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भूमि अधिग्रहण के कारण अटकी परियोजनाएं हो सकती हैं रद्द

मेघा मनचंदा / नई दिल्ली September 22, 2019

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) उन परियोजनाओं को रद्द कर सकता है, जहां राज्यों की ओर से जमीन अधिग्रहण का काम पूरा नहीं किया गया है। सूत्रों के मुताबिक ठेकेदारों ने जितना काम किया है, उसका भुगतान उन्हें कर दिया जाएगा। लेकिन परियोजना के बाकी हिस्से का काम खत्म क र दिया जाएगा। हाल के समय में ठेकेदारों के तमाम मामले पंचाट में गए हैं, जिसमें भूमि अधिग्रहण में देरी के कारण परियोजना अटकी है. इसके बाद सरकार ने यह फैसला किया है। सूत्र ने कहा कि इसके बारे में राज्यों को जल्द सूचित कर दिया जाएगा। 
 
यह नीति मुख्य रूप से इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (ईपीसी) परियोजनाओं पर लागू होगी, जिन मामलों में सड़क निर्माण कम से कम 3 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन जमीन अधिग्रहण में देरी के चलते अभी भी परियोजना अटकी है।  विशेषज्ञों का मानना है कि यह सकारात्मक कदम है। कम से कम उन परियोजनाओं के लिए यह बेहतर है, जिन पर अभी काम शुरू होना है क्योंकि उनकी जगह पर नई परियोजना के लिए बोली आमंत्रित की जा सकती है।  क्रिसिल इन्फ्रास्ट्रक्चर एडवाइजरी के निदेशक जगन्नारायाण पद्मनाभन ने कहा, 'निर्माणाधीन परियोजनाओं के मामले में डेवलपरों के सामने चुनौती आ सकती है क्योंकि इनके भुगतान अटके हुए हैं। उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।'
 
हाइब्रिड एन्युटी मॉडल की परियोजनाओं को इस श्रेणी में नहीं लाया गया है। यह मॉडल 2016 में पेश किया गया था और इसमें निर्माण शुरू करने के लिए शर्त जुड़ी हुई है, जिसके मुताबिक कोई कांट्रैक्टर 80 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण पूरा हुए बगैर काम नहीं शुरू कर सकता है।  नई ईपीसी परियोजनाओं में भी इसी तरह की शर्त रखी गई है कि 90 प्रतिशत जमीन अधिग्रहण होने के बाद ही निर्माण काम शुरू किया जाएगा।  एनएचएआई के एक पूर्व अधिकारी ने नाम सार्वजनिक न किए जाने की शर्त पर कहा, 'पुनरीक्षित ईपीसी दस्तावेजोंं में यह भी कहा गया है कि ठेकेदार को परियोजना आवंटित होने के 6 महीने के भीतर निर्माण के लिए जमीन दी जाएगी।' उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए इच्छुक किसी भी राज्य को सक्रिय होकर इसके लिए जमीन अधिग्रहण करना होगा। 
 
भूमि अधिग्रहण में देरी होने पर परियोजना रद्द किए जाने के एनएचएआई के फैसले से लागत में बढ़ोतरी की समस्या से भी मुक्ति मिलेगी।  एनएचएआई की हाल की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2018 में 1,014 पंचाट मामले उसके खिलाफ दाखिल थे, जो वित्त वर्ष 2017 के 125 और वित्त वर्ष 2016 के 119 मामलों की की तुलना में बहुत ज्यादा हैं। वित्त वर्ष 2018 मेंं दावों का मूल्य बढ़कर 55,344 करोड़ रुपये हो गया, जो वित्त वर्ष 17 मेंं 42,074 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2016 मेंं 30,071 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2019 के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। 
 
एनएचएआई ने पंचाट या न्यायालय के बाहर भी दावों का निपटान किया है। हाल ही में पश्चिम हरियाणा राजमार्ग परियोजना में उस पर पंचाल ने 750 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया था। 2007 में आवंटित परियोजना 2 साल मेंं पूरी होनी थी, लेकिन मंजूरी और भूमि अधिग्रहण न होने की वजह से इसमेंं देरी हुई। इससे परियोजना की कुल लागत बढ़ गई। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मुआवजे को लेकर 2015 में नया कानून आने की वजह से भी भूमि अधिग्रहण में देरी हुई। कुछ मामलों में जमीन की लागत की वजह से परियोजना की कुल लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई। ऐसी एक परियोजना ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे थी, जिसमें परियोजना की लागत 4,418 करोड़ रुपये थी, जबकि भूमि अधिग्रहण पर 5,900 करोड़ रुपये खर्च हुए। 
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