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निजीकरण लायक पीएसयू की पहचान में जुटा विनिवेश मंत्रालय

जश कृपलानी / मुंबई September 26, 2019

विनिवेश के बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए विनिवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम) ने नीति आयोग के साथ मिलकर सार्वजनिक क्षेत्र की उन इकाइयों की पहचान में जुट गया है जो निजीकरण की संभावित दावेदार हो सकती हैं। मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव धीरज भटनागर ने पूंजी बाजार पर आयोजित फिक्की के सम्मेलन में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, 'सरकार ने नीति आयोग से उन कंपनियों की पहचान करने को कहा है जिनका निजीकरण किया जा सकता है। सरकार गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्र में हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री की संभावना तलाश रही है।'

 
सूत्रों के मुताबिक, सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया के विनिवेश प्रस्ताव पर काम चल रहा है और इस साल तक इसके पूरा हो जाने की उम्मीद है। हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह की अगुआई वाले मंत्री समूह ने एयर इंडिया के निजीकरण से जुड़े मसले पर चर्चा की थी। भटनागर ने इस बात को दोहराया कि सरकार सार्वजनिक इकाइयों का विनिवेश सही कीमत और सही समय पर करने को लेकर प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, किसी भी हाल में हम घटी हुई कीमतों पर विनिवेश नहीं करने जा रहे हैं। सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 में विनिवेश से 1.05 लाख करोड़ रुपये का बजट लक्ष्य तय किया हुआ है। 
 
बाजार में अधिक सार्वजनिक उपक्रमों को सूचीबद्ध किए जाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एक्सचेंजों में सूचीबद्ध किए जाने के लिए 11 पीएसयू कतार में हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार हिंदुस्तान जिंक जैसी कंपनियों में अपनी अल्पांश हिस्सेदारी बेचने के बारे में सोच रही है। इसके अलावा वह ऐक्सिस बैंक और आईटीसी में भी अपनी हिस्सेदारी कम करने पर विचार कर रही है। सरकार की विनिवेश योजनओं में पीएसयू की जमीन एवं गैर-केंद्रीय परिसंपत्तियां भी हो सकती हैं। भटनागर ने कहा, 'इन गैर-केंद्रीय परिसंपत्तियों को अलग इकाइयों में समाहित कर उनका विनिवेश किया जा सकता है।'
 
सूत्रों के मुताबिक, कुछ मामलों में उपक्रमों की जमीन बेचने का मामला विवाद में भी आ सकता है, अगर उसके मालिकाना हक पर स्थिति स्पष्ट न हो। मंत्रालय से जुड़े एक सूत्र ने कहा, 'कुछ जमीनें काफी पुरानी हैं और उनके स्वामित्व को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।' सूत्रों का कहना है कि खनन कंपनियों में रणनीतिक बिक्री का काम लंबा वक्त ले सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि खदानों पर राज्य सरकारों का भी आंशिक स्वामित्व होता है और कोई भी फैसला उन राज्यों की सहमति के बगैर नहीं लिया जा सकता है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि बाजार के कमजोर होने से सरकार को सार्वजनिक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की मंशा के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ रहा है। यही कारण है कि सरकार अब रणनीतिक बिक्री के विकल्प पर गौर कर रही है। 
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