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संवैधानिक अदालत बन गया उच्चतम न्यायालय

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  September 22, 2019

पिछले कुछ हफ्तों ने सर्वोच्च न्यायालय को एक तरह से संवैधानिक अदालत बना दिया है। मुख्य न्यायाधीश की अगुआई में पांच न्यायाधीशों का एक पीठ अदालत संख्या 1 में अयोध्या मामले पर सुनवाई कर रहा है और जल्दी ही इस पर फैसला आने की उम्मीद है। अगले महीने एक अन्य पीठ जम्मू-कश्मीर से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। अगर इस तरह एक के बाद एक संवैधानिक रूप से संवेदनशील मामलों का निपटारा होता रहा हो तो सर्वोच्च न्यायालय की इमारत के गलियारों में पड़ी सैकड़ों अलमारियों में रखी फाइलें गायब हो जाएंगी। 

 
संवेदनशील मामलों पर सुनवाई में आई इस तेजी की वजह राजनीतिक माहौल हो सकता है लेकिन कुछ लोग यह इशारा भी करते हैं कि मुख्य न्यायाधीश नवंबर में  सेवानिवृत्त हो रहे हैं। जो भी कारण हो, भविष्य में संवैधानिक मामलों की छोटी सुनवाई ही आदर्श होनी चाहिए। अयोध्या मामले ने दिखा दिया है कि जटिल मामलों का तय समयसीमा के भीतर फैसला करना संभव है। इस मामले में आठ भाषाओं में मौजूद करीब 20,000 पृष्ठïों का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। फिर भी इस मामले का दो महीने में पटाक्षेप हो जाएगा। इसके उलट केशवानंद भारती मामले में सात महीने का समय लगा और तीन न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में हरेक में चार महीने का समय लगा। अमेरिका के उच्चतम न्यायालय में हरेक पक्ष को केवल आधे घंटे का समय मिलता है और उसके बाद लाल बत्ती जलती है।
 
मौजूदा न्यायाधीशों के पास कंप्यूटर की सुविधा है और साथ ही तेजी से फैसला सुनाने के लिए प्रशिक्षुओं से भी मदद मिलती है। आने वाले दिनों में इसमें कृत्रिम मेधा का भी सहारा लिया जाएगा। सिद्घांत रूप में ही सही, सर्वोच्च न्यायालय में एक शोध प्रकोष्ठï भी है। इसलिए संवैधानिक मामलों में उतना समय नहीं लगना चाहिए जितना पुराने समय में लगता था। जब 1958 में सर्वोच्च न्यायालय को मौजूदा इमारत में हस्तांतरित किया गया था तो एक कक्ष में केवल आठ न्यायाधीश ही बैठा करते थे। वे संवैधानिक मामलों में बिना समय गंवाए फैसला देते थे। अब न्यायाधीशों के मंजूर पदों की संख्या बढ़कर 34 पहुंच चुकी है और उनमें से 30 न्यायाधीश 14 कक्षों में बैठते हैं। यह संविधान पीठ के कुछ पुराने मामलों को निपटाने का अभूतपूर्व मौका है। 
 
हालांकि यह काम कतई आसान नहीं है। 250 से अधिक संवैधानिक मामलों को पांच न्यायाधीशों के पीठों को सौंपा गया है। इनमें से कुछ 1992 से ही अंतिम सुनवाई के लिए तैयार हैं। इनमें बेहद जटिल सवाल जुड़े हैं जैसे 1975 में आपातकाल के दिनों में हुए संवैधानिक संशोधनों के बाद संपत्ति का अधिकार और औद्योगिक विवाद अधिनियम में उद्योग की परिभाषा। ग्यारह मामले सात न्यायाधीशों के पीठों के हवाले किए गए। इनमें विधायिका को मिले विशेषाधिकार बनाम मीडिया की आजादी का मामला शामिल है। नौ न्यायाधीशों के पीठों को 132 मामलों पर फैसले देने हैं। इस तरह संविधान पीठ का हर समय काम करना जरूरी है। न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या को देखते हुए यह असंभव नहीं है। 
 
कई न्यायविदों की दलील है कि सर्वोच्च न्यायालय को केवल कानून की व्याख्या से जुड़े सवालों पर ही सुनवाई करनी चाहिए। पिछले कुछ हफ्तों में जो फैसले आए हैं उनमें से अधिकांश बंटवारे, प्रोन्नति, किराये या सामान्य अपराधों से जुड़े हैं। इनका फैसला कोई अपील अदालत भी कर सकती थी और इनका बोझ सर्वोच्च न्यायालय पर नहीं डाला जाना चाहिए। इसके लिए कुछ संवैधानिक संशोधनों की जरूरत होगी। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में यह नामुमकिन नहीं है। आखिर हमारे संविधान में 125 बार बदलाव किया जा चुका है और यह लोकतांत्रिक दुनिया में सबसे ज्यादा संशोधनों वाला संविधान है। 
 
उच्चतम न्यायालय से अलग अपील अदालत गठित करने का एक फायदा यह है कि ऐसी अदालतों को देश के विभिन्न हिस्सों में गठित किया जा सकता है। दक्षिण और पूर्वोत्तर के लोगों की शिकायत रही है कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील करना बेहद खर्चीला और थकाऊ है। कई लोग अपील करने के अपने अधिकार को केवल इसीलिए छोड़ देते हैं क्योंकि दिल्ली से इन राज्यों की दूरी बहुत ज्यादा है। कई विधि आयोग इसकी सिफारिश कर चुके हैं लेकिन न्यायाधीश लगातार इसका विरोध करते रहे हैं। उनकी दलील है कि ऐसा करने से सर्वोच्च न्यायालय का एकात्मक चरित्र खत्म हो जाएगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय से अपील पर सुनवाई का अधिकार लेने और उसे केवल संवैधानिक सवालों पर सुनवाई तक सीमित रखने से उसके कामकाज में सुधार आएगा। इससे न्यायालय का सम्मान भी बढ़ेगा। इन सुधारों में अड़ंगा लगाने के बजाय न्यायाधीशों को खुद ही इन पर पहल करनी चाहिए। इस बीच, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में एक स्थायी संविधान पीठ स्थापित करना चाहिए, तब नहीं जब राजनीतिक दबाव असहनीय हो जाता है। 
Keyword: supreme court, high court, ayodhya,,
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