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आसान नहीं होगा प्लास्टिक के इस्तेमाल से निजात पाना

सुरजीत दास गुप्ता /  October 02, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए 2 अक्टूबर (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती) से लोगों से एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक (एसयूपी) का उपयोग बंद करने का आह्वान किया था। कंपनी जगत ने भी उनके इस सपने को पूरा करने के लिए कमर कस ली। इसकी मुख्य वजह यह है कि उद्योग जगत एसयूपी का बहुत इस्तेमाल होता है। पीईटी बोतलों, टेट्रा पैक, बहुस्तरीय प्लास्टिक (एमएलपी) और दूध की थैलियों में प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। प्लास्टिक के खिलाफ प्रधानमंत्री की इस लड़ाई के बारे में लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि यह महज दिखावा है और सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं है। इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया गया है और न ही सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। लेकिन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के मुताबिक वे प्लास्टिक स्ट्रॉ, कटलरी, सिगरेट के टोटे, 200 मिली से कम की पीईटी बोतलों और 50 मैक्रोन से पतली प्लास्टिक की पन्नियों के खिलाफ कार्रवाई की योजना बना रहे हैं। अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे उद्योग जगत भी इस गंभीर मुद्दे पर सक्रिय होगा। 

 
क्या इसकी जिम्मेदारी कंपनी जगत पर डालना सही है? उसने पीईटी बोतलों के पुनर्चक्रण में बेहतर काम किया है और टेट्रा पैक के मामले में भी उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। 80 फीसदी पीईटी बोतलों का पुनर्चक्रण किया जा रहा है जबकि टेट्रा पैक के मामले में यह 53 फीसदी है। लेकिन एमएलपी के पुनर्चक्रण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। स्नैक, शैंपू के सेशे और बिस्कुट के पैकेटों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। एसयूपी को हतोत्साहित करने इसकी अहम भूमिका हो सकती है। एमएलपी का पुनर्चक्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है जो पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक हो सकता है।
 
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक भारत में रोजाना 26,000 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है जिसमें से छह फीसदी एमएलपी है। लेकिन कई लोगों का मानना है कि खासकर शहरों में एमएलपी का हिस्सा कहीं अधिक है। जमीनी स्तर पर काम करने वाले एक शोध संगठन एलायंस फॉर इनसाइनरेटर ऑल्टरनेटिव्स ने पिछले साल 18 राज्यों में 15 शहरों में निकलने वाले प्लास्टिक कचरे का अध्ययन किया था। इसके मुताबिक एमएलपी में ब्रांडेड प्लास्टिक कचरे का हिस्सा 60 फीसदी था। समस्या यह है कि एमएलपी प्लास्टिक को धातु से अलग करना काफी जटिल और महंगी प्रक्रिया है। इसलिए कूड़ा बीनने वालों को इसे एकत्र करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है और इस पैकेजिंग का पुनर्चक्रण नहीं हो पाता है और यह पारिस्थितिकी तंत्र में रह जाता है। दूसरी समस्या दूध की थैलियों की है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयरनमेंट (सीएसई) के मुताबिक केवल 15 से 20 फीसदी थैलियों का पुनर्चक्रण होता है। कंपनी जगत एमएलपी पर कुछ रास्ता खोजने का प्रयास कर रहा है। 30 भारतीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने प्रयासों को तेज करने के लिए वी केयर नाम से एक कंसोर्टियम बना रही हैं। इसमें पेप्सिको इंडिया, नेस्ले इंडिया, परफेटी, डाबर और धर्मपाल सत्यपाल शामिल हैं। यह कंसोर्टियम एमएलपी एकत्र करेगा और वैकल्पिक उपाय सुझाएगा। 
 
क्या यह काम करेगा? 2016 में सरकार ने प्लास्टिक कचरा प्रंबधन नियमों के तहत दो साल में एमएलपी का इस्तेमाल बंद करना अनिवार्य कर दिया था। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने एमएलपी की परिभाषा में बदलाव करके कंपनियों को इस समयसीमा से बचने का मौका दे दिया। साथ ही नियमों में यह नहीं बताया गया है कि एमएलपी अपशिष्ट उत्पादकों को कितना कचरा एकत्र करना चाहिए। इससे उन्हें चुप्पी साधने का मौका मिल गया है। वास्तविकता यह है कि एमएलपी का पुनर्चक्रण एक वैश्विक चुनौती है। सीएसई में कचरा प्रबंधन के कार्यक्रम की प्रमुख स्वाति सिंह संब्याल ने कहा, समस्या यह है कि एमएलपी का कोई पैकेजिंग विकल्प नहीं दिख रहा है। इसलिए इसमें बहुत शोध एवं विकास की जरूरत है। उदाहरण के लिए उद्योग एमएलपी में इस्तेमाल होने वाले पॉलिमर के मानकीकरण पर काम कर रहा है ताकि पुनर्चक्रण को आसान बनाया जा सके।
 
