बिजनेस स्टैंडर्ड - बागान पर लागत-वेतन की मार
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बागान पर लागत-वेतन की मार

टीई नरसिम्हन / चेन्नई September 22, 2019

बागान क्षेत्र भारी दबाव में है और अब यह गैर-प्रतिस्पर्धी हो चुका है। विशेष रूप से दक्षिणी भारत में फसल के जिन दामों पर यह क्षेत्र निर्भर रहता है, वह पिछले लंबे समय से उत्पादन की उच्च लागत की तुलना में काफी कम हैं। ऐसी स्थिति के बीच यह क्षेत्र काफी कमजोर हो गया है और यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मुकाबला करने में सक्षम नहीं रहा है। बागान मालिकों का कहना है कि इन फसलों से लागत भी नहीं निकल पा रही है और अन्य गतिविधियों में संलग्न होकर तत्काल आय बढ़ाने की आवश्यकता है।
 
दक्षिणी राज्यों में बागान मालिकों के एक शीर्ष संगठन यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ सदर्न इंडिया (यूपीएएसआई) के अध्यक्ष एई जोसेफ ने कहा कि बीता वर्ष बागान मालिकों के लिए काफी तनावपूर्ण था क्योंकि जलवायु परिवर्तन और बागान जिंसों के लाभदायक दाम प्राप्त करने में सक्षम नहीं रहने के कारण हम दबाव का सामना कर रहे हैं। जोसेफ ने कहा कि अन्य इलाकों के मुकाबले दक्षिण भारत में मजदूरी का स्तर बहुत ज्यादा होने की वजह से बागान उद्योग की व्यवहारिकता पर इसका गंभीर असर पड़ा है।
 
तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में क्रमश: चाय, कॉफी और रबर के दामों की तुलना में 1995 के दौरान मजदूरी में काफी इजाफा हुआ है। जहां एक ओर चाय की मजदूरी में 7.7 गुना तक वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर इसके दामों में केवल 2.5 गुना तक ही इजाफा हुआ है। कॉफी की मजदूरी में 9.7 गुना तक वृद्धि हुई, जबकि अरेबिका कॉफी की कीमतों में 1.9 गुना तक और रोबस्टा में 1.6 गुना तक का ही इजाफा हुआ है। रबर की मजदूरी में 8.2 गुना तक इजाफा हुआ है, जबकि इसके दामों में केवल 2.5 गुना वृद्धि हुई है।
 
पिछले 25 सालों के दौरान मुद्रास्फीति में 4.38 गुना तक इजाफा हुआ है। अगर औसत वार्षिक मुद्रास्फीति की दर से हिसाब लगाएं तो 1995 के बाद से चाय के दाम अब प्रति किलोग्राम 238 रुपये हो जाने चाहिए थे, जबकि इसके दाम 111 रुपये हैं। इसी तरह अरेबिका कॉफी के दाम 440 रुपये होने चाहिए थे जो 193 रुपये हैं और रोबस्टा कॉफी के दाम 134 रुपये के स्थान पर 370 रुपये होने चाहिए थे। इसी तरह रबर के दाम 223 रुपये होने चाहिए थे जो 134 रुपये हैं। डॉलर के हिसाब से दक्षिण भारत की आमदनी सबसे कम 1.45 डॉलर प्रति किलोग्राम रही है, हालांकि यहां उत्पादन में भारी गिरावट देखी गई है। पिछले साल इस क्षेत्र से 25.61 करोड़ किलोग्राम निर्यात किया गया। पूरे देश की बागान गतिविधि में लगे 67 प्रतिशत किसान और 55 प्रतिशत श्रमिक इस क्षेत्र के ही रहते हैं। यहां 11.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 13.5 लाख श्रमिक और 12.6 लाख किसान बागान फसलों की खेती कर रहे हैं जिनमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान होते हैं। वर्ष 2017-18 में बागान जिंसों का अनुमानित मूल्य 44,579 करोड़ रुपये था और निर्यात से 12,910 करोड़ रुपये की आमदनी हुई। उत्पादन मूल्य में दक्षिण का योगदान 59 प्रतिशत रहता है और निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 69 प्रतिशत होती है।
 
हालांकि जोसेफ इस बात पर जोर देते हैं कि अन्य गतिविधियों से जुड़कर आय बढ़ाने की तत्काल जरूरत है, लेकिन वह कहते हैं कि वर्तमान में बागानों को खास फसल से इतर अन्य गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं है।  वाणिज्य मंत्रालय ने राज्यों के साथ खेती के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए 20 प्रतिशत भूमि के उपयोग की अनुमति देने के लिए सहमति जताई है। नीति आयोग ने यह भी संकेत दिया है कि 1950 और 1970 के दशक के बीच विभिन्न राज्यों द्वारा पारित कृषि कानून अत्यधिक प्रतिबंधात्मक हैं।
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