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वैश्विक प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से लें सीख

शुभमय सिकदर /  October 02, 2019

भारत में एकबारगी इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को खत्म करने को लेकर बहस तेज हो रही है, जो यह दर्शाती है कि इससे पैदा होने वाली पारिस्थितिकी चुनौतियों को लेकर दुनियाभर में बेचैनी बढ़ती जा रही है। देश में रोजाना 15,342 टन प्लास्टिक कचरा (टेरी, 2018) पैदा होता है और इसके विनिर्माता उद्योग को आम चर्चा में गुनहगार ठहराया जाता है। ऐसे में देश में सरकार और उद्योग दुनियाभर में अपनाई जाने वाली सफल प्लास्टिक कचरा प्रबंधन रणनीतियों से कुछ सीख सकता है। 

 
दुनियाभर में इस इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां, स्थानीय संस्थाएं और आम जनता नए समाधान खोजने की कोशिश कर रही हैं। वे स्पष्ट नियम तय कर रहे हैं और इन नियमों का कड़ाई से पालन कर रहे हैं। इसके  अलावा लोगों को रिसाइक्लिंग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारत में भी कई नियम लागू हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ देशों में सफलता का स्तर उन्हें अनुकरणीय बनाता है। इस दिशा में आगे बढऩे से पहले यह चीज ध्यान में रखी जानी चाहिए कि भारतीय कंपनियों ने प्लास्टिक कचरे और रिसाइक्लिंग की समस्या से निपटने के लिए शुरुआती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। 
 
सरकार ने कई प्रदूषण उत्पादों पर प्रतिबंध की घोषणा की है। इसके बाद पीईटी पैकेजिंग एसोसिएशन ने स्वच्छ पर्यावरण के लिए यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि भारत में 90 फीसदी पीईटी बोतलों की रिसाइक्लिंग होती है। ये आंकड़े उत्साहजनक हैं। लेकिन हम पश्चिमी देशों की कंपनियों से बहुत पीछे हैं, जिन्होंने उनका समुचित उपयोग करने के तरीके खोज लिए हैं। टेरी के निदेशक और सीनियर फेलो (पर्यावरण एवं कचरा प्रबंधन खंड) सुनील पांडेय कहते हैं कि इन देशों में से कुछ में पीईटी बोतलों को नई बोतलों में बदला जाता है, जबकि भारत में उन्हें अन्य पैकेजिंग सामग्री बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट (सीएसई) की कार्यक्रम प्रबंधक (पर्यावरण प्रशासन एवं कचरा प्रबंधन) स्वाति सिंह संब्याल ने कहा, 'यह डाउनसाइक्लिंग है, रिसाइक्लिंग नहीं । भारत में पीईटी से पीईटी नहीं बनाई जाती है। इसे निम्न ग्रेड के उत्पाद बनाने में इस्तेमाल किया जाता है और चार से पांच चक्रों के बाद इसे आगे रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है।'
 
देश में इसी स्तर पर समस्या है। भारत में प्लास्टिक की प्रति व्यक्ति खपत सालाना 12 किलोग्राम है, जबकि यह चीन में 30 किलोग्राम प्रति वर्ष और अमेरिका में 109 किलोग्राम प्रति वर्ष है (स्रोत अखिल भारतीय प्लास्टिक विनिर्माता संघ या एआईपीएमए)। हालांकि देश में बड़ी आबादी होने के कारण कुल खपत का आंकड़ा बहुत अधिक है। इसके अलावा एकबारगी इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक की परिभाषा अस्पष्ट है। मल्टी लेयर्ड पैकेजिंग को रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है। सांब्याल ने कहा, 'अगर आप श्रेणियों के देखेंगे तो पाएंगे कि ज्यादातर यूडीपीई का इस्तेमाल मोटी परत की पानी की बोतलें बनाने में होता है। पॉलिप्रोपलीन का इस्तेमाल शैंपू की बोतल बनाने या पीईटी बोतल बनाने में होता है, जिन्हें रिसाइकल किया जा रहा है।'
 
