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नियामकों द्वारा कानून का उल्लंघन और कारोबारी सुगमता का मसला

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  September 30, 2019

प्रतिभूति अपील पंचाट ने कहा है कि अधिग्रहण नियमों के अधीन किसी अवयस्क को खुली पेशकश नहीं करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता। प्रतिभूति बाजार में यह अवयस्क न्याय से जुड़ा इकलौता मामला नहीं है। पंचाट ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को प्रतिभूति नियमन से जुड़े एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की याद दिलाई और दोहराया कि सेबी को ऐसे अवयस्कों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए जिनके नाम का उपयोग करके वयस्कों ने प्रतिभूति का लेनदेन किया हो और जवाबदेही न निभाई हो।

 
इस मामले में त्रासदी यह है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सन 2008 में आया था। अदालत ने कहा था कि एक अल्पवयस्क जो कानूनन अनुबंध करने में अक्षम है, उसे प्रतिभूतियों के सार्वजनिक निर्गम से जुड़े प्रतिभूति नियमों के अधीन जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता है। फिर भी करीब एक दशक बाद सन 2017 में सेबी ने एक अवयस्क को अधिग्रहण नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इससे न्यायिक अनुशासन की कमी की बात सामने आती है। 
 
न्यायिक अनुशासन तोडऩे के मामलों में देश की अदालतें उदार रही हैं। न्यायिक फैसलों में निचली अदालतों तथा उन नियामकीय प्राधिकारों की काफी आलोचना की जाती है जो बड़ी अदालतों के फैसलों को न मानते हुए न्यायिक अनुशासन भंग करते हैं। परंतु बहुत कम मौकों पर ऐसा होता है जब ऐसे लोगों के खिलाफ कोई गंभीर कदम उठाया जाता हो। कुछ न्यायाधीश सरकारी एजेंसियों पर जुर्माना आदि लगाते हैं। बहरहाल, नियामकीय अधिकारियों के प्रदर्शन के आकलन के क्रम में न्यायिक नियमों के उल्लंघन को मापने का कोई पैमाना नहीं है। हकीकत में नियामकों के सबसे वरिष्ठ प्रबंधन के प्रदर्शन का आकलन ही नहीं होता।
 
नियामकीय प्राधिकार की बात करें  तो उनमें विधायी, कार्यकारी और अद्र्ध न्यायिक अधिकार शामिल होते हैं। परंतु न्यायिक अनुशासन भंग करने के मामले में वे अव्वल नजर आते हैं। अदालतों द्वारा घोषित कानूनों के बावजूद ऐसे अवसर आते हैं। इसका एक साधारण सा उदाहरण है ऐसे व्यक्ति को रिकॉर्ड की जांच न करने देना जिस पर नियमन के उल्लंघन का आरोप हो। अदालतों ने बारंबार कहा है कि रिकॉर्ड पर प्रस्तुत सामग्री का संपूर्ण अवलोकन उपलब्ध कराया जाना चाहिए, बजाय कि केवल उस सामग्री के जिसका इस्तेमाल आरोप लगाने के लिए किया गया हो।
 
जब कोई नियामक आप पर कानून उल्लंघन का आरोप लगाता है तो उसे न केवल आपको यह बताना चाहिए कि आपके खिलाफ उसके पास क्या है बल्कि उसे आपको भी तमाम सामग्री तक पहुंच उपलब्ध करानी चाहिए ताकि आप आरोपों को खारिज करने में उनका इस्तेमाल कर सकें। यदि कोई यह दर्शा सकता है कि नियामक के पास उपलब्ध सामग्री से उल्लंघन की बात सही तरीके से स्थापित नहीं होती है तो सच इसी तरह सामने आएगा। इसके बावजूद व्यवहार में देखा जाए तो आज के समय में भी समस्त रिकॉर्ड का स्पष्ट और निष्पक्ष अवलोकन देखने को नहीं मिलता।
 
मामला दर मामला आधार पर देखें तो उल्लंघन के आरोपित व्यक्ति की घबराहट या आरोप की आक्रामकता के आधार पर न्यायालय यह तय करता है कि अवलोकन प्रक्रिया में रिकॉर्ड पर मौजूद बुनियादी चीजों तक किस हद तक पहुंच सुनिश्चित की जाए। अवलोकन के अनुरोध को सिरे से खारिज करना भी एक सामान्य बात है। इस नियम का एक सटीक उदाहरण है भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग। आयोग ने फाइलों की निगरानी के लिए एक मानक परिचालन प्रक्रिया को संहिताबद्ध किया है। अन्य नियामक मसलन पूंजी बाजार नियामक आदि की बात करें तो वहां अलग-अलग सदस्यों या अधिकारियों का रुख अवलोकन की सुविधा देने के मामले में अलग-अलग रहता है।
 
जब अदालतों से संपर्क किया जाता है तो नियामक यह कह सकता है कि जांच की सामग्री में ढेर सारी ऐसी है जिसकी प्रकृति गोपनीय है इसलिए उसे साझा नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अदालत यह निर्देश दे सकती है कि उक्त रिपोर्ट के संवेदनशील हिस्सों के अलावा शेष हिस्सा साझा किया जा सकता है। एक घटना में तो ऐसा भी हुआ कि एक ही जांच रिपोर्ट का दो समांतर प्रक्रियाओं में अवलोकन किया गया। पता यह लगा कि एक प्रक्रिया में दी गई रिपोर्ट में जांच एजेंसी द्वारा चाही गई हर जरूरी सामग्री को गायब कर दिया गया था। 
 
इसी प्रकार बड़ी अदालतों द्वारा कानून के स्पष्ट उल्लेख के बावजूद नीचे स्थित प्राधिकार बार-बार यह दोहराते रहते हैं कि निर्णय के खिलाफ अपील की गई है। सर्वोच्च न्यायालय अक्सर यह कह चुका है कि ऐसा रुख सही नहीं है लेकिन फिर भी किसी पर कोई कार्रवाई न होने से ऐसे निर्णय महज दिखावटी उपदेश बन कर रह जाते हैं। जब कोई बड़ी अदालत कानून निर्धारित करती है और साथ ही उसकी व्याख्या भी करती है, तो समाज को यह दिशा मिलती है कि वह चीजों को ऐसी व्यवस्था में रखे जिससे नियमों का पालन सुनिश्चित हो। इसके बावजूद जब नियामक ही बड़ी अदालतों द्वारा की गई व्याख्याओं का उल्लंघन करते हैं तो समाज के मन में कानून नहीं लेकिन कानून के प्रवर्तकों को लेकर आशंका उत्पन्न होती है।
 
कारोबारी सुगमता की रैंकिंग कभी भी इस तरह की असहजता के लिए आदर्श नहीं हो सकती। जब शासकीय एजेंसियां कानून का मूल्य समझेंगी केवल तभी कारोबार में वास्तविक निवेश सुनिश्चित हो सकेगा। तब किसी सांख्यिकीय मॉडल द्वारा प्रस्तुत रैंकिंग की जरूरत नहीं रहेगी।
Keyword: NCLT, SEBI,,
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