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नई दर के बाद घटेगी सीमित दायित्व वाली साझेदारी की चमक

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई September 23, 2019

सीमित दायित्व वाली साझेदारी की चमक इस देश मेंं फीकी पड़ सकती है क्योंकि कंपनियों के आयकर की दर में कटौती के सरकारी फैसले के बाद कंपनियों के लिए कर की अलग-अलग दर का दायरा बढ़ा है। शुक्रवार को कंपनियों के लिए कर की आधारभूत दर 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी कर दी गई और नई देसी विनिर्माण कंपनियों के लिए यह दर घटाकर 15 फीसदी कर दी गई। इन इकाइयों के लिए अधिभार व उपकर समेत कर की प्रभावी दर क्रमश: 25.17 फीसदी और 17.16 फीसदी है। दूसरी ओर सीमित दायित्व वाली साझेदारी (एलएलपी) पर 30 फीसदी कर लगात है और अधिभार व उपकर समेत कर की प्रभावी दर करीब 35 फीसदी बैठती है।

 
विशेषज्ञों का मानना है कि विनिर्माण इकाई स्थापित करने वाले कंपनी ढांचे का विकल्प चुन सकते हैं क्योंकि एलएलपी के मुकाबले यहां कर की दर 17 फीसदी है। अन्य कंपनियों के लिए एलएलपी या कंपनी ढांचा चुनने का फैसला इस पर निर्भर करेगा कि लाभ को कारोबार में वापस लगाया जा सकता है या फिर शेयरधारकों को लाभांश के तौर पर दिया जा सकता है। ईवाई इंडिया के पार्टनर तेजस देसाई ने कहा, वित्त मंत्री की तरफ से कर में बदलाव की घोषणा से कंपनी व एलएलपी के बीच टैक्स आर्बिट्रेज घटेगा और नए कारोबार को कानूनी इकाई के विकल्प पर सावधानीपूर्वक विचार करने के लिए बाध्य करेगा।
 
शार्दुल अमरचंद मंगलदास कंपनी के पार्टनर अभय शर्मा ने कहा, ऐसे में एलएलपी अब ज्यादा महंगा विकल्प है। एलएलपी का मामला तब बन सकता है जब हम लाभांश के जरिए रकम बाहर निकालने पर विचार कर रहे हों। इस मामले में एलएलपी पर गैर-विनिर्माण कंपनियां विचार कर सकती हैं क्योंकि यहां लाभांश वितरण कर नहीं लगता।  कंपनियों के लिए लाभांश वितरण कर की प्रभावी दर 20.56 फीसदी है। लाभांश वितरण कर का भुगतान घोषणा, वितरण या लाभांश के भुगतान के 14 दिन के भीतर करना होता है (जो भी पहले हो)। इसका भुगतान नहीं होने पर लाभांश वितरण कर का एक फीसदी ब्याज के तौर पर लिया जाता है और यह उस अवधि तक का होता है जब तक कि सरकार को भुगतान नहींं कर दिया जाता।
 
ट्रांजेक्शन स्क्वैयर के संस्थापक गिरीश वनवारी ने कहा, अगर फिर से निवेश का लक्ष्य है तो एलएलएपी आकर्षक विकल्प नहीं है। लेकिन मौजूदा माहौल में कई क्लाइंट बिना लाभांश वितरण कर की देनदारी के बिना लाभ निकालने को प्राथमिकता देना चाहेंगे। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने मार्च में परिपत्र जारी कर विनिर्माण में शामिल इकाइयों को एलएलपी ढांचा अपनाने पर रोक दिया था, जिससे कथित तौर पर 10,000 से ज्यादा एलएलपी पर अनिश्चितता पैदा हुई। हालांकि अप्रैल में यह परिपत्र वापस ले लिया गया।
 
प्रवर्तकों की दुविधा
 
वैयक्तिक व कंपनियों के स्तर पर कर की ज्यादा दर कंपनियोंं के प्रवर्तकों को लाभांश या वेतन आदि के जरिये रकम निकालने के बजाय कंपनी में इसे निवेशित रहने देने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। पीडब्ल्यूसी के लीडर (वित्तीय सेवा कर) भाविन शाह ने कहा, कंपनियों के लिए कर की दर घटने और धनाढ्यों पर ज्यादा कर से प्रवर्तक लाभांश की घोषणा या वेतन के जरिए रकम निकालने के बजाय कंपनी में ही रकम बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित होंगे। यह रकम कारोबार में दोबारा निवेशित हो सता है, जिससे अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी। शर्मा ने कहा, धनाढ्य कर बना रहेगा क्योंकि सरकार चाहती है कि लाभ या सरप्लस कंपनी में बना रहे। कंपनी में यह नकदी दोबारा लगाए जाने से नौकरियां सृजित हो सकती हैं और उपभोग बढ़ सकता है।
Keyword: LLP, nirmala sitaraman, economy, corporate tax,,
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