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आर्थिक झंझावात के दौर में कारगर रणनीति

जैमिनी भगवती /  September 30, 2019

लोगों का ध्यान आकृष्टï करने वाले नारों के बजाय सरकार को आठ फीसदी की वास्तविक वृद्धि दर को अपना लक्ष्य बनाने की जरूरत है। बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की पांच फीसदी वृद्धि दर को देखकर केंद्र सरकार की त्योरियां चढ़ जानी चाहिए थीं। वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाली केंद्र सरकार को गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के बोझ से दबे सार्वजनिक बैंक विरासत में मिले थे। सकारात्मक बात यह थी कि तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव अपेक्षाकृत निचले स्तर पर रहे हैं और घरेलू महंगाई भी पिछले कुछ ïवर्षों से काबू में रही है। सरकार के कट्टïर समर्थक व्हाट्सऐप पर बिन मांगे संदेश भेजकर आर्थिक सुस्ती की व्याख्या में जुटे हुए हैं। उनका दावा है कि भारत की पांच फीसदी की वृद्धि भी विकसित देशों की वृद्धि से अधिक है। जी-7 देशों के साथ ऐसी तुलना अप्रासंगिक है क्योंकि अधिकतर भारतीयों को अभी तक सामाजिक, स्वास्थ्य एवं रोजगार संबंधी वे लाभ नहीं मिल पाए हैं जो विकसित देशों के नागरिकों को अमूमन मिलते हैं। 
 
कड़वा सच यह है कि भारत में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र की मांग धराशायी हो चुकी है। इसके कई कारणों में से एक को मैं तिहरी बहीखाते की समस्या कहूंगा। दोहरे बहीखाते की समस्या निजी क्षेत्र के बड़े कर्जदारों और कर्जदाताओं को प्रभावित कर रही थी जिसकी वजह 2008-12 के दौरान गैरजिम्मेदाराना ढंग से बांटे गए बड़े कर्ज थे। तीसरा बहीखाता उन लोगों से संबंधित है जो अपने क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड के जरिये मासिक किस्त पर कार, स्कूटर, उपभोक्ता उत्पाद एवं सेवा लेते हैं। इनमें से बहुत लोग नोटबंदी के कारण आय को लगे तगड़े झटके और जीएसटी रिफंड की सुस्त दर के चलते अपने ईएमआई का भुगतान बढ़ाना नहीं चाहते हैं।
 
भारतीय उत्पादों की विदेश में मांग कम होने के पीछे एक अहम कारण रुपये का खासा अधिमूल्यन होना भी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ने गत 19 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की जुलाई 2019 रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (रीअर) इसके सही मूल्य के करीब है। खुद आरबीआई ने भी जुलाई रिपोर्ट में कहा है कि रुपये की रीअर दर छह मुद्राओं के समूह की तुलना में 24.6 फीसदी ज्यादा है। ऐसे में यह अजीब है कि आरबीआई गवर्नर ने रुपये की दर के बारे में आईएमएफ रिपोर्ट का जिक्र करना पसंद किया। 
 
भारतीय बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) के अधिक कर्ज बांटने से घरेलू मांग बढ़ाने में मदद मिलती। लेकिन भारतीय वित्तीय संस्थान कर्ज बांटने को लेकर हिचक रहे हैं। कर्जदाताओं के चौकन्ना होने की वजह यह है कि चूककर्ता लेनदार उधारी के समय जमानत पर दी गई संपत्ति को अपने पास बनाए रखने में सफल हो जा रहे हैं जबकि दूसरी कंपनियां उस संपत्ति के लिए पारदर्शी ढंग से बोली भी लगा रही हैं। आरबीआई के 12 फरवरी, 2018 के परिपत्र में यह प्रावधान था कि कर्जदाताओं को भुगतान में चूक चिह्निïत होने के साथ ही उसे दिवालिया प्रक्रिया में लाना होगा और कर्जदारों को मामला राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) में भेजने के पहले 180 दिनों के भीतर मामला निपटाने का वक्त मिलता था। ऐसे में कर्जदारों के लिए यह जरूरी था कि वे भुगतान में चूक होने के पहले ही वित्तीय संस्थानों से संपर्क कर समय बढ़ाने या अन्य स्रोतों से अंतरिम ऋण लेने के प्रयास करें। इस परिप्रेक्ष्य में 12 फरवरी का परिपत्र उच्चतम न्यायालय द्वारा 2 अप्रैल, 2019 को निरस्त करना एक भयंकर भूल थी। आरबीआई और सरकार दोनों को ही इस परिपत्र के पक्ष में सम्मिलित रूप से दलील रखनी चाहिए थी। उद्दंड कर्जदारों के समर्थकों का कहना है कि उन्हें अपनी परिसंपत्ति बनाए रखने की इजाजत और सेहत दुरुस्त करने के लिए कर्जदाताओं से मदद भी दी जानी चाहिए। सीमित देनदारी विधान प्रवर्तकों को निजी संपत्ति अपने पास रखने की अनुमति देता है और गिरवी रखी गई संपत्ति को ही जब्त किया जा सकता है।
 
