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मानसिक बीमारियों को लेकर बढ़े जागरूकता और उपचार

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  September 26, 2019

हाल ही में पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक और जानेमाने चिकित्सक सिद्धार्थ मुखर्जी ने मानसिक स्वास्थ्य के मसले पर एक अहम बात उठाई। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सन 1950 के दशक में कैंसर को कलंक माना जाता था। उन्होंने कहा कि आज वही स्थिति मानसिक स्वास्थ्य की है। उन्होंने कहा कि उन दिनों कैंसर के मरीजों को अस्पतालों में पीछे की ओर ठूंस दिया जाता था। बाद में जागरूकता बढ़ी और इस बीमारी के साथ जुड़ा कलंक भी मिट गया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि तीन ऐसी शक्तियां हैं जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में मिलकर काम करना होगा। पहली शक्ति है राजनीतिक शक्ति और इसके तहत मानसिक स्वास्थ्य को जन स्वास्थ्य संकट के रूप में चिह्नित करना होगा। राजनीतिक क्षेत्र के सभी लोगों को साथ आकर राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान गठित करने की दिशा में काम करना चाहिए।

 
दूसरी शक्ति है सामाजिक शक्ति। मानसिक स्वास्थ्य के साथ जुड़े पूर्वग्रह को खत्म करने की दिशा में काम करना चाहिए। कैंसर के मामले में रोज कुशनेर, बेट्टी फोर्ड और हैप्पी रॉकफेलर जैसी महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई थी और लोग कैंसर के मरीजों के साथ समानुभूति रखने लगे, उनके इलाज और ठीक होने की राह यहीं से निकली। कोलंबिया विश्वविद्यालय के मेडिकल सेंटर में मेडिसन विभाग के प्रोफेसर मुखर्जी ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को भी ऐसे ही हिमायत करने वालों की आवश्यकता है।
 
तीसरी शक्ति जीवविज्ञान से जुड़ी है जिसे जेनेटिक या औषधि क्षेत्र से समझा जा सकता है। इसमें प्रयास करने और विभिन्न प्रकार के शोध करना भी शामिल है। ऐसा करके यह समझ विकसित की जा सकती है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे लोगों का उत्पीडऩ न हो। वह इन बातों को अपने अनुभव से समझते होंगे क्योंकि उनके दो करीबी रिश्तेदार सीजोफ्रेनिया और बायपोलर डिसऑर्डर से पीडि़त थे। उनका रिश्ते का एक भाई भी सीजोफ्रेनिया से पीडि़त था और उसे भर्ती कराना पड़ा था। मुखर्जी शुरुआत में इस बीमारी की चर्चाओं से दूर रहते थे और आंशिक रूप से इस बीमारी को इसलिए समझना नहीं चाहते थे क्योंकि उनके मन में ढेर सारी आशंकाएं थीं। आखिरकार उन्होंने साहस जुटाया और एक किताब लिखी: द जीन: एन इंटीमेट हिस्ट्री। 
 
उनका यह कहना सही है कि दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तरह भारत में भी मानसिक बीमारियों के पीडि़त और उनके परिवार पहले-पहल इन बीमारियों को नकारने की कोशिश करते हैं। उनमें से अधिकांश चिकित्सक को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि उससे बीमारी का पता लगाने में चूक हुई है या उनकी बिगड़ी मनोदशा अपने आप ठीक हो जाएगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों में जागरूकता की कमी है और उन्हें नहीं पता कि समय पर पता चल जाने पर इन बीमारियों का पूरा इलाज संभव है। इसकी एक अहम वजह यह है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य सलाहकारों की भारी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार देश में मानसिक बीमारियों के शिकार प्रत्येक एक लाख लोगों पर 0.301 मनोचिकित्सक और 0.047 मनोविज्ञानी हैं। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी कोई नया मुद्दा नहीं है। सन 1982 में सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का क्रियान्वयन आरंभ किया था। इसका लक्ष्य था मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल को सामान्य स्वास्थ्य से जोडऩा। परंतु इसमें अपेक्षित तेजी नहीं आई। 
 
वर्ष 2015 तक यानी कार्यक्रम की शुरुआत के तीन दशक बाद तक यह देश के केवल 27 प्रतिशत जिलों में लागू था। हाल ही में संपन्न राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि देश में किसी भी मानसिक अस्वस्थता में उपचार में अंतर की दर 83 फीसदी तक है। यह भी कहा गया कि देश में करीब 15 करोड़ लोगों को उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए देखभाल की आवश्यकता है। देश के कारोबारी जगत को भी इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। एक चेतावनी भरा तथ्य यह है कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले 42.5 फीसदी कर्मचारी अवसाद या तनाव जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि सन 2012 से 2030 के बीच भारत को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण 1.03 लाख करोड़ डॉलर का आर्थिक नुकसान होगा। गरीब समुदाय मानसिक बीमारी की अनदेखी करते हैं क्योंकि ये बीमारियां अपंग नहीं बनातीं, इन बीमारियों से विरले ही किसी की मौत होती है और अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करने वाले ऐसे परिवारों को मानसिक बीमारियों पर पैसा खर्च करना ठीक नहीं लगता।
 
वर्ष 2018 में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने का काम करने वाले परोपकारी संगठन लाइव लव लाफ फाउंडेशन ने एक अध्ययन किया जिसमें यह पता लगाया गया कि देश के लोग मानसिक स्वास्थ्य के बारे में क्या सोचते हैं। यह अध्ययन देश के आठ शहरों में किया गया। अध्ययन में शामिल लोगों में से 87 फीसदी को मानसिक बीमारियों के बारे में कुछ जानकारी थी, 71 फीसदी ने इससे जुड़े पूर्वग्रहों की बात भी की। एक चौथाई से ज्यादा लोगों ने यह माना वे मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों के साथ तटस्थ रहेंगे। इन दिक्कतों को तत्काल दूर किए जाने की आवश्यकता है। यदि लोग मानसिक बीमारियों को आशंका की दृष्टि से देखते रहेंगे तो मानसिक बीमारियों से पीडि़त लोगों को जरूरी सहायता मिलने में भी मुश्किल आती रहेगी। ऐसे में सरकार के संस्थागत सहयोग की भूमिका बहुत अहम हो जाती है।
Keyword: mental, health, india,,
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