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अमेरिका के साथ भारत के कारोबारी मसलों का हल

अमिता बत्रा /  October 02, 2019

भारत और अमेरिका अहम व्यापारिक समझौते पर पहुंच सकते हैं लेकिन यह अनुमान गलत था। द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता या आर्थिक सहयोग समझौता चर्चा के बिंदुओं में शामिल नहीं था। बता रही हैं अमिता बत्रा 

 
ऐसे सप्ताह में जब अमेरिका के साथ भारत की कूटनीतिक सफलता नई ऊंचाइयों पर पहुंची, भारत और अमेरिका के बीच कारोबारी बातचीत अपेक्षाकृत खामोश बनी रही। इसमें चकित होने वाली कोई बात नहीं क्योंकि अमेरिका के करीबी साझेदार भी राष्ट्रपति ट्रंप की शत्रुतापूर्ण व्यापार नीति संबंधी कदमों से बच नहीं सके। बीते एक वर्ष में भारत को उच्च शुल्क दर, सीमित बाजार पहुंच और कारोबार के माहौल के लिए बार-बार आलोचना का सामना करना पड़ा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने हार्ली डेविडसन मोटर साइकिल पर आयात शुल्क का बार-बार उल्लेख अवश्य किया लेकिन अमेरिका ने इससे कहीं अधिक गहरे नीतिगत कदम उठाए। उसने जनरल सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस प्रोग्राम के तहत भारत तथा कुछ अन्य देशों को दी जाने वाली प्राथमिकता समाप्त कर दी। गत वर्ष जून में अमेरिका ने स्टील और एल्युमीनियम के आयात पर क्रमश: 25 फीसदी और 10 फीसदी शुल्क लगा दिया। भारत को अब इसमें रियायत नहीं मिल रही थी जबकि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को यह रियायत उपलब्ध थी। हालांकि भारत ने विश्व व्यापार संगठन के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज की लेकिन इसकी अपील संस्था की नई नियुक्तियों को लेकर अमेरिकी निष्क्रियता ने इस बहुपक्षीय संस्थान की प्रणाली को कमजोर कर दिया है। ऐसे में पंजीकृत विवादों का समय पर निस्तारण मुश्किल है। ऐसे में भारत ने भी अमेरिका से होने वाले 29 जिंसों के आयात पर शुल्क बढ़ाकर प्रतिक्रिया दी।
 
इन तमाम नीतिगत निर्णयों का भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार पर भले ही बहुत अधिक असर न पड़े लेकिन इसे तात्कालिक व्यापारिक नुकसान के रूप में नहीं देखा जा सकता बल्कि घरेलू उत्पादकों के समक्ष प्रतिस्पर्धा में भी भारी इजाफा होना तय है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय निर्यातकों को एमएफएन टैरिफ का सामना करना पड़ेगा और निर्यात बाजार में उनकी हिस्सेदारी पर भी असर होगा। उच्च शुल्क के कारण कुछ जिंस का कारोबार भी प्रभावित होगा। हाल के वर्षों में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय कारोबार में सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली है। वर्ष 2015-16 की गिरावट के बाद 2016-17 में कुल व्यापार बढ़ा। बाद के दो वर्षों में इसमें और इजाफा हुआ। वर्ष 2017-18 में अमेरिका के साथ भारत का कारोबार 15 फीसदी और 2018-19 में 18 फीसदी बढ़ा। कई वर्षों तक चीन से पीछे रहने के बाद आखिरकार 2018-19 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बन गया। दोनों देशों का कुल कारोबार 8,700 करोड़ अमेरिकी डॉलर रहा। आयात में भारी वृद्धि हुई और यह 2017-18 के 19.29 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 33.59 फीसदी हो गया। बहरहाल, निर्यात वृद्धि 2017-18 के 13.42 फीसदी से घटकर 2018-19 में 9.46 फीसदी रह गई। 2018-19 में जहां तमाम विपरीत नीतिगत बदलाव हुए, वहीं भारत के कुल कारोबार में अमेरिका की हिस्सेदारी थोड़ी और बढ़कर 10.42 फीसदी हो गई।
 
