बिजनेस स्टैंडर्ड - उच्च वृद्धि की नीति से जुड़े हैं ताजा कदम
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उच्च वृद्धि की नीति से जुड़े हैं ताजा कदम

अजय शाह /  September 26, 2019

केंद्र सरकार के वृद्घि को गति देने वाले ताजा कदम के बाद निजी कारोबारियों के प्रतिफल और जोखिम के अनुपात पर नजर रखनी होगी। इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं अजय शाह

 
देश की वृहद आर्थिक स्थिति से जुड़ी सबसे अहम समस्या है निजी निवेश में गिरावट का आना। निजी व्यक्तियों के निर्णय निवेश से मिलने वाले लाभ या उससे जुड़े जोखिम से संबद्ध होते हैं। जब किसी कारोबार को कर पूर्व 100 रुपये का मुनाफा होता है तो कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अंशधारक को 43 रुपये की नकद राशि मिलती। अब कॉर्पोरेट आयकर की दर में कमी के बाद यह बढ़कर 48 रुपये हो गई है। यह कदम सही दिशा में है और अभी काफी कुछ किया जाना है। ऐसा करके ही निजी क्षेत्र के लोगों में जोखिम/इनाम की अवधारणा को बदला जा सकेगा। सबसे बड़ा राजकोषीय जोखिम निम्र आर्थिक वृद्धि से उत्पन्न होता है।
 
समेकित मांग का जो हिस्सा देश की वृहद आर्थिकी को सबसे अधिक संचालित करता है, वह है कॉर्पोरेट निवेश। हाल के दशकों में दो बार तेजी देखी गई। वर्ष 1994-95 और 2007-08। सन 1990 के दशक में तथा हाल के वर्षों में गिरावट भी देखने को मिली। वृद्धि दर बढ़ाने के लिए मजबूत निजी निवेश हासिल करना अनिवार्य है। निजी व्यक्ति (देसी या विदेशी) निवेश का निर्णय कैसे लेते हैं। वे या तो किसी मौजूदा फर्म में निवेश करते हैं या फिर किसी नई फर्म में। इस दौरान वे मुनाफे और जोखिम के अनुपात पर नजर डालते हैं। उनकी दृष्टि अंतिम अंशधारक को मिलने वाली नकद राशि पर रहती है। मान लेते हैं किसी कंपनी को कर पूर्व 100 रुपये का लाभ होता है। इससे मालिक की खपत पर क्या असर होगा? जब इन 100 रुपयों में से विभिन्न हिस्से निकलेंगे तो इससे मालिकों के लाभ पर असर होगा और साथ ही इनाम और जोखिम के अनुपात पर भी असर होगा।
 
कारोबारी उत्तरदायित्व (सीएसआर) के वास्तविक मूल्य, कॉर्पोरेट आयकर, लाभांश वितरण कर और मालिक द्वारा चुकाए जाने वाले व्यक्तिगत आयकर के बारे में वास्तविक आकलन करने के बाद हमारा अनुमान है कि शुक्रवार की घोषणा के पहले 100 रुपये के कर पूर्वलाभ में से मालिक को 43 रुपये मिलते थे जो घोषणा के बाद बढ़कर 48 रुपये हो जाएंगे। इस घोषणा ने पांच प्रतिशत का लाभ दिया है जो अपने आप में उपयोगी प्रगति है। जब यह अंशधारक इन 48 रुपयों का इस्तेमाल वस्तु एवं सेवाओं की खरीद में करेगा तो सरकार जीएसटी के माध्यम से इसमें अपना हिस्सा ले लेगी। इसके अलावा एक सवाल जोखिम का भी है। यह तीन हिस्सों में आता है। सभी निवेशकों को सामान्य कारोबारी जोखिम का सामना करना पड़ता है और यह सर्वथा उचित भी है। इसके अलावा भारतीय परिदृश्य में जोखिम के दो अतिरिक्त घटक भी हैं। कंपनियों को नीतिगत जोखिम भी होता है जो उनके कारोबारी मॉडल को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय में आधार के मामले में आधार का इस्तेमाल करके व्यवस्था बनाई थी, उन्हें बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल से रोक दिया गया। इसी प्रकार जिन कंपनियों ने क्रेडिट ब्यूरो की जानकारी जुटाकर काम किया था, उन्हें भी सूचना तक पहुंच बनाने से रोक दिया गया। 
 
