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यथास्थितिवादी करारों के हक में नहीं सेबी

जश कृपलानी और समी मोडक / मुंबई September 26, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने फिर स्पष्ट किया है कि कर्जदारों और म्युचुअल फंडों के बीच यथास्थिति बनाए रखने के बारे में हुए समझौतों को नियामकीय सहमति हासिल नहीं है। उद्योग मंडल फिक्की की तरफ से गुरुवार को आयोजित एक सम्मेलन में शिरकत करने आïए सेबी चेयरमैन अजय त्यागी ने कहा, 'हमारे किसी भी नियम में यथास्थितिवादी समझौतों का कोई जिक्र नहीं है। हमने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। कंपनियों को नियमों में वर्णित प्रावधानों का पालन करना होता है। इस बात को लेकर कोई असमंजस नहीं है।'

 
उनकी यह टिप्पणी एस्सेल ग्रुप की उस घोषणा के एक दिन बाद आई है जिसमें कहा गया था कि उसने अपनी कर्ज देनदारियों को लेकर म्युचुअल फंडों एवं अन्य कर्जदाताओं से नई समयसीमा हासिल कर ली है। एस्सेल ग्रुप के प्रवर्तकों ने वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेते समय ज़ी इंटरटेनमेंट के शेयरों को जमानत के तौर पर गिरवी रखा हुआ है। म्युचुअल फंडों ने गत जनवरी में एस्सेल ग्रुप के प्रवर्तकों को बकाया कर्जे के भुगतान के लिए सितंबर तक का वक्त दिया था। इसके लिए शेयरों का वाजिब मूल्य हासिल करने का समय देने का तर्क दिया गया था। यथास्थिति संबंधी समझौते के तहत शेयरों के मूल्य गिरने के बावजूद कर्ज को डिफॉल्ट श्रेणी में नहीं डाला जाएगा। इसके अलावा म्युचुअल फंड इसके लिए भी राजी हो गए थे कि बकाया कर्ज की वसूली के लिए वे गिरवी रखे शेयरों की बिक्री के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
 
उसके बाद से प्रवर्तकों ने बकाया कर्ज का कुछ हिस्सा चुकाया है। समूह की अग्रणी कंपनी ज़ी इंटरटेनमेंट में हिस्सेदारी बेचकर यह रकम जुटाई गई थी। दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्पोरेशन (डीएचएफएल) मामले में ऋणदाताओं के बीच हुए समझौते (आईसीए) का हिस्सा बनने की म्युचुअल फंडों को मंजूरी देने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर सेबी प्रमुख ने साफ कहा कि बाजार नियामक ने इस बारे में पहले से ही नियम तय किए हुए हैं। इस प्रारूप के तहत केवल वही म्युचुअल फंड योजनाएं आईसीए समझौते का हिस्सा बन सकती हैं जिनमें साइड-पॉकेट की संभावना मौजूद है। लेकिन डीएचएफएल को निवेश-योग्य श्रेणी से बाहर किए जाने के समय अधिकांश एमएफ योजनाओं में साइड-पॉकेट का प्रावधान लागू नहीं था। ऐसी स्थिति में अगर सेबी की तरफ से विशेष अनुमति नहीं मिलती है तो एमएफ योजनाएं आईसीए का हिस्सा नहीं बन सकती हैं।
 
नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में एलआईसी की शेयरधारिता उल्लंघन के मुद्दे पर सेबी प्रमुख ने कहा कि बीमा कंपनी को अपनी हिस्सेदारी बेचनी होगी। आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण करने के बाद एलआईसी को कारोबारी सदस्य के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इस स्थिति में सेबी ने एनएसई में एलआईसी के मताधिकार पर फिलहाल रोक लगा दी है। एलआईसी और आईडीबीआई बैंक की एनएसई में संयुक्त रूप से करीब 14 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन सेबी के नियमों के मुताबिक कोई कारोबारी सदस्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्टॉक एक्सचेंज में अधिकतम पांच फीसदी हिस्सेदारी ही रख सकता है। जानकारों के मुताबिक, इस शर्त को पूरा करने के लिए एलआईसी को या तो पांच फीसदी शेयर बेचने होंगे या फिर आईडीबीआई को कारोबारी सदस्य का अपना लाइसेंस सरेंडर करना होगा।  त्यागी ने यह भी कहा कि सेबी सत्यम घोटाले में प्राइस वाटरहाउस के पक्ष में प्रतिभूति अपीलीय पंचाट की तरफ से जारी आदेश का परीक्षण कर रहा है। पंचाट ने पीडब्ल्यू पर प्रतिबंध लगाने के आदेश को निरस्त कर दिया है।
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