पांडेय ने अच्छे वैश्विक तरीकों के बारे में स्पोट्र्सवियर एडिडास और नाइक का हवाला देते हैं, जिन्होंने टी-शर्ट या अन्य उत्पाद बनाने में प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वह लेनोवो और डेल का भी उदाहरण देते हैं, जिन्होंने अपने लैपटॉप में समुद्री कचरे से प्राप्त प्लाास्टिक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ऐपल ने इस साल अप्रैल में अपने रिसाइक्लिंग कार्यक्रम का व्यापक विस्तार करने की घोषणा की थी। अमेरिकी डिसअसेंबलिंग के लिए अपना आईफोन चार जगहों पर भेज सकते हैं। कंपनी का रिसाइक्लिंग रोबोट डेजी इन फोनों को डिसअसेंबल करता है। इस साल के प्रारंभ में वॉलमार्ट कनाडा ने घोषणा की थी कि वह 2025 तक चेक-आउट प्लास्टिक बैग में 50 फीसदी कमी करेगी। इससे इस अवधि के दौरान अरब प्लास्टिक की थैलियां प्रचलन में नहीं आ पाएंगी। इसने यह भी कहा है कि जिन पीवीसी को रिसाइकिल करना मुश्किल है, उन्हें उसने बंद करने का लक्ष्य तय किया है। इसके अलावा 2025 तक अपने खुद के ब्रांडों की पॉलिस्टीरिन में पैकेजिंग करने की योजना बनाई है।  संब्याल ने कहा कि दुनियाभर में जो अच्छा काम हो रहा है, वह उन देशों में उत्पादकों की जिम्मेदारी को प्रदर्शित करता है। ये देश प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में भारत से बेहतर स्थिति में हैं। वह कहती हैं, 'जो चीज रिसाइकिल करने योग्य है, उनके 90 फीसदी रिसाइकिल होने के आसार होते हैं। पैकेजिंग उत्पादों को निपटान के लिए भेजा जाता है। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ ने सदस्य देेशों से यह प्रतिबद्धता हासिल की है कि वे एक निश्चित समयावधि में थैलियों को बंद करेंगे।' अमेरिका में कंपनियों की रणनीति निपटान केंद्रित है, लेकिन अगर आप जर्मनी और स्कैंडिनेवियाई देशों को देखते हैं तो पाते हैं कि कंपनियों और ब्रांडों ने उपभोक्ताओं को प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल से हतोत्साहित करने के लिए प्लास्टिक उत्पादों को उपयोग के बाद लौटाने की योजना और संग्रह केंद्र जैसे कदम उठाए हैं। 
 
एक अन्य उदाहरण देते संब्याल ने कहा कि जर्मनी में कुछ उद्योगों को बदलाव के लिए समय और लक्ष्य दिए गए हैं। उन्होंने कहा, 'इस कटौती को भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। सबसे पहले कुछ तरह के प्लास्टिक के उपयोग में 20 फीसदी कमी लाई जाएगी, जिसे बाद में 50 फीसदी तक किया जाएगा।' देश में प्लास्टिक प्रसंस्करणकर्ताओं की प्रतिनिधि संस्था एआईपीएमए के महानिदेशक दीपक बल्लानी कहते हैं कि भारत में कंपनियों के लिए प्लास्टिक के कचरे के प्रबंधन में चुनौतियां नगर निकायों की अनदेखी, स्पष्ट परिभाषा का अभाव और नियामकीय अड़चनें हैं। वह कहते हैं, 'प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए कोई खाका नहीं होने से उत्पादकों की जिम्मेदारी लागू नहीं हो पाई है। लेकिन स्वैच्छिक रूप से कुछ काम कर रहे हैं।'  इन चुनौतियों के बावजूद भारत में पैदा होने वाले कुल प्लास्टिक कचरे में से 60 फीसदी की रिसाइक्लिंग होती है। हाल में पेप्सिको, कोका-कोला इंडिया और पारले एग्रो ने मिलकर प्लास्टिक कचरा प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम पर 1,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है। इस मुहिम में उपभोक्ता भी एक अहम कड़ी हैं, जिन्हें इस प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहिए और उन्हें कचरे को अलग-अलग बांटने के साथ पहल करनी चाहिए। 
Keyword: plastic, waste, recycle, company,,
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