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अगर आपको स्वास्थ्य बीमा महंगा लगे तो ऐसे इलाज करें

सरबजीत के सेन /  September 22, 2019

स्वास्थ्य पर खर्च तेजी से बढ़ता जा रहा है और बीमा कंपनियां भी उसकी वजह से प्रीमियम बढ़ाती आई हैं। जिन बीमा योजनाओं में कर्मचारी और उनका परिवार कंपनी की बीमा पॉलिसी के दायरे में आता है, वहां कई कंपनियों ने परिवार के सदस्यों के लिए को-पेमेंट यानी कुछ भुगतान कर्मचारी की जेब से वसूलने की व्यवस्था शुरू कर दी है। मगर स्वास्थ्य बीमा ऐसी पॉलिसी है, जिसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। सीधी बात यह है कि स्वास्थ्य बीमा आज की तारीख में जरूरत बन चुका है। इसीलिए चाहे फैमिली फ्लोटर योजना लें या स्टैंडअलोन खरीदें, पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य हो गया है।

 
समस्या तब पैदा होती है, जब कई लोग कर का फायदा पाने या किसी अन्य वजह से ज्यादा जोश में आ जाते हैं और तरह-तरह की पॉलिसी खरीद डालते हैं। उसके बाद अचानक उन्हें महसूस होता है कि प्रीमियम देना भी उनके लिए भारी हो रहा है। कभी ऐसा भी होता है कि जो बीमा योजना उन्होंने खरीदी है, वह नाकाफी साबित होती है और उन्हें उस पर नए सिरे से विचार करना पड़ता है या कभीकभार उसे हटाकर बेहतर पॉलिसी खरीदनी पड़ती है। ऐसी कुछ परिस्थितियों पर नजर डालते हैं, जिनमें आपको अपने स्वास्थ्य बीमा कवर का जायजा लेने और खुद को भविष्य में चिकित्सा पर आने वाले खर्च के बोझ से बचाने की जरूरत पड़ती है।
 
प्रीमियम में भारी वृद्घि
 
पिछले कुछ साल में एक खास आयु वर्ग के स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम में ज्यादा वृद्घि देखी गई है। आम तौर पर वरिष्ठï नागरिकों का प्रीमियम ज्यादा बढ़ता है। तो क्या प्रीमियम ज्यादा बढ़े तो बीमा कवर पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए? स्टार हेल्थ ऐंड अलायड इंश्योरेंस के संयुक्त प्रबंध निदेशक एस प्रकाश कहते हैं, 'आम तौर पर चिकित्सा खर्च में साल-दर-साल करीब 11-12 फीसदी इजाफा देखा गया है, जबकि बीमा कंपनियां औसतन तीन साल में एक बार प्रीमियम बढ़ाती हैं। अगर प्रीमियम 25 फीसदी बढ़ाया जाता है तो कोई दिक्कत नहीं है और ग्राहक आगे भी कंपनी के साथ बना रह सकता है।'
 
एको जनरल इंश्योरेंस में उत्पाद विकास प्रमुख एवं सीआरओ वीरेश गिरि का कहना है कि प्रीमियम में इजाफा ज्यादा हो तभी अपनी पॉलिसी किसी अन्य कंपनी में पोर्ट करने पर विचार करना चाहिए। उनकी राय है, 'कई स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में अलग-अलग आयु वर्गों से जुड़े जोखिम को ध्यान में रखा जाता है। हालांकि कुछ मामलों में प्रीमियम ज्यादा बढ़ जाता है। लेकिन बीमा कराने वाले व्यक्ति को पॉलिसी दूसरी कंपनी में ले जाने से पहले समझ लेना चाहिए कि उसे कितना फायदा होगा क्योंकि प्रीमियम में ऐसा इजाफा अधिक उम्र वाले ग्राहकों के लिए होता है और कंपनियां को-पेमेंट की सुविधा देने लगती हैं ताकि इजाफा जेब पर भारी नहीं पड़े।'
 
टॉप-अप घटाएगा लागत
 
यदि पॉलिसी की शर्तें आपको माफिक नहीं लग रहीं और आपके पास टॉप-अप कवर है तो आप मूल पॉलिसी खत्म करने के लिए कह सकते हैं और टॉप-अप बीमा पॉलिसी बरकरार रख सकते हैं। टॉप-अप बीमा पॉलिसी कम प्रीमियम में ही इलाज का ज्यादातर खर्च निकाल देगी। बीमा कराने वाले व्यक्ति को वही खर्च उठाना पड़ेगा, जो मूल बीमा पॉलिसी उसे देती।
 
