बिजनेस स्टैंडर्ड - व्यक्तिगत आयकर में भी समाप्त की जा सकती है रियायत?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, December 08, 2019 03:29 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

व्यक्तिगत आयकर में भी समाप्त की जा सकती है रियायत?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 29, 2019

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से अब तक देश की कॉर्पोरेशन कर दरों की प्रक्रिया धीमी और स्थिरता भरी रही है। पिछले दिनों एक अध्यादेश के जरिये इसे घटाकर 22 फीसदी कर दिया गया। बिना अधिभार या उपकर के इसे सन 1991 के 45 फीसदी से 2019 के 22 फीसदी तक लाने में 28 वर्ष लगे। यह कंपनियों के लिए कर दर में 51 फीसदी की गिरावट है। यदि इसकी तुलना व्यक्तिगत आयकर दरों में कटौती से की जाए तो अलग तस्वीर नजर आती है। व्यक्तिगत आयकर की उच्चतम दर सन 1991 में 50 फीसदी से घटकर 1997 में 30 फीसदी हो गई। तब से अब तक उच्चतम दर में बदलाव नहीं आया है। जबकि इस अवधि में अधिभार और उपकर लगाए गए हैं इससे उच्चतम स्तर पर आयकर दाताओं पर बोझ बढ़ा ही है।

 
दो बातें ध्यान देने वाली हैं। पहली, हालांकि  कॉर्पोरेशन कर दर में काफी कमी आई है लेकिन यह कमी लंबे समय में की गई। व्यक्तिगत आय कर में तेजी से कमी आई लेकिन उसके बाद वे लंबे समय से एक ही स्तर पर ठहरी हुई हैं। दूसरा, व्यक्तिगत आयकर पर अधिभार और उपकर कॉर्पोरेशन कर से ज्यादा लगा। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत आयकर की उच्चतम दर 42.7 फीसदी है जो मूल कर दर से 12 फीसदी अधिक है। जबकि कॉर्पोरेशन कर दर में अधिभार और उपकर जोडऩे पर भी यह 22 से 25 फीसदी हुई।
 
वर्ष 1991 से अब तक कॉर्पोरेशन कर दर के दायरे पर नजर डालें तो यह सफर आर्थिक सुधार के शुरुआती वर्षों में शुरू नहीं हुआ। जुलाई 1991 में अपने पहले बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन ङ्क्षसह ने इस कर दर को 40 फीसदी से बढ़ाकर 45 फीसदी कर दिया था। इसके पीछे उन्होंने कमजोर कर संग्रह को वजह बताया था। छह वर्ष बाद सन 1997-98 में संयुक्त मोर्चा सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजट में कहा कि कैसे बीते वर्षों के दौरान उन्होंने कॉर्पोरेशन कर दर पर अधिभार को आधा घटाकर 7.5 फीसदी कर दिया था और अब वह उसे पूरी तरह समाप्त कर रहे थे। तब लगा कि चिदंबरम को अधिभार में रुचि नहीं है क्योंकि उसे राज्यों के साथ साझा करना होता है। कर दर को घटाकर 35 फीसदी करने के पीछे उनका तर्क यह था कि कम दर होने से अनुपालन बढ़ेगा और नया निवेश आएगा।
 
करीब एक दशक बाद 2005-06 में जब चिदंबरम मनमोहन सिंह की सरकार में वित्त मंत्री थे, उन्होंने कॉर्पोरेशन कर में 5 फीसदी की और कटौती कर उसे 30 फीसदी कर दिया। परंतु उन्होंने 10 फीसदी अधिभार लगा दिया गया था। तब से अधिभार को लेकर सरकार की रुचि कम नहीं हुई।  वर्ष 2015-16 में कॉर्पोरेशन कर से जुड़ी बहस ने एक अलग रुख ले लिया। मोदी सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन रियायतों और प्रोत्साहन का मुद्दा उठाया जिन्होंने कर व्यवस्था को विसंगतिपूर्ण बनाया। उन्होंने यह भी माना कि 30 फीसदी की बुनियादी कॉर्पोरेशन दर अन्य एशियाई देशों की कर दरों से अधिक थी और देश के उद्यमी जगत को गैर प्रतिस्पर्धी बना रही थी। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि तमाम रियायतों के चलते कॉर्पोरेशन कर की प्रभावी दर केवल 23 फीसदी के करीब रह गई थी। जेटली के मुताबिक इसके दो नुकसान थे। एक तो कॉर्पोरेशन दर को बहुत अधिक माना जा रहा था, दूसरी ओर रियायतों के कारण पर्याप्त कर संग्रह भी नहीं हो रहा था। उन्होंने कहा कि रियायतों के कारण तमाम तरह के दबाव समूह बने और राजस्व की हानि हुई। जेटली ने घोषणा की कि चार साल में कॉर्पोरेशन कर दर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किया जाएगा। इसका मकसद भी निवेश और रोजगार बढ़ाना था। उन्होंने चरणबद्घ तरीके से रियायत खत्म करने की बात कही ताकि करदाताओं को अग्रिम सूचना मिल जाए। एक वर्ष बाद उन्होंने नई विनिर्माण कंपनियों को 25 फीसदी और अधिभार तथा उपकर के साथ कर लगाने का विकल्प दिया गया। शर्त यह थी कि इस स्थिति में वे मुनाफे या निवेश से जुड़ी रियायत नहीं चाहेंगे।
 
उन्होंने 5 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार वाली कंपनियों की कर दर भी घटाकर 29 फीसदी और अधिभार तथा उपकर के बराबर कर दी थी। वर्ष 2017-18 में जेटली ने 50 करोड़ रुपये से कम के कारोबार वाली सभी कंपनियों के लिए कर दर घटाकर 25 फीसदी कर दी। एक वर्ष बाद 25 फीसदी के कम कर लाभ के लिए आवश्यक कारोबार 250 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पहले बजट में इसे बढ़ाकर 400 करोड़ रुपये कर दिया। इस तरह करीब 99.3 फीसदी कंपनियां 25 फीसदी के न्यूनतम कर दायरे में आ गईं। 
 
सीतारमण ने पिछले दिनों जो घोषणा की वह जेटली की कंपनियों के लिए रियायतमुक्त कराधान व्यवस्था की दिशा में ही एक कदम है। यह सही है कि अन्य एशियाई देशों को ध्यान में करते हुए कर दरें कम की गई हैं। परंतु कॉर्पोरेशन कर व्यवस्था में रियायत खत्म करने का संकेत एक बड़ा बदलाव था। न्यूनतम कर कंपनियों के लिए रियायत छोडऩे के प्रोत्साहन की तरह थी। जो कंपनियां न्यूनतम कर दर को अपनाएंगी वे वापस पुरानी व्यवस्था में नहीं जा सकतीं जहां कुछ ऊंची कर दर के साथ रियायतें थीं। 
 
इस प्रक्रिया में कॉर्पोरेशन कर व्यवस्था भी पारदर्शी हुई है। अब यहां मनमानी या विवाद की गुंजाइश कम है। अगर यह निर्णय समूचे कॉर्पोरेशन क्षेत्र को रियायतों से दूर ले जाकर न्यूनतम कर व्यवस्था से जोडऩे में सफल रहता है तो कर सुधार की दिशा में सरकार की एक बड़ी सफलता होगी। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सीतारमण व्यक्तिगत आयकर व्यवस्था में भी रियायतें समाप्त करके कर दर कम करने की व्यवस्था पर काम करेंगी? 
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार को दूरंसचार कंपनियों से करनी चाहिए शुल्क वसूली?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.