जोखिम का तीसरा घटक एजेंसियों से आता है। देश की न्याय व्यवस्था में तमाम एजेंसियां हैं। इनके पास उच्च जांच शक्ति है। इनके जरिये जेल की सजा होने तक का जोखिम है। जेल जाने की नौबत न भी आए तो भी वकीलों का खर्च भी मायने रखता है। 100 करोड़ रुपये के कारोबार और 5 करोड़ रुपये के शुद्घ मुनाफे वाली कंपनी अगर वकीलों को साल में एक करोड़ रुपये का भुगतान करे तो यह राशि मायने रखती है। अगर किसी कंपनी का राजस्व 1,000 करोड़ रुपये हो जाए तभी वह कानूनी गतिविधियों पर इतना खर्च कर सकती है। 
 
निजी क्षेत्र से कहा जाना चाहिए कि वह सामान्य कारोबारी जोखिम उठाए और नवाचार के माध्यम से और कारोबारी जोखिम के माध्यम से कारोबार खड़ा करे। जहां तक उनकी मेहनत के फल के सरकार और वकीलों तक जाने की बात और नीतिगत जोखिम तथा एजेंसियों की बात है तो यह यकीनन निवेश को बाधित करता है। नीति निर्माता कर दर और नीतिगत जोखिम घटाकर तथा एजेंसियों का खतरा कम करना तथा विधिक व्यवस्था में सुधार करके इनाम और जोखिम के अनुपात में सुधार लाया जा सकता है। 
 
अब तक हमने निजी लोगों की निवेश की इच्छा पर ध्यान केंद्रित किया है। एक बार निजी लोगों के इनाम और जोखिम की दिक्कत दूर हो जाए तो निवेश के नए विचार सामने आएंगे। अगली समस्या उस वित्तीय तंत्र की है जो निवेश परियोजनाओं को फंड करता है। देश की वित्तीय व्यवस्था के दोनों इंजन यानी बैंक और वित्तीय बाजार फिलहाल खस्ताहाल हैं। उच्च वृद्घि की नीति में वित्तीय तंत्र की सेहत दुरुस्त करना आवश्यक है। उच्च वृद्घि की नीति में इनाम और जोखिम के अनुपात में बदलाव के साथ-साथ वित्तीय तंत्र को बेहतर बनाना शामिल है। पिछले दिनों उठाया गया कदम इसका केवल एक पहलू है। 
 
कर दरों में कमी के साथ राजकोषीय जोखिम जुड़ा हुआ है। हमें इस एक निर्णय के अल्पकालिक प्रभाव से आगे निकलकर देखना होगा। देश की वृहद नीति में राजकोषीय स्थिरता का माहौल बनाने के लिए दो ही विकल्प हैं। उच्च वृद्घि और शिथिल राजकोषीय नीति के साथ राजकोषीय स्थिरता हासिल की जा सकती है। दूसरा विकल्प कम वृद्घि और सख्त राजकोषीय नीति के माध्यम से इसे हासिल करना भी है। हमें यह देखना होगा कि इन दोनों में से कौन सी स्थितियां बेहतर हैं? भारत में पारंपरिक उत्तर शिथिल राजकोषीय नीति और उच्च वृद्घि दर की रही है। पिछले दिनों उठाया गया कदम भी उच्च वृद्घि की नीति की ओर ले जाने वाला है। 
 
कर दरों में कमी का अल्पावधि का बजट प्रभाव भी जितना नजर आ रहा है उससे कम रहेगा। कर दर से जुड़ी विसंगति उसके साथ ही बढ़ती या घटती है। जब कर दर कम होती है तो अर्थव्यवस्था पर इसका असर कम होता है और वृद्घि को बल मिलता है। इसी तरह कर दर कम होने पर निजी निवेशकों में कर वंचना की प्रवृत्ति भी कम होती है। परंतु कर दर कम होने के साथ ही कर प्रशासन की शक्तियां भी कम होती हैं। इन तमाम वजहों से कर दरों में बदलाव के वक्त सहज अनुपात कभी नहीं मिल पाता। जब भी कर दर बढ़ाई जाती है तो हासिल होने वाला कर राजस्व हमेशा निराश करता है। जब कर दर में कमी की जाती है तब राजस्व में होने वाली कमी अनुमान से कम ही होती है। इससे यह आशा उत्पन्न होती है कि राजकोषीय मजबूती को यह शायद उस कदर प्रभावित न करे। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, corporate tax,,
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