बिजनेस स्टैंडर्ड - बुनियादी क्षेत्र में भी आए कर कटौती जैसी व्यवस्था
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बुनियादी क्षेत्र में भी आए कर कटौती जैसी व्यवस्था

श्याम पोनप्पा /  October 04, 2019

अगर कच्चे माल की लागत में समुचित कटौती की गई तो इससे उत्पादकता बढ़ाने में काफी सहायता मिल सकती है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
कर कटौती को लेकर संभवत: सरकार का सोचना यह है कि इससे राजस्व का जो भी नुकसान हो रहा है, दीर्घावधि में उससे ज्यादा हासिल होगा। हम भी इस बात को सहर्ष मान रहे हैं। इसके बावजूद इस दलील को व्यक्तिगत और उपभोक्ता करों तक नहीं बढ़ाया जा रहा है। यही नहीं इसे बुनियादी ढांचा क्षेत्र के कच्चे माल पर भी लागू नहीं किया गया जबकि इससे लागत कम करने में मदद मिलती। खासतौर पर संचार के लिए इस्तेमाल होने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम, कोयला और बिजली के क्षेत्र में।
 
कॉर्पोरेट कर में कटौती का निर्णय बहुत अच्छा है। इसे बहुत पहले अपना लिया जाना चाहिए था। इस विषय में कुछ बातें हैं जिनके बारे में प्रभावशाली तबके और नीति निर्माता सोचेंगे और शीघ्र कदम उठाएंगे। मूल चिंता अंत:संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर है। मसलन डिजाइन तैयार करने से लेकर क्रियान्वयन तक। इसके अतिरिक्त मांग के मोर्चे पर भी सुसंगतता कायम करनी होगी क्योंकि उसके बिना हमें अपेक्षित नतीजे नहीं मिल सकते। कई लोगों ने मांग बढ़ाने के लिए उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन देने के बजाय कर कटौती अपनाने को लेकर आशंका प्रकट की है। कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे सुधार दुनिया भर में वृद्धि पैदा कर पाने में नाकाम रहे। 
 
ये चिंताएं सही हो सकती हैं लेकिन ऐसी तुलना में अहम मानक यह है कि परिस्थितियां समतुल्य हैं या अलग। उदाहरण के लिए क्या बाजार बड़े हैं और उनमें विस्तार की संभावना है या नहीं? विविधता है या नहीं? कहीं बाजार संतृप्त तो नहीं हैं वगैरह, वगैरह। हालांकि शेयर बाजार ने इस पर बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया दी लेकिन विशेषज्ञों का मत बंटा हुआ था क्योंकि मांग कमजोर थी और ये प्रोत्साहन आपूर्ति क्षेत्र को दिया गया था। एक और वजह यह है कि ज्यादा कर चुकाने वाली कंपनियों को सबसे अधिक लाभ होता है जबकि ज्यादातर कंपनियां प्रत्यक्ष तौर से लाभ नहीं कमा रही हैं। सर्वाधिक करदाताओं के लिए मुनाफा 11 फीसदी तक बढ़ेगा जबकि एफएमसीजी कंपनियां मसलन एचयूएल, आईटीसी तथा नेस्ले का मुनाफा 9 फीसदी तक बढ़ सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी और औषधि कंपनियों के मुनाफे में 5 से 6 फीसदी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। मौजूदा वाहन निर्माताओं को इस मंदी में प्रत्यक्ष लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। हालांकि नई कंपनियों को 17 फीसदी कर चुकाना होगा जो सिंगापुर के बराबर है। बहरहाल कई वाहन कलपुर्जा निर्माता कंपनियां जो अब तक 29 से 35 फीसदी तक कर दे रही थीं, उनके मुनाफे में 4 से 10 फीसदी का इजाफा होगा। क्रिसिल ने 80 क्षेत्रों में करीब 1,000 कंपनियों का अध्ययन किया और पाया कि मुनाफे में कुल मिलाकर 37,000 करोड़ रुपये का इजाफा होगा। जबकि स्टेट बैंक ने करीब 3,500 कंपनियों के आधार पर (इस समाचार पत्र ने 490 कंपनियों के आधार ) अनुमान लगाया है कि मुनाफे में 45,000 करोड़ रुपये का सुधार होगा। इंडिया रेटिंग्स ने इसके 60,000 करोड़ रुपये रहने की बात कही। इस मुनाफे के चलते कीमतों में कमी आ सकती है जिससे मांग बढ़ेगी। 
 
