बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय संकट के कगार पर राज्य
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राजकोषीय संकट के कगार पर राज्य

दिलाशा सेठ और अभिषेक वाघमारे /  09 22, 2019

कर राजस्व में होगा 1.45 लाख करोड़ रुपये का घाटा

कर राजस्व में धीमी वृद्धि और कॉरपोरेट कर में कमी से राज्यों को दोहरा झटका। नई घोषणा से सकल कर राजस्व में 1.45 लाख करोड़ रुपये का घाटा होगा, जिसमें से 60,000 करोड़ रुपये का भार राज्य वहन करेंगे

बिजनेस स्टैंडर्ड राजकोषीय संकट के कगार पर राज्यराज्य अपनी वित्तीय स्थिति बिगड़ने के कारण राजकोषीय संकट के कगार पर खड़े हैं। उन पर एक तरफ धीमी पड़ती राजस्व वृद्धि और दूसरी तरफ हाल में कॉरपोरेट कर में कमी का दोहरा असर पड़ रहा है। अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर राज्यों को या तो अपने खर्च में कटौती करनी पड़ेगी या उनका राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। इसका असर आने वाले वर्षों में भी बना रहेगा। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक देश के 16 प्रमुख राज्यों का कर राजस्व चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में 7 फीसदी कम हुआ है। हालांकि उनमें से 5 ने कर राजस्व में मामूली वृद्धि दर्ज की है।

आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और कर्नाटक तुलनात्मक रूप से ज्यादा खराब स्थिति में हैं। उनमें से लगभग सभी अपने सामने पैदा होने वाले हालातों को लेकर चिंतित हैं। यह चिंता ज्यादातर राज्यों के अनुमानित और वास्तविक कर राजस्व वृद्धि में भारी अंतर से साफ नजर आती है। यही वजह है कि 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एन के सिंह ने राज्यों से अपने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) राजस्व में अधिक उछाल लाने का आग्रह किया है। सिंह का कहने का मतलब है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि की तुलना में राजस्व में ज्यादा तेजी से वृद्धि होनी चाहिए। 

हाल में कॉरपोरेट कर में कटौती की गई है, जिससे सरकार को सकल कर राजस्व में 1.45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। 14वें वित्त आयोग के फॉर्मूले के मुताबिक अब सकल कर राजस्व में राज्यों का हिस्सा 42 फीसदी है, इसलिए इस कर राजस्व नुकसान में से सभी राज्यों को भी 60,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।

केरल के वित्त मंत्री थॉमस आइजक ने कहा, 'कॉरपोरेट कर विभाजित होने वाले कोष का हिस्सा है, इसलिए कॉरपोरेट कर में कटौती से होने वाले नुकसान में 42 फीसदी बोझ राज्यों को उठाना होगा। कॉरपोरेट क्षेत्र को खुश करने का फैसला राज्यों के राजकोषीय नुकसान की कीमत पर लिया गया है। केंद्र अपने घाटे की भरपाई किसी भी स्रोत से कर लेगा, लेकिन राज्यों के लिए इस घाटे की भरपाई करना मुश्किल है।'

बिजनेस स्टैंडर्ड राजकोषीय संकट के कगार पर राज्यहाल के फैसले में केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट कर की आधार दरें घटाई हैं, जबकि उपकर और अधिभार यथावत रखे हैं। केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों से आयकर पर उपकर और अधिभार में लगातार बढ़ोतरी कर रही है। उपकर और अधिकार से प्राप्त होने वाली रकम राज्यों के साथ साझा नहीं की जाती है।  लेकिन केंद्र भी बीते वर्ष को लेकर चिंतित है। इस साल जीएसटी राजस्व में पिछले साल की तुलना में मामूली वृद्धि रही है। ऐसे में राज्यों के राजस्व में कमी की भरपाई केंद्र को करनी होगी। केंद्र को वर्ष 2022 तक राज्यों को जीएसटी राजस्व में 14 फीसदी बढ़ोतरी मुहैया करानी होगी। यही वजह है कि राज्यों के वित्त मंत्री हालातों को देखते हुए जीएसटी दरों में कटौती के खिलाफ रुख अख्तियार कर रहे हैं। 

असम के वित्त मंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'मुझे नहीं लगता कि जीएसटी दरों में भारी कटौती की जाएगी क्योंकि हम पर पहले ही राजस्व का दबाव है। ज्यादातर राज्य हर्जाने पर निर्भर हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि वित्त आयोग के आवंटन की घोषणा तक परिषद दरों में कटौती करने की स्थिति में है।' वित्त वर्ष 2020 के पहले चार महीनों में अनुमानित राजस्व वृद्धि और वास्तविक वृद्धि के बीच के अंतर को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार व्यय में कटौती नजदीक है। इक्रा में प्रमुख अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, 'राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने के लिए व्यय में कटौती की जरूरत पडऩे की संभावना है।'

इक्रा ने इस महीने के प्रारंभ में प्रकाशित एक नोट में कहा, 'इन 17 राज्यों का वास्तविक पूंजीगत खर्च संशोधित अनुमानों से काफी कम था। यह इस चीज को दर्शाता है कि अनुमान से कम राजस्व प्राप्तियों पर व्यय में कमी करना जरूरी होगा। यह संभव है कि राज्य राजकोषीय घाटे एक निश्चित दायरे में रखने के लिए पूंजीगत व्यय में कमी करें।'

पिछले कुछ वर्षों के दौरान सार्वजनिक वित्त को लेकर बहुत से घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने केंद्र की तुलना में राज्यों की वित्तीय स्थिति ज्यादा खराब की है। पिछले दो केंद्रीय बजटों में केंद्र सरकार ने उपकर के रूप में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया है। इससे हर साल प्राप्त होने वाला 26,000 करोड़ रुपये का राजस्व पूरी तरह केंद्र सरकार की जेब में गया है क्योंकि उपकर को राज्यों के साथ नहीं बांटा जाता है। 

इस साल केंद्र सरकार देश के केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को इस बात के लिए राजी करने में सफल रही कि वह अपना बढ़ा हुआ लाभांश सरकार को हस्तांतरित करे। आरबीआई ने सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित करने को मंजूरी दे दी है। बजट आंकड़ों के अलावा प्राप्त होने वाला अतिरिक्त राजस्व केंद्र सरकार को प्राप्त होगा क्योंकि गैर-कर राजस्व केवल केंद्र सरकार के पास जाता है। 
Keyword: fiscal deficit, revenue, economy,,
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