बिजनेस स्टैंडर्ड - भैंस का मांस निर्यात घटा और दबाव बढ़ा
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भैंस का मांस निर्यात घटा और दबाव बढ़ा

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली October 02, 2019

डेरी किसानों को बुरे समय का सामना करना पड़ रहा है, खासकर उत्तर भारत में। एक ओर दूध की कीमतें पिछले कुछ वर्षों में कमजोर रहने के बाद मजबूत होती दिख रही हैं, वहीं उन भैंसों की कीमत तेजी से घटी है जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया है और उन्हें मांस के लिए काटा जाना है। इस श्रेणी की भैंस को 'ड्राई बफेलो' कहा जाता है। व्यापार सूत्रों के अनुसार ड्राई बफेलो यानी गैर-दुधारू भैंस की कीमतें उत्तर भारत में 140 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई हैं जो एक साल पहले के 170-180 रुपये प्रति किलोग्राम की तुलना में 20 प्रतिशत की गिरावट है।
 
काटी जाने वाली भैंस का आकार 100 किलोग्राम से 450 किलोग्राम के बीच होता है। मवेशी आपूर्तिकर्ताओं ने डेरी मालिकों से इनकी खरीदारी में भी कमी की है क्योंकि उन्हें अपने व्यवसाय में नुकसान हो रहा है। इससे देश के पूर्वी क्षेत्रों के डेरी फार्मों में गैर-दुधारू भैंस की संख्या बढ़ी है। उत्तर प्रदेश के जेवर से डेयरी किसान सतपाल सिंह ने कहा, 'यह (गैर-दुधारू भैंस) हमारे लिए एक पुराने स्कूटर की तरह है। हम या तो कुछ लाभ के साथ इसे बेच सकते हैं या कबाड़ वैल्यू के हिसाब से इसे निकाल सकते हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, जब चारे की कीमतें और श्रम लागत तेजी से बढ़ रही है, कौन अपने उस मवेशी के लिए अच्छी कीमत पर बेचना नहीं चाहेगा जो उसके लिए आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया हो।'
 
उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि भैंस की बिक्री कीमत में गिरावट डेरी उद्योग में मंदी की वजह से नहीं आई हो, क्योंकि कुछ वर्षों के बाद दूध खरीद कीमतों में सुधार के संकेत दिख रहे हैं। सिंह के क्षेत्र में 65 प्रतिशत फैट वाले दूध की खरीद कीमत 42 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है जबकि पिछले साल यह 39-40 रुपये प्रति किलोग्राम पर थी। डेयरी मालिकों का कहना है कि गैर-दुधारू यानी बांझ भैंस की कीमत में गिरावट की बड़ी वजह भारत में गोजातीय मांस निर्यात में भारी गिरावट है। गाय के विपरीत, भैंस के मांस का कोई धार्मिक महत्त्व नहीं है और इसे काटने और निर्यात करने की कानूनी अनुमति है।
 
भैंस की सर्वाधिक आबादी वाले देशों में से एक भारत का पशु मांस निर्यात तेजी से बढ़ा है और यह अब बासमती चावल के बाद देश के कुल कृषि निर्यात में दूसरा सबसे बड़ा जिंस है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से भैंस मांस निर्यात की रफ्तार धीमी पड़ी है। वर्ष 2014-15 के 4.57 अरब डॉलर की ऊंचाई से भैंस मांस निर्यात 2018-19 के वित्त वर्ष में घटकर 3.31 अरब डॉलर रह गया जो पांच वर्ष में लगभग 27.6 प्रतिशत की गिरावट है। उद्योग के विश्लेषकों के अनुसार, वियतनाम पारंपरिक रूप से भारतीय भैंस के मांस निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाजार है और भारत से कुल खेपों में इस देश का 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है।
 
वाणिज्य मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि 2017-18 और 2018-19 के बीच वियतनाम के लिए भैंस मांस निर्यात में 28 प्रतिशत की भारी गिरावट आई। इससे पहले वियतनाम के लिए मांस निर्यात में 11 प्रतिशत की वृद्घि दर्ज की गई थी। भारत की सबसे बड़ी भैंस मांस निर्यातक एलनसंस प्राइवेट लिमटिेड के निदेशक फौजन अलवी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'वित्त वर्ष 2019-20 में, पहले पांच महीनों के रुझान से पता चलता है कि यदि चीन वियतनाम से भैंस मांस पर प्रतिबंध नहीं हटाता है तो भारत के कुल मांस निर्यात में अन्य 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।' अलवी ने कहा कि यदि केंद्र सरकार वियतनाम मार्ग के बगैर प्रत्यक्ष रूप से भैंस निर्यात की अनुमति के लिए चीन को राजी करने में तैयार रहती है तो इससे इस व्यापार को बड़ी मदद मिल सकती है क्योंकि चीन एक बड़ा बाजार है। इस बीच, कुछ निर्यातकों ने इस नुकसान (चीन के बगैर) की भरपाई के लिए नए स्थानों को तलाशना भी शुरू कर दिया है, लेकिन निर्यात की मात्रा बेहद मामूली बनी हुई है। देश के कुल सालाना दुग्ध उत्पादन में भैंस के दूध का 50 प्रतिशत से ज्यादा योगदान है और 2017-18 तक यह लगभग 17.6 करोड़ टन पर था।
Keyword: dairy, baffalo, meat,,
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