बिजनेस स्टैंडर्ड - औद्योगिक कार्यों में जल उपयोग पर काबू जरूरी
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औद्योगिक कार्यों में जल उपयोग पर काबू जरूरी

मिहिर शाह /  September 25, 2019

पानी की औद्योगिक मांग बढऩे के साथ भारत को अब जलापूर्ति ढांचे में निवेश करना होगा ताकि पानी को लेकर टकराव और उद्योग बंदी की स्थिति से बचा जा सके। बता रहे हैं मिहिर शाह

 
हम इस बात को नकारते रहे हैं कि पानी भारत के आधारभूत ढांचे का सबसे अहम एवं सुधारों से वंचित क्षेत्र है। पानी का अभाव भारत में औद्योगिक वृद्धि को बनाए रखने की राह में बड़ा अवरोधक हो सकता है। पिछले दशक में औद्योगिक इकाइयों का पानी की कमी के चलते बंद होना तेजी से आम हुआ है। भारत की औद्योगिक गतिविधियों में सबसे ज्यादा पानी का इस्तेमाल तापीय बिजली संयंत्रों में होता है। विश्व संसाधन संस्थान के मुताबिक, वर्ष 2016 में पानी की कमी होने से भारत को 14 टेरावाट की तापीय बिजली नहीं पैदा हो सकी जिससे कुल बिजली उत्पादन में 20 फीसदी से अधिक वृद्धि का नुकसान उठाना पड़ा। वर्ष 2013-16 के दौरान पानी के अभाव ने भारत के 20 बड़े तापीय बिजली संयंत्रों में से 14 संयंत्रों को कम-से-कम एक बार अपना उत्पादन ठप करना पड़ा जिससे उन्हें 1.4 अरब डॉलर के संभावित राजस्व का नुकसान हुआ। ग्रासिम इंडस्ट्रीज ने वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश के नागदा स्थित अपने संयंत्र में स्टेपल फाइबर का उत्पादन कम कर दिया था। इसी तरह 2016 में राष्ट्रीय इस्पात निगम को भारी जल संकट के कारण अपनी क्षमता में कटौती करनी पड़ी।
 
इसी समय किसानों के साथ टकराव की घटनाएं देश के अलग-अलग स्थानों पर देखने को मिली हैं। वर्ष 2014 में कोका कोला को अपने वाराणसी संयंत्र के विस्तार की योजना को किसानों के विरोध के चलते रद्द करना पड़ा था। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में बजाज एनर्जी के बुरोगांव स्थित संयंत्र पर एक सिंचाई बांध का पानी गैरकानूनी ढंग से लेने का आरोप लगाने वाली याचिका दायर की गई थी। इस साल की शुरुआत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के मुंद्रा में टाटा पावर के संयंत्र के निर्माण के चलते स्थानीय किसानों एवं मछुआरों की जिंदगी पर पड़ रहे असर को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई की मंजूरी दे दी। हमारे 399 तापीय बिजली संयंत्रों में से करीब 40 फीसदी पानी के अभाव वाले इलाकों में स्थित हैं, लिहाजा किसानों के साथ टकराव की घटनाएं सामने आ रही हैं, खासकर महाराष्ट्र और राजस्थान में। 
 
इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय उद्योग दुनिया भर में सबसे ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों में शामिल है। भारतीय औद्योगिक इकाइयां ताजे पानी पर अत्यधिक निर्भर होने के साथ ही अपने अवशिष्ट पानी को शोधित किए बगैर नदियों एवं खुली जगह पर छोड़ देती हैं। अच्छी खबर यह है कि तकनीक एवं निवेश का इस्तेमाल कर वॉटर फुटप्रिंट को नाटकीय रूप से कम भी किया जा सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण थर्मल पावर है। इन संयंत्रों के कूलिंग टावर में पानी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है और देश के करीब 90 फीसदी तापीय बिजली उत्पादन में इस काम के लिए मीठे पानी का इस्तेमाल होता है। अनुमान लगाया गया है कि भारत के सभी तापीय बिजली संयंत्रों को ओपन-लूप सिस्टम से बदलकर क्लोज्ड-साइकिल कूलिंग सिस्टम में लाने से रोजाना करीब 6.5 लाख लीटर मीठे पानी की बचत की जा सकती है। तापीय बिजली के उत्पादन में निकलने वाली राख के निष्पादन में भी बड़ी मात्रा में पानी लगता है। राख अवशिष्ट को मीठे पानी का इस्तेमाल कर गारे में तब्दील कर दिया जाता है और फिर उसे निपटान के लिए नजदीकी खाई में डाल दिया जाता है। इस तरह बड़े पैमाने पर अपशिष्ट जल का निपटारा हो जाता है। इस पानी को दोबारा इस्तेमाल में लाकर और रिसाइकल कर अच्छी-खासी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है। अपशिष्ट जल शोधन एवं रिसाइक्लिंग प्रणालियों में किए गए निवेश की वसूली तीन साल में ही हो जाती है। शोधित जल के लिए बढ़ती मांग भी एक अतिरिक्त प्रोत्साहन है।
 
