बिजनेस स्टैंडर्ड - सऊदी अरब को बासमती निर्यात पर संकट
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सऊदी अरब को बासमती निर्यात पर संकट

दिलीप कुमार झा / मुंबई October 06, 2019

ऐसे समय में जब भारत प्रतिबंध झेल रहे ईरान को किए जाने वाले चावल निर्यात में आई गिरावट की भरपाई के लिए वैकल्पिक बाजार तलाश रहा है, ऐसे में दूसरे सबसे बड़े बाजार - सऊदी अरब ने भारत के चावल निर्यात को बड़ा झटका दिया है।  सऊदी अरब के खाद्य गुणवत्ता विनियामक - सऊदी खाद्य एवं औषधि प्राधिकरण (एसएफडीए) ने चावल आयात के लिए नई प्रक्रिया लागू की है जो 1 सितंबर, 2019 से प्रभावी है। एसएफडीए ने 1 सिंतबर से प्रत्येक खेप के साथ स्वीकृति प्रमाण-पत्र (सीओसी) रखना अनिवार्य कर दिया है। एसएफडीए ने 1 सितंबर, 2019 के बाद भेजी गई खेपों की मंजूरी के लिए हलफनामा उपलब्ध कराने के वास्ते भारतीय चावल निर्यातकों को 31 दिसंबर, 2019 तक तीन महीने का वक्त दिया है। इस बीच इसे सीओसी के पास जमा कराना होगा।
 
इस नई प्रक्रिया ने भारत के चावल (बासमती और गैर-बासमती दोनों) निर्यातकों को परेशान कर दिया है। भारतीय निर्यातकों का अनुमान है कि सीओसी की इस शर्त की अनिवार्यता और गुणवत्ता संबंधी निर्देश का कड़ाई से पालन करने के बाद सऊदी अरब को किए जाने वाले चावल निर्यात में गिरावट आएगी। वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से ईरान को किया जाने वाला निर्यात पहले ही कम हो चुका है। भारत से ईरान को भेजी जाने वाली चावल की खेपों पर पिछले दो महीने से विराम लगा हुआ है।
 
मुंबई के चावल निर्यातक एआई गियास एक्सपोट्र्स के निदेशक शरीफ यूसुफ ने कहा कि सीओसी हासिल करना आसान और लागत-प्रभावी नहीं है। इस वजह से शायद सभी निर्यातक सीओसी प्रमाणन के लिए शर्तें पूरी न कर पाएं। इसलिए जनवरी से भारत के चावल निर्यात को निश्चित तौर पर नुकसान होगा जब भविष्य की खेपों के लिए हलफनामा देने के वास्ते दिया गया तीन महीने का वक्त खत्म हो जाएगा। इस बीच पिछले कुछ सालों में भारत के कुल बासमती चावल निर्यात में सऊदी अरब का योगदान लगातार घटता रहा है। 2014-15 में सऊदी अरब का बासमती आयात 10 लाख टन के स्तर पर था। इसके बाद से यह फिसलकर 8,00,000-9,00,000 टन रह गया। इस तरह वित्त वर्ष 2018-19 में भारत के बासमती चावल निर्यात में सऊदी अरब की हिस्सेदारी गिरकर 20 प्रतिशत से भी कम हो चुकी है, जबकि 2014-15 में यह 26 प्रतिशत थी।
 
इस बीच एसएफडीए ने भारत के बासमती चावल निर्यातकों को सीओसी जारी करने के लिए केवल दो एजेंसियों - इंटरटेक और टीयूवी ऑस्ट्रिया (इंडिया) को ही अधिकृत किया है। व्यापारिक सूत्रों के अनुसार नियमों में ढील के लिए एक प्रतिनिधिमंडल ने एसएफडीए के अधिकारियों से मुलाकात की है जिसमें सरकारी अधिकारियों और प्रसंस्करणकर्ताओं, निर्यातकों तथा व्यापारियों के प्रतिनिधि शामिल थे। हालांकि यह प्रतिनिधिमंडल सीओसी की शर्त का पालन करने के लिए तीन महीने के विस्तार वाली केवल अस्थायी राहत ही प्राप्त कर पाया है।
 
कोहिनूर ब्रांड के तहत बासमती चावल उत्पादन और निर्यात करने वाली कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने कहा कि एसएफडीए की एक प्रमुख शर्त चावल का उद्गम स्थल जानना थी। इसका मतलब यह है कि निर्यातकों को चावल की उत्पत्ति के बारे अवश्य ही बताना होगा। हमने साफ तौर पर मना कर दिया है। हमने तर्क दिया है कि किसानों की औसत जोत केवल 1-2 एकड़ ही है और इसलिए मूल स्थान का पता लगाना असंभव है। हमारा विश्वास ​​है कि समय सीमा से पहले सभी मसलों को सुलटा लिया जाएगा।
 
इस बीच कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने इच्छुक चावल निर्यातकों से मान्यता प्रमाण-पत्र लेेने के लिए कहा है। एपीडा के अनुसार एसएफडीए ने ऐसे चावल प्रतिष्ठानों के जरिये भारत से चावल लेने के लिए सहमति जताई है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों - आईएसओ 22000 और/अथवा एचएसीसीपी (खाद्य क्षेत्र में दो सबसे कड़े गुणवत्ता विनिर्देश) पर आधारित खाद्य सुरक्षा प्रबंध प्रणाली (एफएसएमएस) अपना चुके हैं।
Keyword: agri, farmer, crop, basmati, rice,,
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