बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक हकीकत और कर कटौती का सच
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आर्थिक हकीकत और कर कटौती का सच

देवाशिष बसु /  October 03, 2019

देश की अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत के बीच कॉर्पोरेट कर में कटौती को बड़े सुधारों की शुरुआत मानने की कोई ठोस वजह नहीं है। समूचे परिदृश्य पर अपनी राय रख रहे हैं देवाशिष बसु

 
विगत 20 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉर्पोरेट कर में कुछ नाटकीय कटौती करने की घोषणा की जिसका लाभ एशियन पेंट्स, नेस्ले, हिंदुस्तान लीवर, बजाज फाइनैंस, एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े करदाताओं को होगा। इस कटौती से नई कंपनियों को भी फायदा होगा। उन्हें अब 17.01 फीसदी कर चुकाना होगा। इस घोषणा ने शेयर बाजार को जबरदस्त गति प्रदान की और उसी दिन  बाजार 5.3 फीसदी तथा उससे अगले सोमवार को 2.8 फीसदी की उछाल के साथ बंद हुए। यह हालिया इतिहास में दो दिन की सबसे बड़ी तेजी रही। परंतु वास्तविक प्रभाव मनोवैज्ञानिक ही रहा। 
 
बातों को बढ़ाचढ़ाकर देखना मानव स्वभाव है। यही कारण है कि उम्मीदों को पर लग गए। लोग यह मान बैठे हैं कि यदि प्रधानमंत्री मोदी अचानक ऐसा साहसी और नाटकीय कदम उठा सकते हैं तब तो बड़े आर्थिक सुधार उनकेलिए बच्चों का खेल हैं। वर्ष 2014 से ही कारोबारी और निवेशक इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। पांच वर्ष तक वे यह मानते रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को पता है कि विकास दर को बढ़ाने के लिए उसे क्या करना है। सिने अभिनेताओं के प्रशंसकों की तरह प्रधानमंत्री मोदी में उनका यकीन बरकरार रहा। आज भी प्रधानमंत्री मोदी को सही इरादों और मजबूत इच्छाशक्ति वाला नेता माना जाता है।
 
नोटबंदी जैसी भारी चूक और वस्तु एवं सेवा कर के खराब क्रियान्वयन के बावजूद लोगों का यह विश्वास डिगा नहीं है। जबकि इन दो कदमों ने आपूर्ति शृंखला को हिला दिया और अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया। इसके बावजूद जुलाई में आम बजट के ऐन पहले बाजार अब तक के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि निवेशकों को एक बड़े बदलावकारी बजट की आशा थी। आखिरकार, प्रधानमंत्री मोदी एक प्रचंड बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता में आए थे। निवेशकों को लग रहा था कि इस बार बड़े सुधारों की राह में कोई बाधा नहीं है।
 
हकीकत इससे अलग थी। बीते कुछ महीनों के दौरान हर आर्थिक संकेतक नकारात्मक रहा है। बढ़ती बेरोजगारी, कमजोर निर्यात वृद्धि, दंडात्मक कर, कर आतंक, ढहता सार्वजनिक क्षेत्र, पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि का गिरकर 5 फीसदी हो जाना (पुराने तरीकों से आकलन करें तो यह महज 3.5 फीसदी है), वाहनों की बिक्री 20 वर्ष के निचले स्तर पर है, विनिर्माण में कोई वृद्धि नहीं हो रही और वित्तीय सेवाओं और बैंकिंग में संकट के बादल छाए हुए हैं। ये सारी बातें मिलकर हालात को और खराब कर रही हैं और सरकार के कट्टर समर्थक भी इनकी अनदेखी नहीं कर पा रहे हैं। जब लगने लगा था कि चीजें हाथ से निकलती जा रही हैं तब सरकार ने भारी कर कटौती की घोषणा कर दी और प्रधानमंत्री मोदी में लोगों का भरोसा बहाल हो गया। हम फिर बड़े सुधारों के अगले दौर की प्रतीक्षा करने लगे।
 
