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सराहनीय उपलब्धि

संपादकीय /  October 02, 2019

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के सबसे प्रमुख कार्यक्रमों में से एक स्वच्छ भारत मिशन पांच वर्ष पहले 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन पर शुरू किया गया था। मोदी ने 2014 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से दिए गए भाषण में सफाई और स्वच्छता की बात को प्रमुखता से उठाया था। स्वच्छ भारत मिशन राजग सरकार के तमाम अभियानों में प्रतिनिधि स्थान रखता है। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से संबंधित मंत्रालय के अधीन आने वाली इस योजना ने लोगों में उत्सुकता पैदा की, उन्हें अपने साथ जोड़ा और क्रियान्वयन को अंजाम दिया। इस मिश्रण ने ही राजग की सबसे उल्लेखनीय सफलताओं में से शामिल बैंक खातों वाले जन धन कार्यक्रम और स्वच्छ भारत मिशन को अंजाम दिया। मिशन के तहत सरकार ने ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण की गति तेज की। आंकड़ों के मुताबिक अब लगभग हर भारतीय परिवार में शौचालय है। उपयोग और आंकड़ों की विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों से परे होकर देखें तो यह उपलब्धि मामूली नहीं है।

 
बहरहाल तीन ऐसी बातें हैं जिनके इर्दगिर्द सवाल उठ सकते हैं। पहली बात, क्या सफाई और कचरा निपटान के काम को उतनी सफलता मिली है जितनी बताई जा रही है? दूसरा, क्या स्वच्छ भारत मिशन का संस्थागत आधार यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है कि देश में स्वच्छता और सफाई में स्थायी बदलाव आ जाएगा? तीसरी बात, क्या स्वच्छ भारत मिशन शौचालय निर्माण के अत्यंत संकीर्ण लक्ष्य पर केंद्रित है? इन सवालों में से पहला सबसे विवादित है लेकिन उसका जवाब शायद सबसे स्पष्ट है। केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के आंकड़ों को स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने चुनौती दी है। रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कंपैसिनेट इकनॉमिक्स के एक अध्ययन के मुताबिक सरकारी दावों के विपरीत उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों में से 44 फीसदी शौचालयों तक पहुंच की स्थिति में सुधार होने के बावजूद अब भी खुले में शौच करते हैं। ये आंकड़े स्वच्छता को लेकर मंत्रालय के दावे पर सवाल पैदा करते हैं। इस विषमता का सबसे स्पष्ट उत्तर यह है कि स्वच्छ भारत मिशन में बने शौचालयों की उपलब्धता और इस्तेमाल का अंतर अब तक बरकरार है। इस विषय में और अधिक स्वतंत्र आकलन की आवश्यकता है।
 
बहरहाल, पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर यह ध्यान देना चाहिए कि स्वच्छ भारत मिशन का काम केवल ठोस कचरे का निस्तारण करना नहीं था। इसका संबंध स्वच्छता से होना था, सार्वजनिक स्वच्छता और खासतौर पर समुचित नाली और कचरा निपटान व्यवस्था वाले साफ-सुथरे शहरों से होना था। स्वच्छ भारत मिशन के इस पहलू पर काम होता तो कहीं बेहतर प्रदर्शन देखने को मिल सकता था। शहरी विकास मंत्रालय देश के सबसे स्वच्छ शहर के लिए एक प्रतियोगिता कराता है। इसके नतीजों को लेकर अधिकांश शहरों के निवासी उपहास करते नजर आते हैं। ऐसा तब है जबकि इसमें नागरिकों को जोड़ा जाता है और स्वयंसेवक कई जगहों पर साफ-सफाई करते नजर आते हैं। दिक्कत यह है ऐसी स्वयंसेवा कभी संस्थागत व्यवस्था की जगह नहीं ले सकती है। मिसाल के तौर पर सशक्त और जवाबदेह स्थानीय सरकार जो साफ-शहरों की गारंटी ले सकती है। यहां तक कि शुष्क शौचालयों का स्थायित्व भी सवालों के घेरे में आ सकता है जिनको कुछ वर्ष बाद खाली करना होगा। हमारा देश उन लक्ष्यों को पूरा करने में अच्छा जहां एक लक्ष्य तय किया जाता है। जबकि लोगों के जीवन में स्थायी बेहतरी लाने में वह पीछे है। अपनी तमाम सफलताओं के बावजूद स्वच्छ भारत मिशन हमें यह याद दिलाता है कि यह व्यापक रुझान अब भी बरकरार है।
Keyword: clean india, narendra modi, BJP,,
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