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स्वर्ण आयात तीन साल में सबसे कम

राजेश भयानी / मुंबई September 26, 2019

जौहरियों के लिहाज से यह सितंबर तिमाही पिछले कई वर्षों की सबसे खराब तिमाही के रूप में देखी जा रही है क्योंकि दामों में तीव्र वृद्धि के बाद आयात शुल्क में हुए इजाफे ने इस पीली धातु के दाम सर्वकालिक शीर्ष स्तर पर पहुंचा दिए। शुल्क और दामों में वृद्धि के बाद सोने की मांग, आयात और आयात बिल में तेजी से गिरावट आई है। पिछले 10 दिनों के दौरान दामों में कुछ नरमी के बावजूद सोना उस स्तर पर नहीं आया है जो निवेशकों को इस कीमत पर सोना खरीदने के लिए प्रेरित कर सके। हालांकि जौहरी कारोबार के लिए परेशान हैं लेकिन ऐसे समय में जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, सरकार के लिए यह एक अच्छी खबर है कि सोने के आयात बिल में गिरावट आनी शुरू हो गई है। मासिक आधार पर अगस्त में सोने का आयात बिल 1.36 अरब डॉलर रहा जो 36 महीने का निचला स्तर है। वित्त वर्ष के आधार पर देखें तो भी वित्त वर्ष 20 के पहले पांच महीनों में सोने का आयात बिल 14.5 अरब डॉलर रहा जो तीन साल का निचला स्तर है।

 
विश्व स्वर्ण परिषद (भारत) के प्रबंध निदेशक सोमसुदंरम पीआर ने कहा कि दामों में 20 प्रतिशत की तेज उछाल और ऑफसीजन उपभोक्ता मांग में नरमी के प्रमुख कारण हैं। एक अन्य कारण भी है। वर्ष 2017 की पहली तिमाही के बाद से आयात मांग की अपेक्षा लगातार (वर्ष 2018 की चौथी तिमाही को छोड़कर) अधिक रहा है जो संयुक्त रूप से 200 टन रहा है। इस जैसे वक्त में स्टॉक निकालना स्वाभाविक है, इसलिए आयात कम रहा है। चिंतित सराफा व्यापारियों और जौहरियों कहना है कि सोने की मांग के लिए यह सितंबर तिमाही कम से कम इस दशक की तो सबसे खराब तिमाही है। 5 जुलाई को पेश किए गए केंद्रीय बजट में आयात शुल्क 10 से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया गया था जिसके बाद सोने की मांग में गिरावट आई है और इसके परिणामस्वरूप आयात में भी गिरावट आई है। 
 
इस कैलेंडर वर्ष के पहले छह महीनों (जनवरी से जून) में भारत ने 71.3 टन मासिक औसत के साथ 427.8 टन स्वर्ण आयात किया है। हालांकि जुलाई में केवल 29 टन सोना आयात किया गया था और अगस्त में 27 टन आयात किए जाने का अनुमान है तथा वर्तमान में चल रहे पितृपक्ष की वजह से सितंबर में भी स्वर्ण आयात का रुख बेहतर रहने की संभावना नहीं है। हालांकि सोने के आयात पर करीब से नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि जुलाई और अगस्त में आयात किए गए 56 टन में से बामुश्किल 20 टन सोना ही घरेलू बाजार के लिए आयात किया गया था और शेष आयात दोबारा निर्यात करने के लिए किया गया था।
 
घरेलू इस्तेमाल के सोने के लिए केवल 1.2 अरब डॉलर व्यय किया गया है। इसका अर्थ यह है कि जुलाई और अगस्त में स्वर्ण आयात के लिए किए गए 3.08 अरब डॉलर व्यय में से केवल 1.2 अरब डॉलर की राशि ही घरेलू बाजार के लिए स्वर्ण आयात की खातिर थी। विश्लेषकों ने कहा कि सितंबर तिमाही में मांग में एक-तिहाई तक की गिरावट आई है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत की सितंबर तिमाही के आखिर में औसत मांग करीब 175 टन रही है। इसका अर्थ यह है कि यह मांग 65-70 टन रह सकती है। विश्लेषक के अनुसार इसमें से निवेश मांग बहुत कम रही है। दाम ज्यादातर करीब 40,000 रुपये प्रति 10 ग्राम रहने की वजह से ऐसा हुआ है क्योंकि भौतिक रूप में सोने में निवेश करने वालों को बनाई के अलावा तीन प्रतिशत जीएसटी का भी भुगतान करना पड़ता है। निवेश की जो भी मांग दिखी थी, वह सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड खरीदने के लिए थी जिसमें न तो जीएसटी लगता है और न ही बनाई। साथ ही निवेशक सालाना 2.5 प्रतिशत का ब्याज भी प्राप्त कर सकते हैं। 
 
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक बजट के बाद से ऐसे तीन बॉन्ड जारी किए जा चुके हैं। जुलाई में 185 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे गए, अगस्त में 359 करोड़ रुपये के बॉन्ड और सितंबर में 244 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचे गए। इस तरह कुल 788 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड बेचे गए। मात्रा के हिसाब से यह सोना 2.19 टन रहा। पिछले दो महीनों में सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड में किया गया यह निवेश जुलाई 2017 के बाद का सबसे अधिक निवेश है जब एक ही महीने में 653 करोड़ रुपये के बॉन्ड (2.35 टन) बेचे गए थे।
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