इस तरह, विकल्प मौजूद हैं और वे आसानी से उपलब्ध होने के साथ ही किफायती भी हैं। फिर उनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है? एक बार फिर यह नीतिगत प्रोत्साहन का मामला है। औद्योगिक क्षेत्र का कोई नियमित जल ऑडिट नहीं होता है और पानी लगभग मुफ्त एवं आसानी से उपलब्ध है लिहाजा इसका दुरुपयोग व्यापक है। एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि भारत के तापीय बिजली संयंत्र पर्यावरण मंत्रालय की निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में पानी का उपयोग कर रहे हैं। सरकार को समग्र जल ऑडिट को औद्योगिक गतिविधि का एक क्रमिक लक्षण बनाने की जरूरत है ताकि हमें मौजूदा जल उपयोग के बारे में जान सकें, परिवर्तनों की निगरानी करें और सबसे कम लागत वाली जल-सक्षम तकनीक एवं प्रक्रियाएं निर्धारित कर सकें। इससे पानी की मांग कम करने और प्रति इकाई जल उपयोग पर वद्र्धित औद्योगिक मूल्य बढ़ाने में मदद मिलेगी। अपने वार्षिक रिपोर्ट में कंपनियों को साल भर में इस्तेमाल किए गए पानी के बारे में भी जानकारी देना चाहिए। इसमें गतिविधि-आधारित ताजे पानी के उपयोग और हरेक उत्पादन कार्य में दोबारा इस्तेमाल हुए शोधित जल की मात्रा के बारे में भी बताना चाहिए। इस रिपोर्ट में उनकी कुल आपूर्ति शृंखला में इस्तेमाल हुए पानी की जानकारी देनी चाहिए।
 
एक कंपनी को एक निर्धारित अवधि के भीतर पानी के उपयोग में निर्धारित कटौती लाने का एक स्पष्ट रोडमैप और समयसीमा भी बतानी चाहिए। इसी के साथ हमें पारदर्शी लक्ष्य-निर्धारण करने के लिए हरेक गतिविधि में जल-उपयोग का एक बेंचमार्क भी तय करना चाहिए। पानी के अधिक इस्तेमाल वाली इकाइयों- मसलन, ताप बिजली संयंत्र, कागज एवं लुगदी, कपड़ा, खानपान, चर्मशोधन, धातु, रसायन, औषधि, तेल, गैस एवं खनन इकाइयों के साथ इसकी शुरुआत की जा सकती है। सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की कुछ बेहतरीन इकाइयां पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुकी हैं।
 
ऐसे जल ऑडिट से प्रशिक्षण जरूरतों एवं व्यवहारगत बदलावों का कारगर तरीका निर्धारित करने में भी मदद मिलेगी। व्यवहार एवं तकनीक दोनों स्तरों पर साथ-साथ बदलाव लाने से ही पानी बचाया जा सकता है। उद्योग जगत को इस राह पर अधिक विश्वसनीय ढंग से बढ़ाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपने परिसरों में जल ऑडिट कर एक नजीर पेश करनी चाहिए। सरकार को ऐसे संस्थानों के गठन में मदद करनी चाहिए जो पानी के विवेकपूर्ण उपयोग संबंधी उद्योग-केंद्रित परंपराओं पर जानकारी मुहैया कराएं, जल ऑडिट एवं जल उपयोग परामर्श सेवाओं में विशेषज्ञता प्रदान करें, विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक असाधारण मामलों के अध्ययन का विवरण दें और जल-संरक्षण एवं जल सक्षम तकनीकों के बारे में जानकारी का मंच बन सकें।
 
एक बार यह व्यवस्था बन जाने पर दुनिया भर से हासिल अनुभव यह दर्शाएंगे कि अर्थपूर्ण अर्थव्यवस्था में जल उपयोग को असरदार रखा जाता है। मौजूदा समय में जल उपयोग का 15-90 फीसदी हिस्सा ही बचाया जाता है जो अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों पर आधारित होता है। औद्योगिक बंदी और पानी को लेकर टकराव के बढ़ते मामलों को देखते हुए इन सुधारात्मक कदमों का पालन स्वैच्छिक रखना चाहिए। हरेक कंपनी अपने विवेक के आधार पर इसका अनुसरण करे। सरकार को बस इन बदलावों में सक्रिय रूप से सहयोग करने की जरूरत है।
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: industry, water, recycle,,
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