बिजनेस स्टैंडर्ड - छूट के ऑफर में न रह जाएं कहीं खोकर
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छूट के ऑफर में न रह जाएं कहीं खोकर

तिनेश भसीन /  10 06, 2019

ई-कॉमर्स कंपनियों एमेजॉन और फ्लिपकार्ट की 'महासेल' के कुछ हफ्ते बाद अब फिजिकल स्टोर भी त्योहारों के दौरान भारी छूट की पेशकश कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचने का प्रयास करेंगे। वैसे कई उत्पादों की कीमतें वाकई कम होती हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ई-कॉमर्स कंपनियां और फिजिकल स्टोर कुछ नुस्खे अपनाकर आपसे अधिक खर्च करवाते हैं या आपसे उन चीजों की खरीदारी करवाते हैं, जिन्हें वे बेचना चाहते हैं। खरीदारी के फैसले पर प्रभाव डालने के लिए रिटेलर कई तरह के मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाते हैं।

 
कारोबार के तरीके में जो बदलाव हुआ है, उससे पैदा हुई परिस्थितियों के कारण ही रिटेल अधिक छूट दे पा रहे हैं। मैंनेजिंग कंसल्टिंग कंपनी टेक्नोपैक के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अरविंद सिंघल कहते हैं, 'अगर एक दशक पहले रिटेलर को 35 प्रतिशत मार्जिन मिलता था तो अब यह बढ़कर 45 से 50 प्रतिशत तक हो गया है। इस वजह से उनके लिए छूट देना अधिक आसान हो गया है।' लेकिन छूट के चक्कर में गैर जरूरी सामान का अंबार लगाने से बचने के लिए खरीदारों को सामान की सूची बनानी चाहिए और उसी हिसाब से खरीदारी करनी चाहिए। खरीदारी से पहले अपना बजट देख लें और अचानक या हड़बड़ी में खरीदारी करने से बचें।
 
ऑनलाइन रिटेलर
 
ग्राहकों को अपनी ओर खींचने के लिए ई-कॉमर्स कंपनियां कई तरीके अपनाती हैं, जिनमें कूपन, कोड, रेफरल, जानबूझ कर सीमित स्टॉक दिखाना शामिल हैं। लॉयल्टी प्रोग्राम के अलावा वे किसी सामान का खुदरा मूल्य काफी अधिक दिखाकर उन पर छूट की पेशकश कर अंत में ही उतनी ही कीमत पर बेचते हैं, जिनकी उनकी वास्तविक कीमत होती है।
 
चुटकियों में खत्म
 
मोबाइल कंपनियां इस कला में माहिर हैं। उनके ज्यादातर उत्पाद कुछ खास दिनों में फ्लैश सेल में बेचे जाते हैं, जो कुछ ही सेकंड में खत्म हो जाते हैं। जो लोग इस दौरान फोन खरीद लेते हैं वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं। दूसरे उत्पादों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। बड़ी सेल के दौरान कुछ ही वस्तुओं पर छूट रहती है और यह भी बता दिया जाता है कि अमुक उत्पाद का स्टॉक सीमित है। ऐसे संदेश देखकर खरीदार जल्दबाजी में उतनी ही कीमत में मामला निपटा देते हैं। ई-वाणिज्य कंपनियां बिक्री के लिए एक खास अवधि भी तय कर देती हैं। कैशकरो डॉट कॉम की सह-संस्थापक स्वाति भार्गव कहती हैं, 'इस समय जो सेल चल रही हैं, उनमें सीमित अवधि के लिए उपलब्ध फ्लैश सेल में तेजी देखने को मिली है।'
 
कीमत में चतुराई
 
उत्पाद बेचने के लिए कंपनियां कई नुस्खे आजमाती हैं। मोटे तौर पर आप तीन तरह के उत्पाद देखते हैं। इनमें एक महंगा उत्पाद होता है, जिसमें कुछ खूबियां होती है, जबकि दूसरा अपेक्षाकृत सस्ता उत्पाद होता है और तीसरा उत्पाद इन दोनों के  बीच के दायरे में आता है। कंपनियां इस पर सबसे लोकप्रिय होने का ठप्पा लगा देती हैं। प्रीमियम उत्पाद की कीमत इतनी ऊंची रखी जाती है कि ग्राहक इसकी खरीदारी से गुरेज करते हैं। ऐसे में ज्यादातर खरीदार लोकप्रिय उत्पादों का रुख कर लेते हैं क्योंकि उन्हें ये ही सबसे आकर्षक लगते हैं।
 