वरीयता कम करने का असर रसायन, प्लास्टिक, मशीनरी और मैकेनिकल उपकरण, इलेक्ट्रिकल उपकरण, फोटोग्राफिक, ऑप्टिकल, मेडिकल, सर्जिकल उपकरण आदि क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। ये वे क्षेत्र हैं जिनमें सबसे अधिक जिंस जीएसपी रियायत के अधीन आती थीं। ये तमाम क्षेत्र देश के शीर्ष 20 निर्यात क्षेत्रों में आते है, अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा या दूसरा सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। बीते दो वर्षों में भारत के कुल निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी की बात करें तो बिजली मशीनरी के 7 फीसदी से यह मशीन एवं अन्य उपकरणों में यह 20 फीसदी तक रही। परंतु रसायन के अलावा इन क्षेत्रों में अमेरिका के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी बेहद कम यानी एक फीसदी या उससे कम है। रसायन में यह यह 4.6 फीसदी है। जीएसपी समाप्त होने के बाद चूंकि भारतीय निर्यात को एमएफएन शुल्क का सामना करना पड़ता है तो उसे चीन, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया तथा अन्य विकसित देशों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। ये देश अपने-अपने क्षेत्र में अमेरिका को निर्यात करने वाले प्रमुख देश हैं। इन विकसित देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच भारत शायद अमेरिकी बाजार में अपनी मामूली हिस्सेदारी बचाए न रख सके। 
 
स्टील निर्यात में 2018-19 में 34 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। इस वर्ष मई में इसका निर्यात तीन वर्ष के निचले स्तर पर आ गया। ऐसा अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने तथा अन्य आयात करने वाले देशों द्वारा सुरक्षा उपाय अपनाने से हुआ। हमारे कुल निर्यात में एल्युमीनियम निर्यात की हिस्सेदारी 2018-19 में 1.4 फीसदी थी जो अब घटकर 1.1 फीसदी रह गई। भारत ने भी प्रतिक्रियास्वरूप शुल्क बढ़ाया। अमेरिकी निर्यात में बादाम 54 फीसदी, सेब 15 फीसदी, फॉस्फोरिक ऐसिड 33.7 फीसदी और लोहे तथा गैर अलॉय स्टील उत्पाद 29.7 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं। बहरहाल अमेरिकी निर्यात में जबरदस्त हिस्सेदारी के साथ ही ये उत्पाद भारत के कुल आयात के लिए भी मायने रखते हैं। वर्ष 2018-19 में देश के बादाम आयात में से 80 फीसदी, अखरोट और ताजे सेब में से 47 फीसदी तथा स्टील आयात में से 41 फीसदी, अमेरिका से आए थे। कहा जा सकता है कि उच्च शुल्क दर भारतीय आयातकों को भी नुकसान पहुंचा रही है। प्रतिक्रियास्वरूप उठाए गए कदमों से कुछ खास हासिल नहीं हुआ और शायद इससे अमेरिका पर इतना दबाव भी नहीं बना कि वह भारत का दर्जा बरकरार कर दे। 
 
ई-कॉमर्स कृषि क्षेत्र में बढ़ी हुई बाजार पहुंच, आईसीटी उत्पादों पर घटा हुआ शुल्क तथा डेरी उत्पादों में आधुनिकीकरण आदि से संबंधित अमेरिकी मांग के कारण भी काफी दिक्कत बनी हुई है। यह आसानी से स्वीकार्य नहीं है क्योंकि भारत बहुपक्षीय स्तर पर भी और द्विपक्षीय मुक्त व्यापार वार्ताओं में भी इन मसलों से जूझ रहा है। चुनिंदा चिकित्सा उपकरणों की मूल्य सीमा समाप्त करना भी अमेरिका की मांगों में शामिल है। ऐसा करना भी कठिन है क्योंकि सस्ती स्वास्थ्य सेवा भारत की प्राथमिकता में है। 
 
हालिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की उम्मीद या उसका जिक्र सिरे से गलत था क्योंकि किसी द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते या आर्थिक साझेदारी पर चर्चा ही नहीं होनी थी। हां, इस दौरान एकपक्षीय तदर्थ व्यापार नीति उपायों को वापस लिए जाने की उम्मीद जरूर की जा सकती थी। परंतु चूंकि व्यापार नीति को राष्ट्रपति ट्रंप एक अहम राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं ऐसे में भारत के लिए इसे हासिल करना भी कतई आसान नहीं था। बादाम, अखरोट और सेब के आयात शुल्क के बदले कुछ प्रमुख निर्यात उत्पादों को वापस वरीयता देने का अनुरोध करना भारत के लिए अधिक व्यवहार्य होगा। अगले कुछ दिन में जब बातचीत दोबारा शुरू होगी तो इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। 
 
(लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, america, trade,,
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