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नौसैनिक ताकत दिलाएगी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़त

प्रेमवीर दास /  September 24, 2019

हिंद महासागर में चीन के युद्धपोतों की लगभग स्थायी मौजूदगी होने  से भारत को अपनी नौसेना को ताकतवर बनाने की जरूरत है ताकि वह इस क्षेत्र में अहम भूमिका निभा सके। बता रहे हैं प्रेमवीर दास

 
दुनिया के इस हिस्से में हिंद-प्रशांत शब्दावली एक अहम सामरिक स्थान हासिल कर चुकी है। हालांकि हिंद-प्रशांत को लोग अलग-अलग नजरिये से देखते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नजर में यह एक भू-राजनीतिक इकाई है जिसका विस्तार भारत के पूर्वी तट से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिसाब से हिंद-प्रशांत का इलाका अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर अमेरिकी तट तक है। कुछ लोगों के लिए इस क्षेत्र का विस्तार अब पश्चिम की तरफ हो चुका है। वहीं आसियान के अधिकांश देशों के लिए यह दक्षिण चीन सागर के साथ लगा हुआ इलाका है।
 
वहीं चीन की राय में हिंद-प्रशांत जैसे क्षेत्र का वजूद ही नहीं है और यह महज अमेरिका एवं उसके समर्थकों की उपज है। रूस, जापान और चीन के हित हिंद-प्रशांत से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए इस शब्दावली के मायने इस बात से तय होंगे कि उसकी चिंताएं क्या हैं और हमारे सुरक्षा हितों पर उसका क्या असर पड़ रहा है? विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस की अपनी हालिया यात्रा के दौरान भारत की स्थिति को सारगर्भित ढंग से पेश किया था। विदेश सचिव के अलावा सिंगापुर और चीन में भारत के राजदूत भी रह चुके जयशंकर को इसकी अहमियत के बारे में बखूबी पता है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि हमारी सामरिक परिदृश्य लुक ईस्ट से ऐक्ट ईस्ट के रूप में बदला था और अब यह हिंद-प्रशांत पर केंद्रित हो रहा है। उन्होंने इस विशाल समुद्री क्षेत्र में आसियान के बुनियादी योगदान का जिक्र किया और एक तरफ खाड़ी एवं अफ्रीका क्षेत्र और दूसरी तरफ पश्चिमी प्रशांत के तटीय इलाके में भारत के अंतरफलक का उल्लेख किया।
 
हिंद महासागर के मध्य में स्थित होने और करीब 55 फीसदी विदेशी कारोबार इस विशाल समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरने की वजह से भारत की सामरिक चिंताएं इस क्षेत्र के पश्चिमी तट से लेकर पूर्व की तरफ आसियान, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन तक फैली हुई हैं। राजनीतिक रूप से महज नजदीकी पड़ोस ही नहीं बल्कि दूर के तटीय इलाके भी चिंता का मुद्दा होते हैं। लिहाजा भारत के लिए हिंद-प्रशांत केवल बयानबाजी नहीं बल्कि जमीनी हकीकत है और इस क्षेत्र में शांति स्थापना के लिए अहम है। 
 
चीन हिंद-प्रशांत की धारणा में यकीन ही नहीं रखता है। उसने हमेशा ही पूर्व एवं दक्षिण चीन सागर को अपना इलाका माना है और जापान के साथ रिश्ते एवं दक्षिण चीन सागर में इस धारणा का असर नजर आता रहा है। चीन का जापान के अलावा वियतनाम, मलेशिया और फिलीपींस के साथ समुद्री इलाके को लेकर टकराव रहा है। पिछले दो दशकों में चीन ने हिंद महासागर के पश्चिमी सिरे तक अपने हितों का विस्तार कर दिया है। चीन ने म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और पूर्वी अफ्रीकी तट पर नौवहन ढांचा तैयार करने के अलावा जिबूती और पाकिस्तान के ग्वादर में अपने नौसैनिक अड्डे भी स्थापित किए हैं। इसके जहाज हिंद महासागर में लगभग स्थायी तौर पर मौजूद रहते हैं और चीनी पनडुब्बियां भी आती-जाती रहती हैं। असल में, दूर होने के बावजूद चीन हिंद महासागर की एक वास्तविक समुद्री ताकत बन चुका है। अमेरिका की तो हमेशा से ही इस क्षेत्र में दबदबे वाली मौजूदगी रही है।
 
