बिजनेस स्टैंडर्ड - कार खरीदना महंगा लगे तो लीज पर भी गौर करें
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कार खरीदना महंगा लगे तो लीज पर भी गौर करें

तिनेश भसीन /  September 29, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा कि वाहनों की बिक्री में सुस्ती की एक वजह युवाओं की बदली हुई सोच है। उन्होंने कहा था कि नई पीढ़ी के लोग कार खरीदने के बजाय किराये पर गाड़ी का इस्तेमाल करना अधिक पसंद कर रहे हैं। उनका यह आकलन पूरी तरह गलत भी नहीं है। ऑटो क्षेत्र में मौजूदा सुस्ती का प्रमुख कारण उपभोग के कुल स्तर में आई गिरावट है। इसी के साथ कई कार मालिक भी नई खरीदारी में अधिक रुचि नहीं दिखा रहे हैं। पीडब्ल्यूसी इंडिया के ऑटोमोटिव पार्टनर कवन मुख्तयार कहते हैं, 'मौजूदा कार मालिक कर्ज का बोझ उठाने से बचने के अलावा सर्विसिंग एवं मरम्मत की जद्दोजहद और पुरानी कार बेचने के लिए खरीदार तलाशना भी नहीं चाहते हैं। ऐसे लोग चाहते हैं कि यह सारा सिरदर्द कोई और ही उठाए। इसके चलते ऑटो उद्योग अब उत्पाद के बजाय सेवा-उन्मुख होने लगा है।'

 
वाहन निर्माताओं ने ग्राहकों के हाथ में अपनी गाडिय़ां पहुंचाने के लिए वैकल्पिक तरीकों पर गौर करना शुरू कर दिया है। एक कार उपभोक्ता के पास अब यह विकल्प है कि वह कार को लीज़ पर ले, सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाए या फिर एक सुनिश्चित पुनर्खरीद कार्यक्रम का हिस्सा बने। हुंडई और महिंद्रा ऐंड महिंद्रा ने तो अपनी गाडिय़ों को लीज़ पर देना शुरू भी कर दिया है। होंडा ने भी अपने कुछ चुनिंदा मॉडल पर पुनर्खरीद के अलावा लीजिंग का भी विकल्प दिया हुआ है। होंडा कार्स इंडिया के बिक्री एवं विपणन उपाध्यक्ष एवं निदेशक राजेश गोयल कहते हैं, 'कार को लीज़ पर देने से ग्राहकों को सुविधा होती है। कार का मालिक बनने का ऐसा मॉडल आने वाले वर्षों में भारत में अधिक लोकप्रिय बन जाएगा।'
 
उपयोग के आधार पर फैसला
 
किसी व्यक्ति के लिए कौन-सा मॉडल कारगर होगा, यह इस आधार पर तय होता है कि साल भर में कितने किलोमीटर लंबी दूरी तय करने की संभावना है? साल भर में तय की जाने वाली दूरी को ही ध्यान में रखते हुए लीज़ पर कार लेने या खरीदने के बारे में फैसला लेना सही होता है। लीजि़ंग एवं सबस्क्रिप्शन कारोबार से जुड़ीं अधिकांश कंपनियां उन ग्राहकों से परहेज करती हैं जो बहुत अधिक सफर करते हैं। इसकी वजह यह है कि ये पेशकश निजी स्वामित्व वाली कारों के लिए ही होती है। ऐसे में अधिक सफर करने का मतलब यह होगा कि ग्राहक उस वाहन का इस्तेमाल वाणिज्यिक तौर पर कर रहा है। महीने में 2,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करने वाले उपभोक्ताओं के लिए तो कार खरीदकर उसका इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प है। रेव के सह-संस्थापक एवं मुख्य परिचालन अधिकारी करण जैन कहते हैं, 'हमारे शोध के मुताबिक करीब 95 फीसदी निजी वाहन मालिक साल भर में 25,000 किलोमीटर से कम दूरी ही तय करते हैं।'
 
एक व्यक्ति को कार खरीदने या लीज़ पर इस्तेमाल करने के बारे में फैसला इस आधार पर भी लेना चाहिए कि वह कब तक उस गाड़ी का उपयोग करने वाला है? डेलॉयट इंडिया के पार्टनर एवं ऑटो क्षेत्र प्रमुख राजीव सिंह कहते हैं, 'अगर एक या दो महीनों के लिए आपको कार की जरूरत है तो फिर उसे किराये पर कार ले लेनी चाहिए। मसलन, कोई कर्मचारी सीमित अवधि के लिए दूसरे शहर में जा रहा है तो वह किराये पर कार ले सकता है। वहीं सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल उन लोगों के लिए मुफीद है जो एक से तीन साल तक कार इस्तेमाल करने की सोच रखते हैं। लीजि़ंग मॉडल उन लोगों के लिए कारगर है जो तीन-चार साल तक कार अपने पास रखना चाहते हैं। अगर कोई इससे अधिक समय तक कार अपने पास रखना चाहता है तो फिर उसे कार खरीद ही लेनी चाहिए।' दरअसल लंबी अवधि में कार खरीदना किराये या पट्टïे पर कार लेने की तुलना में कहीं अधिक किफायती पड़ता है।
 
