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कश्मीर : आंतरिक होकर भी बना अंतरराष्ट्रीय मसला

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 29, 2019

क्या दुनिया को कश्मीर की फिक्र है? उन्हें पता है कि यह उप महाद्वीप का हिस्सा है, जिस पर भारत और कश्मीर झगड़ते रहते हैं, लेकिन कभी-कभार झगड़े में परमाणु हमले की धमकियां सुनाई देने लगती हैं, जिसके बाद लोग यह देखने के लिए दुनिया के नक्शे में सिर खपाते हैं कि कश्मीर आखिर है कहां। अब तक तो हरेक बड़े देश के पास कश्मीर समस्या की एक फाइल ही तैयार हो गई होगी। डॉनल्ड ट्रंप शायद सबसे अच्छे उदाहरण पेश नहीं करते हैं। कम से कम तब तो नहीं, जब भारतीय उप महाद्वीप की बात पर वह पूछते हैं कि यह 'बटन' और 'निपल' (भूटान और नेपाल के लिए) क्या है। फिर भी जुलाई में इमरान खान के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब उन्होंने कहा कि कश्मीर सबसे खूबसूरत जगह है, जहां हर तरफ बम फटते रहते हैं तो यह बात गौरतलब थी।

 
वह बारीकियों में नहीं पड़ते और उनका सामान्य ज्ञान 'यूपीएससी' पार करने के लायक नहीं है। इसीलिए उनके दिमाग ने पहली बार कश्मीर को 'बड़ी चीज' तब माना, जब फरवरी में पुलवामा हमला हुआ। वास्तव में उनके अब तक के कार्यकाल में कश्मीर में यही पहला बड़ा धमाका था। इसका क्या मतलब है? मतलब यह है कि कश्मीर के बारे में कोई भी अच्छी खबर भारत के कूटनीतिक और राजनीतिक हित के लिए खबर नहीं है। कश्मीर में 30 वर्ष पहले आतंकवाद शुरू हुआ था और तब से केवल 1991 से 1994 के दरम्यान दुनिया का ध्यान कश्मीर समस्या पर गया था, जब पीवी नरसिंह राव ने आतंकवाद के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और हरेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन तथा बिल क्लिंटन की पहली सरकार आपा खो बैठी। उन्होंने इस मुसीबत को कुचला और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया को कश्मीर में दाखिल होने की इजाजत देकर और 1993 में खुद भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गठित कर भारत तथा कश्मीर के बारे में दुनिया के नजरिये को कुछ बेहतर बनाया। उसके बाद से उन्होंने कश्मीर को ठंडे बस्ते में ही डालने की कोशिश की। वरना उन्होंने कश्मीर को रणनीति के तौर पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी। एक साक्षात्कार में जब मैंने राव से पूछा कि कश्मीर में उन्हें आगे क्या दिखता है तो उन्होंने कहा, 'भाई, वे कुछ करेंगे, हम कुछ करेंगे, आखिर में हिसाब बराबर हो जाएगा।' उन्होंने यह बात अपनी अंगुली हवा में कुछ इस तरह हिलाते हुए कही मानो दो समांतर रेखाएं बनाते हुए गणित का कोई सवाल हल कर रहे हैं और उनके बीच में 'बराबरी' दिखा रहे हैं। उनकी कोशिश यहीं तक रही।
 
शिमला समझौते के बाद के दशकों में अटल बिहारी वाजपेयी समेत विभिन्न प्रधानमंत्री कश्मीर मसले को कम महत्त्व देने की ही रणनीति पर ही चलते रहे। पाकिस्तान के बारे में तमाम सवाल, चाहे वे युद्घ के कगार पर पहुंचने (कारगिल, ऑपरेशन पराक्रम) के समय ही क्यों न पूछे गए हों, आतंकवाद तक ही सीमित रखे गए। कश्मीर को कभी मसला बनने ही नहीं दिया गया। यह नीति लंबे अरसे तक कारगर रही। 11 सितंबर के बाद जब अमेरिका पाकिस्तान को पुचकारने में जुट गया और पाकिस्तान के 'सैन्य प्रशासन' के हौसले बढ़ गए, उस वक्त भी कश्मीर पर बात नहीं हुई। पाकिस्ताान बेचैन हुआ तो अमेरिका और उसके साथियों ने उसे शांत रहने की राय दी। वे ध्यान बंटने नहीं देना चाहते थे। दूसरी ओर भारत ने नए हालात का चतुराई से इस्तेमाल किया: अपने बिगड़े बच्चे को काबू में रखो वरना अगर पूरी तरह पाकिस्तान के भरोसे बैठने के आपके मंसूबों पर हम पानी फेर दें तो शिकायत मत करना।
 