ऐसा लगता है कि सरकार ने सार्वजनिक बैंकों से बेहद संयम बरतने की उम्मीद फिर से लगा ली है। इन बैंकों पर अक्सर बड़े कर्जदारों के साथ मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं। बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) ने सार्वजनिक बैंकों के बोर्ड में अपने क्षेत्र की गहरी जानकारी रखने वाले और असंदिग्ध निष्ठा वाले लोगों को सदस्य नियुक्त किए जाने की सिफारिश की थी। इसके अलावा एनसीएलटी के पास लंबित मामलों के त्वरित निपटान की भी जरूरत है। इस स्तर पर यही लगता है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) और भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड शायद उसी तरह अप्रासंगिक हो गया है जैसे सरफेसी अधिनियम 2002 और ऋण वसूली अधिकरण हो गए थे।
 
सरकार एलआईसी और कोल इंडिया में अपनी हिस्सेदारी को 60 फीसदी पर लाकर बाहरी एवं घरेलू स्रोतों से संसाधन जुटा सकती है। एयर इंडिया, एमटीएनएल और बीएसएनएल में संसाधन नष्ट होते जा रहे हैं और यह समय सरकार के लिए इन कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाने और विदेशी निवेश जुटाने के लिए एकदम माकूल है। अगर केवल घरेलू स्रोतों से ही फंड जुटाए जाते हैं तो वित्तीय समर्थन दूसरे स्थानीय निवेशों से खींचा भी जा सकता है। सरकार ने गत 20 सितंबर को कॉर्पोरेट कर में बड़ी कटौती की घोषणा की। यह कदम मांग में तेजी ला सकता है लेकिन शर्त यही है कि कंपनियां अपनी आय में वृद्धि का लाभ कर्मचारियों को देने और कीमतें कम करने में लगाएं। समय के साथ घरेलू एवं विदेशी निवेश बढ़ सकता है लेकिन उसके लिए कर दरों का निवेश विकल्पों की तुलना में प्रतिस्पद्र्धी रहना जरूरी है। लेकिन इस कदम का नकारात्मक पहलू यह है कि सरकार को इसी वित्त वर्ष में 1.4 लाख करोड़ रुपये की राजस्व क्षति होने और उसकी वजह से राजकोषीय घाटे को चार फीसदी तक पहुंच जाने की आशंका है। जीएसटी परिषद ने कारोबारी धारणा की बहाली के लिए कई कदम उठाएं हैं जिनमें से होटल कमरों पर जीएसटी कम करने का पर्यटन व्यवसाय पर अनुकूल असर पड़ सकता है।
 
वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में ही भारतीय अर्थव्यवस्था से 5.8 अरब डॉलर रकम उदार धनप्रेषण योजना (एलआरएस) के तहत बाहर चली गई जबकि 2014-19 के दौरान इस तरह कुल 45 अरब डॉलर बाहर भेजे गए। इसकी तुलना में 2009-14 की अवधि में केवल 5.5 अरब डॉलर ही भेजे गए थे। इसके उलट भारत आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2018 में 42 अरब डॉलर रहा। इसके बावजूद एलआरएस के तहत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा का बाहर जाना चिंता का विषय है। निष्कर्षत: सरकार ने वर्ष 2024 तक अर्थव्यवस्था को पांच लाख करोड़ डॉलर पहुंचाने का जिस तरह माहौल बनाया है वह भारतीय उत्पादों एवं सेवाओं के लिए घरेलू एवं विदेशी मांग बढ़ाने की फौरी जरूरत से ध्यान बंटाने का काम करता है। कुछ महीनों पहले वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह सुझाव देकर अपनी नासमझी दिखाई थी कि अगर भारतीय रुपये का भाव बढ़ता है तो पांच लाख करोड़ डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को आसानी से हासिल किया जा सकता है। लोगों का ध्यान खींचने वाले नारों से दूर रहकर सरकार को रुपये के संदर्भ में आठ फीसदी की वास्तविक वृद्धि दर हासिल करने के प्रयास करने चाहिए। इससे रोजगार बढ़ाने और गरीबी कम करने में मदद मिलेगी।
 
(लेखक पूर्व राजदूत और विश्व बैंक के विशेषज्ञ सदस्य हैं)
Keyword: india, economy, GDP,,
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