सुनिश्चित पुनर्खरीद योजना उन लोगों के लिए सही होती है जो किसी एक ब्रांड के मुरीद हैं। मौजूदा परिदृश्य में एक खरीदार बीएस-4 वाहन खरीद सकता है और आगे चलकर वह उसकी जगह बीएस-6 मानक वाली गाड़ी ले सकता है। यह ग्राहकों के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि सभी पुरानी कारों का बिक्री मूल्य एकसमान नहीं होता है। कुछ साल बाद लोकप्रिय कारों को उनकी कीमत के 60-65 फीसदी मूल्य पर बेचा जा सकता है जबकि कम लोकप्रिय गाडिय़ों को 40 फीसदी कीमत पर ही बेचना पड़ता है।
 
लीजि़ग एवं सबस्क्रिप्शन
 
ये दोनों कई मायनों में एक-दूसरे से मिलते-जुलते नजर आते हैं। लीजि़ंग मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ग्राहकों के लिए होती है। इसमें किसी व्यक्ति को यह बताना होता है कि वह कब तक कार का इस्तेमाल करना चाहता है और वह औसतन कितने किलोमीटर लंबी दूरी तय करेगा? इसके आधार पर कंपनी मासिक लागत की गणना करती है। लीज़ पर गाड़ी देते समय दो-तीन साल की न्यूनतम प्रतिबद्धता रखी जाती है। इस समूची अवधि में गाड़ी पट्टïाधारक के पास ही रहेगी और अगर वह इसके पहले गाड़ी लौटाना चाहता है तो फिर उसे भारी जुर्माना देना पड़ेगा।
 
इसके उलट सबस्क्रिप्शन-आधारित मॉडल भारत और विकसित देशों के लिए भी काफी हद तक नया है। हुंडई और एमऐंडएम ने इस तरह की सेवा देने के लिए रेव डॉट को डॉट इन के साथ करार किया हुआ है। एक व्यक्ति चाहे तो एक महीने के लिए भी कार का ग्राहक बन सकता है। लंबी अवधि के सबस्क्रिप्शन की भी पेशकश की जाती है जिसमें उपभोक्ता को कम-से-कम 12 महीनों के लिए प्रतिबद्धता जतानी होती है। इसकी मियाद चार साल तक हो सकती है। वह चाहे तो 12 महीने पूरे होने के बाद कभी भी इस योजना से अलग हो सकता है। हालांकि लंबी अवधि का सबस्क्रिप्शन लेने पर उपभोक्ता को एकदम नई कार दी जाती है। वहीं छोटी अवधि के लिए ग्राहक बनने पर इस्तेमाल हो चुकी कार ही मिलती है। इस तरह ग्राहकी लेना किसी वाहन को लीज़ पर लेने से कहीं अधिक लचीला है। इसमें सालाना 25,000 किलोमीटर सफर की सीमा रखी जाती है। अगर उपभोक्ता उससे ज्यादा इस्तेमाल करता है तो फिर कार कंपनी 7-13 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से शुल्क वसूलने लगती है। 
 
लीज़ के मामले में कुछ कंपनियां उपभोक्ता के क्रेडिट स्कोर पर भी नजर डालती हैं। इसके अलावा उसके आयकर रिटर्न एवं अन्य वित्तीय विवरण भी मांगे जा सकते हैं। वहीं सबस्क्रिप्शन के मामले में भी कंपनी उपभोक्ता की सैलरी स्लिप देखती है ताकि उसे यह यकीन हो सके कि उसे समय पर भुगतान मिलता रहेगा। रेव के मुख्य कार्याधिकारी एवं सह-संस्थापक अनुपम अग्रवाल कहते हैं, 'हमारे ग्राहक मूलत: ऐसे लोग हैं जिन्हें दूसरे शहर जाना पड़ा है लेकिन वे अपनी गाड़ी को बेचने की जद्दोजहद में नहीं पडऩा चाहते हैं।'
 
सुनिश्चित पुनर्खरीद कार्यक्रम
 
बिकी हुई गाड़ी को कंपनी की तरफ से दोबारा खरीदने की गारंटी देने वाली योजना की मियाद एक से पांच साल तक हो सकती है। इस दौरान गाड़ी के 10,000- 30,000 किलोमीटर चली होने पर मूल कीमत का 52-60 फीसदी तक रिटर्न मिलने का भरोसा दिया जाता है। उपभोक्ता इस तय कीमत पर अपनी पुरानी गाड़ी को बेच सकता है लेकिन उसे उसी कंपनी की दूसरी गाड़ी खरीदनी होगी। यह ग्राहक एवं कंपनी दोनों के ही लिए मुनाफे वाली स्थिति है। कार मालिक को जहां पूर्व-निर्धारित मूल्य पर नई कार मिल जाती है वहीं कंपनी को नया ग्राहक तलाशने पर एक भी पैसा नहीं खर्च करना पड़ता है।
Keyword: nirmala sitaraman, economy, corporate tax, car, lease,,
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