इसके तीन नतीजे हुए। पहला, दुनिया मानने लगी कि दोनों देशों ने सामरिक संतुलन बना लिया है, संकट छोटे स्तर पर ही रहेगा। दूसरा, खस्ता अर्थव्यवस्था वाले पाकिस्तान और फर्राटा भरती अर्थव्यवस्था वाले भारत को यथास्थिति बनाए रखने में ही हित दिखने लगा है। और तीसरा, कि दोनों देश नियंत्रण रेखा को ही वास्तविक सीमा मानने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जैसा कि तंग श्याओ फिंग ने राजीव गांधी से कहा था, औपचारिक समाधान समझदार पीढ़ी के लिए छोड़ देना चाहिए।  वास्तव में 1990 के दशक में कश्मीर पर खबरें करते समय मैंने  सबसे बढिय़ा पंक्तियां दक्षिण एशिया के लिए अमेरिका की सहायक विदेश सचिव रॉबिन राफेल से सुनीं, जिन्हें यहां दोस्त के तौर पर नहीं देखा जाता था। कश्मीर को भारत में शामिल करने के समझौते पर सवाल उठाकर तूफान खड़ा करने के बाद उन्होंने दार्शनिक अंदाज में कहा, 'कश्मीर को रखना या खोना भारत के ही हाथों में है।'
 
मोदी सरकार में भारत ने पिछली सरकारों की कश्मीर रणनीति से हटते हुए यथास्थिति खत्म कर दी। पाकिस्तान ने युद्घ की धमकी दी मगर फिर पीछे हट गया। उसे दिख गया कि उसकी सेना की क्षमता काफी कम है और दुनिया में कोई भी उसके साथ नहीं है। न्यूयॉर्क में इमरान खान की प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो क्लिप देखिए, जिसमें वह बौखलाकर कह रहे हैं: हम जो कर रहे हैं, उसके अलावा और क्या कर सकते हैं? हम भारत पर हमला नहीं कर सकते। यहां तक तो ठीक है। दिक्कत इसके बाद शुरू होती है। आप मानें या न मानें, करीब आधी सदी के बाद कश्मीर अंतरराष्ट्रीय मसला बन गया है। उसे अंतरराष्ट्रीय बनाने का काम पाकिस्तान नहीं भारत ने किया है। अगर आप पक्षपात करेंगे तो आपको यह स्थिति भारत के लिए उत्साहजनक लगेगी क्योंकि चीन और तुर्की के अलावा किसी भी देश ने इस बात का विरोध नहीं किया है कि 5 अगस्त का बदलाव भारत का आंतरिक मामला है और किसी ने 5 अगस्त से पहले की यथास्थिति पर लौटने की मांग भी नहीं की है। लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है।
 
अमेरिका समेत कई देशों को चिंता है कि कश्मीर में अब क्या होगा। जब इमरान कहते हैं कि नरसंहार हो रहा है तो कोई यकीन नहीं करता। श्रीनगर में 'सामान्य स्थिति' दिखाती ड्रोन की तस्वीरों से भी किसी को राहत नहीं मिलती। माना जा रहा है कि घाटी को बलपूर्वक ठप कर दिया गया है और हजारों लोगों को मुकदमे के बगैर ही बंद कर दिया गया है। इस मामले में दुनिया का सब्र जल्द ही खत्म हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र का सप्ताह खत्म हो गया है। पाकिस्तान को अलग-थलग करने वाली 'कूटनीतिक जीत' पर जश्न मनाया जाएगा। नरेंद्र मोदी न्यूयॉर्क से नकारात्मक से ज्यादा सकारात्मक नतीजे लेकर लौट रहे हैं। 'कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है' के भारत के पुराने जुमले पर किसी ने आपत्ति नहीं की। व्हाइट हाउस से जारी रिपोर्ट के अनुसार मोदी के साथ मुलाकात में ट्रंप ने उनसे सामान्य स्थिति बहाल करने और कश्मीर के लोगों से किए वायदे पूरे करने के लिए ही कहा, 5 अगस्त से पहले की स्थिति पर लौटने के लिए नहीं। लेकिन कश्मीर में नए हालात ने पाकिस्तान को और अलग-थलग करने के बजाय दुनिया का ध्यान खींचने में और खुद को पीडि़त के तौर पर पेश करने में उसकी मदद की है।
 
यदि न्यूयॉर्क में भारत-पाकिस्तान की सालाना तू-तू-मैं-मैं के इस बार के मुकाबले में कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला स्वीकार किया जाना ही कूटनीति उपलब्धि है तो इसके भविष्य और भारत के सर्वोच्च राष्ट्रहित की कुंजी भी इसी में है। एक हफ्ता बीतेगा और संचार सेवाएं बंद किए दो महीने पूरे हो जाएंगे। संचार बंद हुए हफ्तों बीत चुके हैं। इसे बहाल करने में देर होने से कश्मीरियों का गुस्सा बढ़ रहा है। जितनी देर होगी, गुस्सा फूटने, हिंसा और खूनखराबे का खतरा उतना ही बढ़ जाएगा। ऐसे में हालात अक्सर बेकाबू हो सकते हैं।
 
दुनिया कश्मीर पर कुछ बोल नहीं रही है, लेकिन उसे फिक्र है। मामले का इतना अंतरराष्ट्रीयकरण तो हो ही गया है। 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद एक हफ्ते में कम से कम 40 लोग मारे गए थे। अब किशोर उम्र के असरार वानी की मौत से विवाद खड़ा हो गया है। दुनिया कश्मीर को देख रही है। 5 अगस्त से चल रही बंदी को आम बात या नई यथास्थिति मान लेना खतरनाक होगा।
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