को-पे और कमरे का किराया
 
प्रीमियम में भारी वृद्घि पर चिंता होना लाजिमी है, इसलिए को-पे (बीमाधारक को दावे की रकम में जो हिस्सा खुद चुकाना पड़ता है) की शर्तों और कमरे के किराये की सीमा देखना बहुत जरूरी हो जाता है। बीमा कंपनियां बुजुर्गों के लिए को-पे की शर्त लगाने लगी हैं ताकि दावे में कम रकम देनी पड़े। इसका असर यह हुआ है कि दावा करने पर बीमाधारक व्यक्ति को पहले से कम रकम मिलती है। जो पॉलिसी लंबे समय के लिए होती हैं, उनमें कमरे के किराये और दूसरे खर्चों की क्या सीमा तय की गई है, यह समझ लेना चाहिए। उदाहरण के लिए हो सकता है कि आपने 2 लाख रुपये राशि की बीमा पॉलिसी खरीदी है, जिसमें कमरे का किराया बीमा राशि का अधिकतम 1 फीसदी रखने का प्रावधान है। जब आपने पॉलिसी ली होगी, उस समय यह किराया पर्याप्त होगा, लेकिन अब नहीं। चूंकि अब सामान्य वार्ड में भी 2,000 रुपये प्रतिदिन जितना सस्ता कमरा मिलना मुश्किल है, इसलिए आपको या तो कमरे के किराये की सीमा बढ़वानी चाहिए या दूसरी पॉलिसी खरीदनी चाहिए।
 
गिरि समझाते हैं, 'को-पे या कमरे के किराये की सीमा तय करने के प्रावधाान प्रीमियम राशि कम करने के अच्छे तरीके हैं। लेकिन इनसे बीमाधारक को दावे के समय बेजा बोझ झेलना पड़ता है क्योंकि अगर कमरे के किराये की सीमा तय है और रोगी को ऊंची श्रेणी या अधिक किराये वाला कमरा लेना पड़ता है तो दावा करते समय बीमाधारक को अपनी जेब से ज्यादा रकम देनी पड़ेगी। इसलिए अगर बीमा कराने वाले व्यक्ति के पास अच्छा-खासा पैसा नहीं है तो को-पे प्रावधान के बगैर आने वाली बीमा पॉलिसी की खरीदनी चाहिए।'
 
गंभीर बीमारी के लिए बीमा कवर
 
आप गंभीर बीमारी के लिए (क्रिटिकल इलनेस) कवर खरीदने के बारे में सोच सकते हैं या अपने मौजूदा बीमा कवर में इजाफा कर सकते हैं। बजाज आलियांज लाइफ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी तरुण चुघ बताते हैं, 'जीवन बीमा कंपनियां क्रिटिकल इलनेस प्लान देती हैं, जिनमें किसी खास बीमारी का पता चलने पर बीमाधारक व्यक्ति को एकमुश्त रकम दे दी जाती है। इससे आपको उन्हीं खर्चों की चिंता करनी पड़ती है, जो बीमा पॉलिसी में शामिल नहीं होते हैं। बुजुर्गों को अपनी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के बीच कम से कम एक क्रिटिकल इलनेस कवर जरूर रखना चाहिए ताकि बढ़ती उम्र में अचानक इलाज की जरूरत आने पर उनकी समूची बचत न खत्म हो जाए।'
 
रोगों से जुड़ी बंदिशें ठीक नहीं
 
उम्र बढऩे पर यह गंभीर समस्या बन जाती है। सेहत से जुड़ी कोई भी तकलीफ होने पर आपको युवा रोगी के मुकाबले अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है। उस सूरत में बीमारियों पर आधारित बंदिशें आपके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। बेहहतर है कि कोई ऐसा बीमा चुन लें, जिसमें या तो किसी तरह की सीमा ही तय न हो और अगर सीमा हो तो ऊंची रकम की हो ताकि आपको दावे में अधिक रकम मिल सके।
 
चिकित्सा कोष बनाएं 
 
स्वास्थ्य बीमा का सुरक्षा चक्र तो जरूरी है, लेकिन आपको कम उम्र में ही अपने लिए चिकित्सा का अलग कोष बनाने की कोशिश भी करनी चाहिए। जब आपकी उम्र बढ़ जाएगी तो इलाज के समय यह कोष बहुत काम आएगा।
Keyword: insurance, policy, health,,
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