाले के रूप में प्रकाशित कर देगा और मुझे दिवालिया प्रक्रिया के लिए राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के पास भेज देगा तो मैं ऐसा जोखिम क्यों लूंगा? उन्होंने सवाल पूछा कि किसी के बीमार होने पर उसे अस्पताल भेजते हैं या श्मशान घाट? उनके मुताबिक आरबीआई के ताजा नियम के अधीन दिवालिया प्रक्रिया देश की उद्यमिता के अंतिम संस्कार के समान है और इस लोकलुभावन और बदले की भावना से काम कर रहे सत्ता तंत्र ने एनसीएलटी के रूप में कारेाबारी जगत के लिए श्मशान घाट बनाया है।
 
अर्थव्यवस्था का संकट अब कर कटौती, प्रोत्साहन और वादों से आगे निकल चुका है। इनमें से कुछ तरीके काम आ सकते हैं लेकिन वैसे ही जैसे मरणासन्न मरीज पर स्टेरॉयड। अर्थव्यवस्था को अब वास्तविक और साहसिक सुधारों की जरूरत है। इसकी शुरुआत सरकारी कंपनियों के वास्तविक निजीकरण से हो सकती है। यदि मोदी सरकार कार्यकाल के छठे वर्ष भी ऐसा नहीं कर सकती है तो उसके करिश्मे पर कौन यकीन करेगा। माना जाएगा कि सुधार की बातें चुनाव जीतने का जुमला हैं, न कि जरूरी लक्ष्य।
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