बिजनेस स्टैंडर्ड - एल्गोरिद्म के प्रबंधन से बनेगा सूचना युग का ढांचा
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एल्गोरिद्म के प्रबंधन से बनेगा सूचना युग का ढांचा

अजित बालकृष्णन /  September 20, 2019

सूचना युग की तरफ बढ़ते कदम एल्गोरिद्म से जुड़ी चुनौतियां भी लेकर आ रहे हैं। इससे रोजगार का स्वरूप एवं आकार भी बदलेगा। इस पहलू पर रोशनी डाल रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
अपने मोबाइल फोन पर दिन भर आने वाले संदेशों को देखते रहना, अपने फोन पर अपनी पसंद के हिसाब से फिल्में देखना, ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर जाकर अपनी पसंद के सामान खरीदने जैसे मजेदार कामों के अधिक गहरे मायने भी हैं। यह सूचना युग की दस्तक को बयां करता है। सूचना युग अब महज बेकार की बौद्धिक चर्चा भर नहीं है, हम इस युग में धीरे-धीरे घुसते जा रहे हैं। खास बात यह है कि हम सूचना युग से जुड़े पहलुओं को पूरी तरह समझे बगैर ऐसा कर रहे हैं। इसके अलावा भारत में सूचना युग की तरफ हमारा पारगमन उस समय हो रहा है जब दूसरे तमाम बदलाव भी घटित हो रहे हैं।
 
मसलन, करोड़ों भारतीय इस समय जिस बदलाव से गुजर रहे हैं वह कम प्रतिफल देने वाली पारिवारिक खेती से हटकर एक तय वेतन के साथ अधिक अनुमेय जीवन की तरफ जाता है। इस बदलाव की तरफ कदम बढ़ाने का तरीका यह है कि आप एक ट्रेन में सवार होकर मुंबई या किसी भी नजदीकी महानगर की ओर कूच कर जाइए। भले ही वहां पर आपको झुग्गी-झोपड़ी में ही क्यों न रहना पड़े और आपकी पत्नी को किसी घर में जाकर शौचालय साफ करना पड़े, लेकिन वहां पर किसी दुकान में सहायक का काम करने पर भी मिलने वाला मासिक वेतन कम होने पर भी आपको थोड़ा सुकून देगा। यह गांव में रहते हुए दिनभर अपनी गायों की देखभाल करने में लगा देने से कहीं बेहतर अहसास देता है। आखिर कोई ग्रामीण गाय इसी उम्मीद में पालता है कि उसके दूध को वह वाजिब कीमत पर बेचकर कुछ पैसे कमाएगा। शहर की झुग्गी बस्ती के अपने ठिकाने पर शराब का तीसरा गिलास पीने के साथ ही आप पर यह अहसास हावी होने लगता है कि गांव में सरपंच रहे दादा को ऐसी जिंदगी देखकर कैसा लगता? लेकिन शराब का नशा हावी होते ही यह अहसास गायब हो जाता है और उस झुग्गी की जिंदगी ही खुशी देने लगती है। 
 
इसी तरह करोड़ों भारतीय ऐसे भी हैं जो गांव में अपने पुश्तैनी दुकान पर बैठने के बजाय किसी कंपनी में सेल्समैन का काम करते हुए वित्तीय रूप से अधिक सुरक्षित रोजगार को तरजीह दे रहे हैं। यह अलग बात है कि सेल्समैन के तौर पर उन्हें घर-घर जाकर दरवाजा खटखटाना होता है और अक्सर उन्हें बुरा-भला भी सुनना पड़ता है। एक सामान बेचने के लिए उन्हें दरवाजों के चक्कर लगाने पड़ते हैं लेकिन उन्हें इस बात का सुकून होता है कि महीना खत्म होने पर उनके खाते में एक तय रकम आ जाएगी।
 