बहरहाल देश की कर दरें अभी भी प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। इसी समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित एक आलेख में कहा गया कि प्रभावी कर दर की बात करें तो अभी भी लाभांश पर कर और शेयर पुनर्खरीद को जोडऩे पर यह मौजूदा विनिर्माताओं के लिए 46.2 फीसदी तथा नए विनिर्माताओं के लिए 41.1 फीसदी है। वियतनाम और थाईलैंड में यही दर 20 फीसदी और इंडोनेशिया तथा चीन में 25 फीसदी है। बुनियादी ढांचे में सुधार (मसलन पानी, बिजली, सीवरेज और कचरा प्रबंधन, संचार, परिवहन और लॉजिस्टिक आदि) और विधि व्यवस्था आदि के क्षेत्र में कुछ कदम उठाकर आपूर्ति क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है। एक मांग स्थिर और सक्रिय जीएसटी व्यवस्था की है जहां दरों में कमी हो और जो आय कर कटौती से मेल खाए। यदि समय, ऊर्जा और धन को सही तरीके से इन क्षेत्रों में निवेश किया जाए तो संभावनाओं का काफी विस्तार हो सकता है। इसके पश्चात कौशल और शिक्षा की मदद से व्यवस्थित विकास को आगे ले जाया जा सकता है। 
 
कर छूट और बुनियादी ढांचा
 
व्यवस्थित विचार प्रक्रिया, विस्तृत प्रक्रिया प्रवाह और परियोजना प्रबंधन के क्षेत्र में व्याप्त कमियों के अलावा मुक्त बाजार के विचार तथा किसी भी प्रकार की औद्योगिक नीति के प्रयोग को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि सामाजिक नियोजन वाली अतीत की गलतियों के उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं। यहां हमें पेशकदमी करनी होगी। या तो कॉर्पोरेट कर छूट की तरह की सुविधा प्राप्त होगी या फिर नाकामी हाथ लगेगी। 
 
विकास संबंधी प्राथमिकता के लिए डिजिटलीकरण
 
ब्रॉडबैंड और डिजिटलीकरण के क्षेत्र में हमारे प्रयास निराश करने की हद तक निष्प्रभावी हैं। यह एक ऐसा उदाहरण है जहां हमें ब्रॉडबैंड के विकास में चीन के रुख को प्राथमिकता से अपनाना चाहिए। इसे एक मजबूत औद्योगिक नीति के माध्यम से गति देनी चाहिए। चीन में इसने महत्त्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाई और चीन के लोगों को इसका आर्थिक लाभ भी मिला। भारत के लक्ष्य भी इससे अलग नहीं हैं लेकिन ब्रॉडबैंड को अपनाने की विस्तृत योजना और विनिर्माण को बढ़ावा नजर नहीं आता। बिना विस्तृत और कदम दर कदम प्रस्तावों के ई-सेवाओं से उम्मीद बांध ली गई है। चीन में ब्रॉडबैंड नेटवर्क को आखिरकार सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के रूप में चिह्नित कर लिया गया और उसे सरकारी योजनाओं में शामिल किया गया। वहां स्पेक्ट्रम की नीलामी नहीं की गई। राज्य का स्वामित्व इसकी बुनियाद थी और ब्रॉडबैंड में निजी निवेश विभिन्न इमारतों और सार्वजनिक सुविधाओं (हवाई अड्डे, सबवे, राजमार्ग) आदि में सेवा की पहुंच बनाने में किया गया। इस दौरान 
 
नीतिगत रूप से यह सुनिश्चित किया गया कि सभी सेवा प्रदाताओं को समान पहुंच मिल सके। दो अन्य घटनाएं इससे जुड़ी हुई हैं। एक है स्पेक्ट्रम और बुनियादी ढांचे की साझेदारी। जुलाई में ब्रिटेन ने कारोबारी जगत, संगठनों और मोबाइल कंपनियों को आवंटित तीन बैंड तक सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित कर दी। कोई भी न्यूनतम शुल्क देकर इनका इस्तेमाल कर सकता था। दूसरा है करीब 185,000 कर्मचारियों वाली बीएसएनएल और एमटीएनएल की खस्ता हालत। कर रियायत की तरह सरकार निजी क्षेत्र के साथ सलाह मशविरे और भागीदारी से कुछ ऐसे कदम उठा सकती है:
 
केंद्रीकृत/क्लाउड रेडियो पहुंच नेटवर्क के साथ लाभकारी साझा बुनियादी नीति को अपनाना।

भुगतान आधारित इस्तेमाल तय करके तमाम उपलब्ध स्पेक्ट्रम तक पहुंच उपलब्ध कराना।

सार्वजनिक सुरक्षा और जनहित के लिए बीएसएनएल और एमटीएनएल को अंशधारक बनाना और निजी सेवा प्रदाताओं के साथ एक समूह का गठन। 
 
यदि हम इस रुख को विस्तार दें और सामूहिक लाभ के लिए इसे तमाम संसाधनों से जोड़ें तो हमारे हित कम लागत में पूरे हो सकते हैं। 
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