बिजनेस स्टैंडर्ड - निजी रेल का मुश्किल सफर
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निजी रेल का मुश्किल सफर

संपादकीय /  September 24, 2019

भारतीय रेल यात्रियों को जल्द ही निजी रेल की यात्रा करने का अवसर मिल सकता है। इस संभावना ने इस क्षेत्र पर नजर रखने वाले अनेक पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। खबरों के मुताबिक भारतीय रेल, ट्रेनों के परिचालन के लिए निजी-सार्वजनिक भागीदारी का खाका तैयार कर चुका है और अगले वर्ष के आरंभ में संभावित मार्गों की बोली प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी। यह समय सीमा उचित प्रतीत होती है क्योंकि माल ढुलाई कॉरिडोर अगले दो वर्ष में शुरू हो जाएंगे। इससे दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के बीच मौजूदा मिश्रित उपयोग वाले कॉरिडार की क्षमता काफी हद तक मुक्त हो जाएगी। अगले तीन से चार साल में ऐसे नए मार्गों पर भी अनुमति दी जा सकती है जहां ट्रेनों की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक होगी। रेलवे को उम्मीद है कि करीब 150 मार्ग निजी सेवा प्रदाताओं को दिए जा सकते हैं जो अपने कोच-इंजन और चालकों के साथ सेवा शुरू करेंगे। इन्हें रेलवे द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। यदि सबकुछ योजना के मुताबिक चला और विदेशी निवेशक मसलन यूरोप की बड़ी रेल कंपनियां इसमें रुचि दिखाती हैं तो रेलवे को इससे ढेर सारे संसाधन हासिल होंगे। 

 
इसकी प्रेरणा तो समझी जा सकती है लेकिन यह विचार आप में गलत है। इस विषय पर ढेरों सवाल खड़े हो सकते हैं और कुछ सवाल तो ऐसे हैं जो इस पूरी योजना को ही खारिज करने की स्थिति तैयार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए निजी क्षेत्र को परिचालन के लिए कौन से मार्ग और कौन सा समय आवंटित किया जाएगा? अगर सबसे लाभकारी मार्ग और समय दिए जाएंगे तो क्या इसका सीधा असर रेलवे के संसाधनों पर नहीं पड़ेगा? दूसरा, क्या कंपनियों को मूल्य तय करने का अधिकार भी होगा? एक स्वतंत्र नियामक गठित करने का वादा किया गया है लेकिन किराये की सीमा तय करने की भी चर्चा है। अगर संबंधित अनुबंध लंबी अवधि के लिए किए गए तो यकीनन मूल्य तय करने का अधिकार निजी परिचालकों को होगा, वरना उनका जोखिम बहुत अधिक बढ़ जाएगा जो स्वीकार्य नहीं होगा। स्वतंत्र नियामक ही विवाद भी हल करेगा। परंतु हमारे देश में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के विवाद अंतहीन होते हैं। इन्हें हल करना बहुत मुश्किल होता है। इस मामले में शायद हर मिनट विवाद खड़ा हो क्योंकि रेलें स्टेशन पर जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी या भीड़ वाले मार्ग में पहुंच को लेकर प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी। किसी भीड़ भरे स्टेशन के बाहर किसे प्राथमिकता मिलेगी भारतीय रेल की उपनगरीय टे्रन को या निजी परिचालक की ट्रेन को? यदि भारतीय रेल अपनी ट्रेन के पक्ष में निर्णय करती है तो क्या इस निर्णय के खिलाफ अपील हो सकती है, और अपील का बिंदु क्या होगा क्योंकि यह मुद्दा तो मिनटों में निपटाना होगा। इस परिदृश्य में कुछ ही निवेशक रुचि दिखाएंगे।
 
अगर निजी परिचालकों को ध्यान में रखना है तो भारतीय रेल और रेलवे बोर्ड में भी सुधार जरूरी हैं। संभवत: इन्हें अलग भी करना होगा। यदि नेटवर्क की मालिक भी बतौर सेवा प्रदाता निजी परिचालकों के साथ प्रतिस्पर्धा करेगी तो विवाद और भ्रष्टाचार के अंतहीन अवसर उत्पन्न होंगे। तार्किक ढंग से देखा जाए तो निजी क्षेत्र की रेल और सरकारी नेटवर्क को एक दूसरे से पूरी तरह अलग करना होगा। परंतु तब ब्रिटेन की तरह नेटवर्क में निवेश की कमी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। निजी ट्रेन का विचार अच्छा लग सकता है लेकिन रेलवे में आमूलचूल सुधार का कोई विकल्प नहीं है। इसकी शुरुआत विभिन्न विभागों के बीच की दीवार खत्म कर कॉर्पोरेट शैली में एकीकृत ढांचा तैयार करके करनी होगी। 
Keyword: railway, train, network, fright,,
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