मुफ्त डिलिवरी का वादा
 
जो स्टोर किराना सामग्री बेचते हैं, वे इस चोचले का जमकर इस्तेमाल करते हैं। कोई भी ग्राहक सामान दुकान से घर तक पहुंचाने पर एक पाई भी खर्च करना नहीं चाहता। इसलिए स्टोर तभी मुफ्त में सामान घर पहुंचाने यानी होम डिलिवरी करने का वादा करते हैं जब निश्चित राशि से अधिक खरीदारी की जाती है। मुफ्त डिलिवरी का लाभ लेने के लिए खरीदार उन चीजों की खरीदारी भी कर लेते हैं, जिनकी तत्काल कोई जरूरत नहीं होती है। आजकल सेल में कुछ कंपनियां कुछ खास समय तक मुफ्त डिलिवरी की पेशकश करती हैं।
 
फिजिकल स्टोर
 
छूट का राज: सामान बेचने के लिए फिजिकल स्टोर भी कई दांव अपनाते हैं। उनकी छूट की पेशकश किसी गुत्थी से कम नहीं होती है। खरीदार को पहले समझ लेना चाहिए कि उन्हें वास्तव में कितनी छूट मिल रही है। कंसल्टिंग कंपनी थर्ड आईसाइट के सीईओ देवांग्शु दत्ता कहते हैं, 'अगर कोई स्टोर सीधी छूट, मान लें, 50 प्रतिशत छूट की पेशकश करता है तो ग्राहकों को लगता है कि उन्हें आधी कीमत पर वस्तु मिल जाएगी। उन्हें यह भी लगता है कि जब स्टोर पूरी कीमत पर सामान बेचते हैं तो वे अच्छा खासा मुनाफा काटते हैं।' दरअसल छूट इस तरह दी जाती है कि ब्रांड वैल्यू पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
 
उलझाने वाले आंकड़े 
 
कई स्टोर एक उत्पाद खरीदने पर दो मुफ्त या तीन खरीदने पर चार मुफ्त उत्पादों की पेशकश करते हैं। मोटे तौर पर ऐसे मामलों में ग्राहकों को सबसे अधिक कीमत वाले उत्पाद का पूरा दाम चुकाना पड़ता है। छूट कम कीमतों वाली वस्तुओं पर दी जाती है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सात कमीज खरीदता है। पहली तीन कमीज की कीमत 6,000 रुपये है और बाकी चार की कीमत 6,000 रुपये है। ऐसे मामले में छूट 50 प्रतिशत रह जाती है। हां, आपको एक अतिरिक्त कमीज जरूर मिल जाती है। एक तरीका यह भी होता है कि ग्राहक को सबसे ऊंची कीमत वाली कमीज का पूरा भुगतान करना होता है और दूसरी वस्तु पर छूट मिलती है। उदाहरण के तौर पर कोई ग्राहक एक जींस पूरी कीमत देकर खरीदता है तो उसे दूसरी जींस पर 50 प्रतिशत छूट दी जाती है। अगर प्रत्येक की कीमत 2,000 रुपये है तो कुल बिल 3,000 रुपये होता है। इस तरह छूट 25 प्रतिशत की मिलती है। एक तरीका दोहरी छूट देने का होता है। सीधे 50 प्रतिशत छूट देने के बजाय रिटेलर वास्तविक कीमत 25 प्रतिशत कम कर उस पर फिर 25 प्रतिशत छूट की पेशकश करता है। उदाहरण के लिए वस्तु की कीमत 1,000 रुपये है तो दोहरी छूट के बाद उत्पाद की कीमत घटकर 562.50 रुपये रह जाती है। इस तरह लोग 50 प्रतिशत मानते हैं मगर असल में छूट 44 प्रतिशत ही रह जाती है।
 
चुनिंदा छूट
 
कई स्टोर छूट के बारे में बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर रखते हैं। लेकिन उनमें सबसे नीचे चुपके से महीने अक्षरों में यह भी लिख देते हैं कि छूट चुनिंदा उत्पादों पर ही है। दत्ता कहते हैं, 'ग्राहक जब स्टोर पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि छूट कुछ ही वस्तुओं पर है और उसे मायूसी हाथ लगती है। अक्सर ग्राहक उत्पाद खरीद लेते हैं, जिन पर छूट नहीं होती है।'
 
ग्राहकों को भ्रमित करना
 
अगर कोई खुदरा कारोबारी तेजी से उत्पाद बेचना चाहता है तो वह इस पर छूट देगा और इसे किसी महंगे उत्पाद के इर्द-गिर्द रख देता है। ग्राहकों को लगता है कि कम कीमत वाली वस्तु अधिक फायदमंद लग रही है और ऊपर से इस पर मिलने वाली छूट उसे और आकर्षक बना देती है।
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