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दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स जैसी संस्था की छवि का पतन

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 02, 2019

मनमोहन सिंह कुछ दिन पहले 87 साल के हो गए। इस मौके पर मेरे दिमाग में 49 साल पहले की यादें ताजा हो गईं जब मैं पहली बार उनसे दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स (डीएसई) में मिला था। उन्होंने हमारी कक्षा को चार महीने तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार पढ़ाया था। 1960 के दशक के अंत में डीएसई में पढ़ाने वाले कई लोग ऊंचे पद तक पहुंचे। इनमें डॉ. सिंह और अमत्र्य सेन का नाम सबसे ऊपर है। लेकिन एक संस्थान के रूप में डीएसई की छवि का पतन हुआ। ज्यां द्रेज ने 1995 में प्रकाशित अपनी किताब में डीस्कूल पर एक लेख लिखा था। उनका कहना था कि यह संस्थान अपनी वास्तविक संभावनाओं को हासिल करने में नाकाम रहा। यह अर्थशास्त्र में विशेषज्ञता रखने वाले दुनिया के कई जाने माने अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को टक्कर दे सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

 
कभी-कभी मैं सोचता हूं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। 1970 के दशक की शुरुआत से अब तक संस्थान में शिक्षकों की कमी बढ़ती गई क्योंकि उन पदों पर भर्तियां नहीं की गईं। लेकिन जो कुछ शिक्षक इस संस्थान में हैं उनकी योग्यता संदेह से परे है। कॉलेज छात्रों की संख्या अब बहुत बढ़ गई है। लेकिन संस्थान और शिक्षा के स्तर में कोई कमी नहीं आई है। साथ ही परीक्षा का स्तर भी यथावत बना हुआ है।
 
तरीके को लेकर भ्रम
 
तो फिर संस्थान के साथ क्या गलत हुआ? डीस्कूल शीर्ष संस्थानों की सूची से कैसे बाहर हो गया? जब आप इसकी तह में जाते हैं तो आपको इसके पतन के असली कारण नजर आने लगते हैं। इसके लिए विश्वविद्यालय भी बराबर का जिम्मेदार है। करीब 40 वर्षों से इसे विश्वविद्यालय की तरफ से कोई सहयोग नहीं मिला है। यह हमारी व्यवस्था में गंभीर समस्या की तरफ इशारा करता है। विश्वविद्यालय शोध को ज्यादा अहमियत नहीं देते हैं। उनका जोर शिक्षा के प्रसार पर रहता है और रहना भी चाहिए।
 
साफ है कि डीस्कूल ने अपनी सबसे बड़ी गलती 1950 के दशक के उत्तराद्र्घ में की थी जब उसने अपनी स्वायत्तता छोड़ दी और दिल्ली विश्वविद्यालय का एक विभाग बनकर रह गया। इसके उलट भारतीय सांख्यिकी संस्थान ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और उत्कृष्ट संस्थान की अपनी छवि बनाए रखी है। ज्यां ने अपने लेख में लिखा कि उसने अपनी विशिष्ट खूबी को बनाए रखा और उसका जोर पूरी तरह शोध पर रहा है। लेकिन डीस्कूल में इसका उलटा हुआ क्योंकि यह दिल्ली विश्वविद्यालय का हिस्सा है। 
 
लेकिन डीस्कूल में केवल शिक्षा और शोध के कारण ही गिरावट नहीं आई है। मेरे पास इसकी एक और वजह है। यह वजह है कि संस्थान अर्थशास्त्र की दो परस्पर विरोधी बौद्घिक परंपराओं में से किसी एक को चुनने में नाकाम रहा। इनमें से एक यूरोपीय परंपरा है और दूसरी अमेरिकी। पहली परंपरा विश्लेषण पर जोर देती है जबकि दूसरी परंपरा अनुभव पर। जब वीकेआरवी राव ने इसकी स्थापना की थी तो भारत अर्थशास्त्र की ऑक्सब्रिज-एलएसई विचारधारा का गढ़ हुआ करता था। 1970 के दशक के अंत तक यही स्थिति रही। अमेरिका और आधुनिक गणित के इस्तेमाल की तरफ इसका झुकाव अचानक हुआ। पॉल सैम्यूलसन ने 1940 के दशक के अंत में एक विषय के रूप में आधुनिक गणित की शुरुआत की थी।
 
मूल रूप से 1980 के दशक से पहले अर्थशास्त्र की किसी अवधारणा को साबित करने के लिए गणितीय तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत पड़ती थी। हालांकि इस तरीके से कुछ लोग सहमत नहीं थे लेकिन इसकी एक खूबी थी। इसने आर्थिक मुद्दों के विश्लेषण में बौद्घिक स्पष्टता के लिए मजबूर किया। इस तरह की स्पष्टता का स्तर गैर-गणितीय तकनीकों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता था और न ही किया जा सकता है। इसमें लफ्फाजी के के लिए कोई जगह नहीं थी और न है।
 
अमेरिकियों का प्रवेश
 
इसके उलट अमेरिकी तरीके में पूरा पैसा वसूल किया जाता है। इसका मतलब है कि इसमें गणितीय तकनीकों के बजाय आंकड़ों को प्रमाण माना जाता है। यह ठीक है क्योंकि सिद्घांत देने वालों की ज्यादतियों के कारण इस सुधार की सख्त जरूरत थी। लेकिन इसने भारत में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी। उचित आंकड़ों के अभाव में डीस्कूल के अर्थशास्त्रियों के पास शोध के लिहाज से कोई चारा नहीं रह गया था। शोधपत्रों की संख्या बहुत कम हो गई थी। जल्दी ही संस्थान की व्यक्तिगत और संस्थागत छवि प्रभावित होने लगी। कई पेशेवर अर्थशास्त्रियों ने एक साथ देश छोड़ दिया। दूसरे लोग ऐसे पेशों में शामिल हो गए जहां गहरे शोध की जरूरत नहीं थी। तीसरी तरह के लोगों को थिंक टैंक के साथ मिलकर ही काम चलाना पड़ा। मेरी राय (संभवत: गलत) में इससे डीस्कूल में दुविधा पैदा हो गई है। उन्हें पता नहीं है कि पढ़ाई में किस चीज पर जोर देना है। पुराने यूरोपीय/ऑक्सब्रिज तरीके पर या फिर नए अमेरिकी तरीके पर। 
 
इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या डीस्कूल को अपनी स्वायत्तता मांगनी चाहिए और शोध पर जोर देना चाहिए, आर्थिक विभाग के रूप में अपनी पहचान छोड़ देनी चाहिए जिसे विश्वविद्यालय अपने पास रख सकता है? जाहिर है कि यह सवाल केवल डीस्कूल का ही नहीं है बल्कि सभी विश्वविद्यालयों को इसका सामना करना चाहिए। क्या उन्हें पढ़ाई और शोध को अलग कर देना चाहिए? मुझे लगता है कि उन्हें ऐसा करना चाहिए। यह केवल अर्थशास्त्र में ही नहीं होना चाहिए बल्कि सभी विषयों में होना चाहिए। अन्यथा हमें आशंका है कि सभी उत्कृष्ट केंद्रों का हश्र डीस्कूल की तरह हो सकता है। इससे भी बदतर स्थिति यह है कि उन्हें राजनीतिक रूप से नियुक्त और राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित कुलपतियों को झेलना पड़ेगा जो मनमाने ढंग से काम करते हैं। इनमें से कई हमें हिंदी के इस मुहावरे की याद दिलाते हैं, बंदरों के हाथ में हीरों का हार।
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