कुल मिलाकर, हिंद-प्रशांत क्षेत्र को कोई देश स्वीकार करे या नहीं, सच तो यही है कि यह बड़ा इलाका वजूद में है और यह बुनियादी तौर पर एक नौवहन क्षेत्र है। दर्जनों देशों के तट इस क्षेत्र में हैं और इसके समुद्रों पर वे निर्भर हैं। मध्य एशियाई गणराज्य, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे भूमिबद्ध देशों को भी हिंद-प्रशांत के समुद्री इलाके तक पहुंच के रास्ते एवं साधन तलाशने होते हैं और इस तरह ये देश भी वहां के घटनाक्रम से प्रभावित होते हैं। बहुत कम देशों के पास ही इस क्षेत्र में आवागमन की आजादी प्रभावित करने या उस पर नजर रखने के लिए आकार और सामरिक जरूरत मौजूद है और भारत उनमें से एक है। निश्चित रूप से भारत हिंद महासागरीय परिक्षेत्र में प्रमुख क्षेत्रीय स्थान रखता है। 
 
हिंद-प्रशांत में सार्थक भूमिका निभाने की मंशा रखने वाले देश के पास तीन गुण होने अनिवार्य हैं। उसके पास एक स्थिर एवं जोडऩे वाली नीति होने के साथ ही आर्थिक एवं तकनीकी सामथ्र्य होना भी जरूरी है। तीसरा अपरिहार्य गुण, अपनी सामरिक दृष्टि के अनुरूप समुद्री ताकत भी हो। अमेरिका पहले से ही एक भरोसेमंद नौसैनिक शक्ति है और चीन ने भी अपनी सैन्य शक्ति को अपनी समुद्री जरूरतों के हिसाब से पुनर्गठित किया है। हमें भारत को भी इसी संदर्भ में देखना होगा। नौसेना प्रमुख ने गत दिनों पुणे में एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा था कि रक्षा बजट में नौसेना की हिस्सेदारी घटकर 13 फीसदी पर आ गई है जबकि वर्ष 2013 में यह 18 फीसदी हुआ करती थी। रोचक बात यह है कि 1987 में भी नौसेना की बजट हिस्सेदारी 13 फीसदी ही थी लेकिन धीरे-धीरे बढ़ते हुए करीब ढाई दशक बाद 18 फीसदी के स्तर पर पहुंची थी। चौंकाने वाली बात यह है कि जंगी बेड़े एवं पनडुब्बियों की संख्या अब भी कमोबेश तीन दशक पहले के स्तर पर ही है। जिस देश का शीर्ष नेतृत्व हिंद-प्रशांत को अपनी सामरिक रणभूमि घोषित करता है, उसकी नौसेना के बजट में गत छह वर्षों में आई गिरावट अचंभित करती है।
 
इसकी बड़ी वजह यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में कोई भी सुसंगत एवं समग्र रणनीति बन ही नहीं पाई है और कभी दफन हो चुका 'दो मोर्चों पर जंग की तैयारी' वाला सिद्धांत हाल के वर्षों में फिर से विमर्श का मुद्दा बन चुका है। इसके लिए हमारे पास मौजूदा आकार जितनी एक सहयोगी सेना रखने की जरूरत होगी और उसके हिसाब से हमें हथियार, साजो-सामान और उनके रखरखाव के लिए संसाधन झोंकने पड़ेंगे जिससे राजस्व खर्च बढ़ जाएगा। ऐसे में सेना के तीनों अंगों के लिए बजट हिस्सेदारी की भविष्यवाणी के लिए बहुत बुद्धिमान होने की जरूरत नहीं है। थल सेना को 55 फीसदी, वायु सेना को 22 फीसदी और नौसेना को 13 फीसदी देने के बाद बाकी रकम डीआरडीओ एवं अन्य में बांट दी जाए। हो सकता है कि ये आंकड़े पूरी तरह सही न हो लेकिन वे एकदम गलत भी नहीं हो सकते हैं। लिहाजा नौसैनिक दबदबा हासिल करने की चाहत एक सपना ही बनी रहेगी।  
 
हम जब तक अपनी समूची सेना के संरचनात्मक विन्यास की समीक्षा नहीं करते हैं, तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। संरचनात्मक समीक्षा के लिए एक दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति बनाने की जरूरत होगी। ऐसी चर्चाएं हैं कि यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है। उम्मीद करते हैं कि यह काफी बड़े बदलाव लेकर आएगी और पुरानी संकल्पनाओं को तिलांजलि दे देगी। अगर हिंद-प्रशांत क्षेत्र को हमारा सामरिक रंगमंच बनाना है तो हमें अपनी नौसैनिक ताकत को सशक्त करना होगा।
 
(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: indian, navy, hind sea, prashant sea,,
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