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दुर्गा पूजा के बजट पर इस बार मंदी का असर

अभिषेक रक्षित /  September 23, 2019

आर्थिक मंदी का पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा भी असर पड़ रहा है। ज्यादातर बड़ी पूजा समितियों को प्रायोजकों से मिलने वाली धनराशि में 20 से 50 फीसदी कमी आई है जबकि छोटे क्लब इस त्योहार को मनाने के लिए बजट घटाने को को मजबूर हैं।  उदाहरण के लिए ठाकुरपुर में एसबी पार्क पूजा समिति ने खर्च नियंत्रित रखने के लिए तीन के बजाय एक दिन ही त्योहार का जश्न मनाने का फैसला किया है। एसबी पार्क पूजा समिति के अध्यक्ष संजय मजूमदार ने कहा, 'हम आम तौर पर पूरे पड़ोस के लिए भोज का आयोजन करते हैं, लेकिन हमें अन्य खर्च पूरे करने के लिए इसमें कमी करनी पड़ी। इस बार प्रायोजकों से प्राप्त धनराशि में करीब 40 फीसदी कमी आई है।'

 
दक्षिण कोलकाता में सबसे बड़ी भीड़ खींचने वाले इकडालिया एवरग्रीन क्लब के गौतम मुखर्जी के मुताबिक नियमित प्रायोजकों ने पिछले कुछ महीनों के दौरान मंदी का हवाला देते हुए हाथ खींच लिए हैं, जबकि नए प्रायोजक संपर्क करने पर खर्च करने में अनिच्छा जता रहे हैं। इस साल उसका बजट 50 फीसदी कम हो गया है। उन्होंने कहा कि कुछ सबसे बड़े मोबाइल फोन विक्रेता और कॉस्मेटिक कंपनियां सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं। वहीं वाहन, बैंक, लॉजिस्टिक्स, एफएमसीजी जैसे क्षेत्र और कुछ प्रमुख स्थानीय कंपनियां खर्च नहीं करना चाहती हैं। मुखर्जी ने कहा, 'हमने उपाय के तौर पर साज-सज्जा की लाइटों पर खर्च में कमी की है।' ऐसे कदम उठाने से होने वाली बचत का इस्तेमाल पंडाल बनाने और उसकी साज-सज्जा, हस्तशिल्प और मूर्ति बनाने जैसे अन्य खर्चों को उठाने में किया जाएगा। इसी तरह शहर के उत्तरी हिस्से में सबसे लोकप्रिय कॉलेज स्कवेयर सर्बजोनिन दुर्गोत्सब कमेटी ने विसर्जन (इस त्योहार के आखिरी दिन मूर्ति का विर्सजन) के लिए खर्च करने का फैसला किया है। 
 
आम तौर पर बड़ी पूजा समितियों के लिए पंडाल और साज-सज्जा का खर्च कुल बजट में करीब 40 फीसदी होता है। इनके अलावा 20 फीसदी बजट सजावटी लाइटों पर खर्च होता है। आम तौर पर मूर्ति की लागत कुल बजट में 10 से 15 फीसदी होती है, जबकि शेष खर्च लॉजिस्टिक्स, विसर्जन, खाना तैयार करने पर होता है।  हालांकि प्रायोजक कम होने के बावजूद प्रतिष्ठित पूजा समितियां पूजा के जश्न को कम नहीं करना चाहती हैं। कॉलेज स्कवेयर सर्वजन दुर्गोत्सव समिति के विकास मजूमदार ने कहा, 'हम बजट कम नहीं कर सकते हैं। बजट की कमी की भरपाई समितियों के आंतरिक संचित कोष से की जा रही है।'  उन्होंने वजह बताते हुए कहा, 'प्रायोजक जवाब नहीं दे रहे हैं, जो बड़ी पूजा समितियों के लिए बहुत चिंताजनक है क्योंकि वे स्वैच्छिक दान के बजाय प्रायोजनों पर ज्यादा निर्भर होती हैं। लेकिन अगर वे बड़ी धूमधाम से त्योहार को नहीं मनाएंगे तो लोग निराश होंगे।' इन बड़ी पूजा समितियों में से ज्यादातर का मानना है कि इस तरह क्लबों की संचित धनराशि खर्च हो रही है, जिसका अन्यथा रक्त दान कार्यक्रम, एंबुलेंस सेवा, गरीबों की मदद जैसी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता था। मजूमदार ने कहा, 'हालांकि बंगाली ऐसी दुर्गा पूजा नहीं चाहते, जिसमें चमक-दमक नहीं हो।'
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