वृद्धि का ढांचा
 
ये सुधार कौन से हो सकते हैं? दुनिया भर की आर्थिक सफलताओं के किस्सों को देखें तो वे हमें बताते हैं कि कौन सी बातें सफल होती हैं। एक संतुलित, निरंतर और समान वृद्धि के लिए जमीन, श्रम और पूंजी की बेहतर उत्पादकता आवश्यक है। दुनिया भर का अनुभव हमें बताता है कि उच्च उत्पादकता के दो वाहक हैं: पहली, एक सच्ची बाजार आधारित अर्थव्यवस्था जो आर्थिक कारकों को प्रतिस्पर्धा और प्रोत्साहन दोनों मुहैया कराती हो। इससे कीमतें कम और स्थिर बनी रहती हैं। इससे खपत और निवेश को बढ़ावा मिलता है। दूसरा, एक नियामकीय शासन और न्याय व्यवस्था जो अच्छे कारोबारियों को प्रोत्साहित करे और बुरे कारोबारियों को दंडित। इनके अलावा आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने का कोई परखा हुआ तरीका नहीं है। सन 1990 के दशक में आया बहु प्रशंसित उदारीकरण ये दोनों ही काम करने में नाकाम रहा। यही कारण है कि हमें भ्रष्टाचार, फंसे हुए कर्ज और मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ा। अर्थव्यवस्था को इनसे उबरने में ही दशक भर का समय लग गया। बाद की सरकारों ने विकृत पूंजीवाद के जरिये हालात और बिगाड़ दिए।
 
अगर हालिया कर कटौती ऐसे किसी सुव्यवस्थित ढांचे से उपजी होती तो यह कहीं अधिक बदलावकारी साबित होती। ऐसा कोई ढांचा मौजूद नहीं है। प्रोत्साहन और प्रतिस्पर्धा को गति देने के लिए हमें कारोबारों में प्रवेश और निर्गम को सहज बनाना होगा। हमारे यहां ऐसा नहीं है। कारोबार शुरू करने के लिए दर्जनों मंजूरियों की आवश्यकता होती है। इनमें कई तो बेतुकी होती हैं। इन्हें चलाने की लागत अच्छी खासी होती है और बंद करना भी उतना ही मुश्किल होता है। भूमि अधिग्रहण बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
 
संचालन, नियमन और न्याय व्यवस्था भी कोई खास बेहतर नहीं है। केंद्रीय बैंक बैंकों तथा वित्तीय कंपनियों की निगरानी में बारंबार नाकाम रहा है। बुनियादी ढंाचा क्षेत्र के नियामकों का व्यवहार और राजस्व अधिकारियों की वसूली की प्रवृत्ति बाजार अर्थव्यवस्था के लिए कम घातक नहीं है। इसके चलते काफी समय और संसाधन बरबाद होते हैं। आम जनता की नजर से दूर सरकारी परियोजनाओं की निविदा व्यवस्था में गड़बडिय़ां हैं। इसका असर उत्पादकता पर पड़ता है और भ्रष्टाचार पनपता है। कर कटौती के पीछे सोच सुव्यवस्थित बदलाव की नहीं थी। इसका चाहे जितना स्वागत किया जाए लेकिन यह एकबारगी उठाया गया कदम था। सच तो यह है कि अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतक आज 2013 से भी बुरी स्थिति में हैं। सन 2013 में भ्रष्टाचार, विकृत पूंजीवाद और नीतिगत पंगुता से त्रस्त भारत ने मोदी को तमाम आशाओं का केंद्र बना लिया था। यदि कर कटौती आर्थिक दर्शन का हिस्सा होती तो उसे बजट में स्थान मिला होता। यह सही है कि इस कर कटौती का असर इतना व्यापक है कि इसने बजट को पूरी तरह बदल दिया। फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह खपत बढ़ाकर मांग में इजाफा कैसे करेगा।
 
कर कटौती, जुलाई में आए निराश करने वाले बजट के बाद अगस्त में शुरू हुई छह संवाददाता सम्मेलनों की शृंखला के आखिर में की गई। यह दर्शाता है कि यह जीडीपी वृद्धि दर में आई भारी गिरावट के बाद जल्दबाजी में उठाया गया कदम था। हम यही आशा कर सकते हैं कि यहां से आगे सरकार उत्पादकता, मांग और संचालन बेहतर करने पर ध्यान केंद्रित करेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो कर कटौती से जुड़ी भारी-भरकम आशाएं भी झूठी साबित होंगी।
Keyword: nirmala sitaraman, economy, corporate tax,,
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