वी केयर एमएलपी को एकत्र करने और ठिकाने लगाने के विभिन्न तरीकों पर काम कर रहा है। इन विकल्पों में इसे सीमेंट की भट्टियों में वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने, बिजली बनाने, सड़क निर्माण में उपयोग करने और फर्नीचर बनाने में इस्तेमाल करना शामिल है। वी केयर के अध्यक्ष अतुल सूद ने कहा, 'प्लास्टिक के टिकाऊ प्रबंधन के लिए हमारा जोर ऐंड टु ऐंड व्यवस्था बनाने पर है। हमें यह भी देखना होगा कि एक बहुत बड़ा असंगठित क्षेत्र भी है जो अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए कटिबद्घ नहीं है।'
 
कंपनी जगत ने पीईटी बोतल जैसे क्षेत्रों में कारोबारी मजबूरी के चलते साहसिक कदम उठाए हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज अहम कच्चा माल रेजिन मुहैया कराती है। यह सालाना दो अरब पीईटी बोतल प्रोसेस करती है और कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक दो साल में इसे बढ़ाकर 6 अरब करने की योजना है। कई अन्य कंपनियों की तरह कंपनी इसे पॉलिएस्टर फाइबर में बदलती है और कुछ का इस्तेमाल फैशन परिधान बनाने में किया जाता है। जेम रिसाइक्लिंग अपने नेटवर्क के जरिये पीईटी बोतल एकत्र करती है। वह कूड़ा बीनने वालों को एक किलो पीईटी बोतल के लिए 20 रुपये देती है। यह दूसरे तरह के प्लास्टिक से ज्यादा आकर्षक है। जेम उन्हें ग्रेन्यूल में बदलती है जिसे फिर टेक्सटाइल उद्योग को बेचा जाता है। कंपनी के निदेशक सचिन शर्मा ने कहा, 'कूड़ा बीनने वालों को भुगतान करने, वॉशिंग, सेग्रिगेशन और बेलिंग पर प्रति किलो 30 रुपये खर्च आता है। हम इसे 33 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचते हैं। हम जिन कपंनियों को बोतल बेचते हैं, उनसे धागे खरीदते हैं और फिर अपने ब्रांड के तहत टी-शर्ट, थैले और जैकेट बनाते हैं।'
 
कई कंपनियों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार ने अभी तक एसयूपी की परिभाषा तय नहीं की है। वे सवाल उठाती हैं कि सीपीसीबी एसयूपी को पुनर्चक्रित प्लास्टिक के तौर पर कैसे परिभाषित कर सकता है और इसे प्रतिबंध के दायरे में ला सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मनमानी पाबंदी से नौकरियों पर गंभीर असर पड़ेगा। संब्याल ने कहा, '50 माइक्रोन से पतली थैलियां या प्लास्टिक कटलरी असंगठित क्षेत्र में बनती हैं। ऐसे में कई नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी। इन लोगों को कपड़े के थैले बनाने की वैकल्पिक व्यवस्थाओं में लगाया जा सकता है। आप रातोरात ऐसा नहीं कर सकते हैं।'
 
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि 50 माइक्रोन से पतली थैलियों पर प्रतिबंध नाकाम हो सकता है क्योंकि कंपनियां 50 माइक्रोन से मोटी थैलियां बनाना शुरू कर देंगी जो कपड़े से सस्ती हैं और ग्राहक इनका दोबारा इस्तेमाल कर सकता है। साथ ही यह एसयूपी के दायरे से बाहर होंगी। इस तरह प्लास्टिक पर प्रतिबंध का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा। ग्राहकों को भी प्लास्टिक का उपयोग घटाने का कोई आर्थिक फायदा नहीं दिखता है। उद्योग का कहना है कि 100 रुपये में प्लास्टिक की 400 थैलियां मिल सकती हैं जबकि कपड़े के एक थैले की कीमत 10 रुपये से 150 रुपये होगी। 
 
सीपीसीबी भी सतर्कता के साथ आगे बढ़ रहा है और उपभोक्ता मामले तथा खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय व्यावहारिक नीति बनाने पर जोर दे रहे हैं। दूध की थैलियां अभी प्रतिबंध के दायरे में नहीं हैं। इसी तरह 200 मिमी से छोटी प्लास्टिक बोतलों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है और इस तरह उसने एक तरह से बेवरिजेज उद्योग को छूट दे दी है। केवल दो ब्रांड ही 200 मिमी से छोटी पानी की बोतल बनाते हैं। सरकार का जोर 50 माइक्रोन से पतली प्लास्टिक की थैलियों पर है। कई राज्यों ने इन पर प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। सवाल यह है कि क्या मोदी देश को प्लास्टिक के ज्यादा जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल के लिए प्रेरित कर पाएंगे? 
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