बिजनेस स्टैंडर्ड - कॉरपोरेट कर में कमी के पीछे का गणित
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कॉरपोरेट कर में कमी के पीछे का गणित

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 25, 2019

पिछले सप्ताह कॉरपोरेट कर की दर कम करने के वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के फैसले से यह बड़ा सवाल पैदा हुआ है कि इसका सरकार की राजकोषीय स्थिति पर क्या वास्तविक असर होगा। शुक्रवार को सीतारमण ने कहा कि इन उपायों से सरकारी खजाने को 1.45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। यह बहुत बड़ी राशि है जो मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान आने वाले कुल कॉरपोरेट कर संग्रह का करीब 19 फीसदी है। इससे राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.7 फीसदी तक बढ़ जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार का राजकोषीय घाटा 3.3 फीसदी के लक्ष्य से बढ़कर 4 फीसदी पहुंच जाएगा। लेकिन रविवार को सीतारमण ने संवाददाताओं से कहा कि दर में कटौती के बाद वह इसके अनुपालन में सुधार की उम्मीद कर रही हैं और इससे उन्हें राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर टिके रहने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकारी खर्च में कटौती करने की कोई योजना नहीं है।

 
तो फिर सीतारमण के इस आत्मविश्वास का क्या राज है जिसके आधार पर वह यह दावा कर रही हैं कि वह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से नहीं फिसलेंगी या सरकारी खर्च में भी कटौती नहीं करेंगी? वित्त मंत्री ने जिस तरह कॉरपोरेट कर की दरों में बदलाव किया है, अगर आप थोड़ा उसकी तह में जाएंगे तो आपको पता चल सकता है कि उनके आत्मविश्वास की वजह क्या है। वह उम्मीद कर रही हैं कि कई कंपनियां उन्हें मिल रहे कर प्रोत्साहन और छूट को त्याग देंगी और 25 फीसदीकी नई कर व्यवस्था अपनाएंगी। उल्लेखनीय है कि 25 फीसदी की नई कर दर का फायदा केवल उन्हीं कंपनियों को मिलेगा जो मौजूदा कर प्रोत्साहनों और छूट को छोड़ देंगी। एक बार आपने इसे छोड़ दिया तो आप दोबारा इस व्यवस्था में नहीं लौट पाएंगे।
 
तो फिर इस तरह की छूट और प्रोत्साहन के कारण सरकार को राजस्व का कितना नुकसान हुआ? वित्त वर्ष 2018-19 में 28 तरह की विभिन्न कर छूट और प्रोत्साहन के कारण सरकार को 1.08 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इनमें निर्यात, त्वरित मूल्यह्रास, विशेष आर्थिक क्षेत्रों में इकाइयां स्थापित करने और खास राज्यों में निवेश पर मिलने वाली छूट और कर प्रोत्साहन शामिल हैं। सरकार के राजस्व को 80 फीसदी से अधिक नुकसान निर्यात लाभ और त्वरित मूल्यह्रास के कारण हुआ। 
 
मान लीजिए कि अगर सभी कंपनियां 25 फीसदी कर की दर का विकल्प चुनती हैं और कर प्रोत्साहन एवं छूट को छोड़ देती हैं तो सरकार को 1.08 लाख करोड़ रुपये की बचत होगी। सरकार को वित्त वर्ष 2018-19 में कर प्रोत्साहन और छूट के कारण इतना ही नुकसान हुआ था। अभी इसका कोई अनुमान नहीं है कि मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान सरकारी खजाने को इस कारण कितना नुकसान होगा। संभव है कि इस पूरी राशि की बचत नहीं होगी क्योंकि कुछ कंपनियां ये छूट लेना ही जारी रखेंगी। लेकिन निश्चित रूप से बचत का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस तरह कॉरपोरेट कर की दर में कमी के सीतारमण के फैसले से राजस्व के नुकसान का एक हिस्सा बच जाएगा। 
 
उल्लेखनीय है कि भारतीय कंपनियों के लिए कर की प्रभावी दर (कर छूट के बाद) 2018-19 में 29 फीसदी थी जबकि कर की वास्तविक दर 35 फीसदी थी। कुल मिलाकर उद्योग जगत को चार फीसदी का शुद्घ कर लाभ होगा। पहले कॉरपोरेट कर की प्रभावी दर 29 फीसदी थी जो अब 25 फीसदी हो गई है। लेकिन छूट लाभ के नुकसान के साथ-साथ कर की दरों में बदलाव का असर अलग-अलग कंपनियों पर अलग-अलग होगा। बैंक जैसी वित्तीय सेवा कंपनियों को भारी फायदा होगा क्योंकि अभी उन्हें कर छूट का कोई फायदा नहीं मिलता है। लेकिन बड़ी संख्या में बुनियादी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को कर छूट का भारी फायदा मिलता है। अगर वे नई कर दरों को अपनाती हैं तो सरकार को कर प्रोत्साहन के रूप में राजस्व का कम नुकसान होगा। 
 
अगर शेयर बाजारों में तेजी आई है तो इसकी वजह यह है कि बंबई स्टॉक एक्सचेंज और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के बेंचमार्क सूचकांकों में बड़ी संख्या में वित्तीय क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। क्रिसिल रिसर्च द्वारा 1,000 शीर्ष सूचीबद्व कंपनियों पर किए  गए अध्ययन के मुताबिक सीतारमण की घोषणा के कारण उन्हें कर में करीब 37,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। आखिर में सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर उद्योग जगत का वास्तविक फायदा इतना कम है तो सरकार के राजस्व का नुकसान 1.45 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से बहुत कम होगा। तो क्या वास्तविक कर प्रोत्साहन पूर्वानुमान से बहुत कम है और शेयर बाजारों ने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दी है? 
 
इतना तो तय है कि अगर कॉरपोरेट कर कटौती से राजकोषीय घाटे पर 1.45 लाख करोड़ रुपये से कम का असर भी पड़ता है, तब भी राजकोषीय मोर्चे पर सरकार की परेशानी खत्म होने वाली नहीं हैं। मौजूदा वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में सकल कर संग्रह में कमी (यह केवल 6 फीसदी बढ़ रहा है जबकि बजट लक्ष्य 18 फीसदी बढ़त का है) का मतलब होगा कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 3.3 फीसदी रखने का लक्ष्य हासिल करना किसी भी स्थिति में मुश्किल होगा। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, corporate tax,,
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