ऐसा ही एक बदलाव गांव में पूजा-पाठ करते हुए आजीविका कमाने वाले अपने पिता के उलट शहर में आकर किसी कंपनी में अकाउंटेंट बनने का भी घटित हो रहा है। शहर में उस युवक को इतना वेतन तो मिल ही जाता है कि वह कुछ रुपये अपने बूढ़े होते मां-बाप के लिए भी अपने गांव भेज सके। भारत भले ही इन तमाम बदलावों से गुजर रहा है लेकिन इसी के साथ एक और तरह का बदलाव भी दस्तक दे रहा है। मसलन, हम एक ऐसे दौर की तरफ बढ़ रहे हैं जिसमें क्लर्क एवं सेल्समैन की अधिकता वाली अर्थव्यवस्था की जगह तकनीकी निगरानी वाली मानव की भूमिका हावी होने वाली है। यह भूमिका आंकड़ों के आधार पर नतीजे निकालने वाली 'एल्गोरिद्म' को संभालने की है। यह काम भेड़ों या गायों की देखरेख करने या किराने की दुकान संभालने से बहुत अलग नहीं है। गाय और भेड़ें जिस तरह घास के मैदानों में घूमती रहती हैं उसी तरह एल्गोरिद्म भी डेटा के मैदान में विचरण करता है।
 
लेकिन आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। जिस तरह खेतों में गाय चराने के लिए आपको पशु चिकित्सा विज्ञान में डिग्री लेने की जरूरत नहीं है, उसी तरह एल्गोरिद्म के लिए भी आपको कंप्यूटर विज्ञान में डिग्री लेने की जरूरत नहीं है। आपको एल्गोरिद्म का कामकाज देखने के लिए भी कुछ उन्हीं वजहों से नौकरी मिलती है जिस वजह से गाय चराने का काम मिलता है: यानी कोई दुष्ट आपकी गाय या एल्गोरिद्म को चुरा सकता है, आपकी गाय या एल्गोरिद्म दूसरे के इलाके में जा सकता है और कुछ वर्जित चीजें ग्रहण कर सकता है। संभावित ग्राहक के सामने क्या उत्पाद परोसे जाएं, चैटबोट अवतार में उस ग्राहक से सौम्य लहजे में आकर्षक बातचीत की जाए और बिक्री एवं पैसे जुटाने का काम अंजाम देने में भी एल्गोरिद्म ही तय करेगा। कोई भी इंसानी सेल्समैन इस एल्गोरिद्म सेल्समैन की बराबरी नहीं कर सकता है। लिहाजा बिक्री से जुड़ी नौकरियां गायब हो जाएंगी लेकिन एल्गोरिद्म के संचालन के लिए भी इंसानों की जरूरत बनी रहेगी।
 
इसी तरह दिनभर दफ्तरों में एक जगह से दूसरी जगह सामान इन-आउट करने में लगे करोड़ों लोगों की नौकरी भी एक एल्गोरिद्म के हवाले हो सकती है। लेकिन इस एल्गोरिद्म को भी संभालने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन हमने पहले भी ऐसे बदलावों का बखूबी सामना किया है। आखिरकार, संस्कृत श्लोकों का पाठ करते हुए आजीविका कमाने से किसी दफ्तर में कागजी काम करने तक का सफर तय करने में आधी सदी लग गई थी। उसी तरह दाल-चावल खरीदने- बेचने वाले से म्युचुअल फंड एवं फिक्स्ड डिपॉजिट बेचने-खरीदने वाला बनने में भी आधी सदी गुजर गई। सवाल यह है कि म्युचुअल फंड या एफडी बेचने की आपकी जिस काबिलियत की तारीफ आपका बॉस भी करता है, उसकी जगह म्युचुअल फंड की खरीद-बिक्री करने वाले एल्गोरिद्म का संचालन करने वाली काबिलियत कैसे पैदा की जाए? 
 
अब भारत के स्कूली बच्चों को ऐसी तालीम देने की जरूरत है कि 12वीं क्लास पूरा करते समय वे एल्गोरिद्म की दुनिया में किसी न किसी पहलू में पारंगत हो चुके हों। या तो वे एल्गोरिद्म का निर्माण करें या खंडित एल्गोरिद्म की मरम्मत करें या काम पर एल्गोरिद्म का निरीक्षण कर सकें। अपने गृहनगर कन्नूर की अपनी सालाना यात्रा पर आने के बाद मुझे यह सवाल काफी परेशान कर रहा है। समुद्र के किनारे मैं लगभग उसी जगह पर बैठा हूं जहां पर वर्ष 1498 में वास्को डि गामा उतरा था। क्या उस समय उस जगह मौजूद रहे किसी भी शख्स ने कल्पना भी की होगी कि यह सामान्य घटना आगे चलकर पुर्तगाल, फ्रांस, डच और अंत में अंग्रेजों के यहां आने और फिर सैकड़ों वर्षों तक भारत को अपना उपनिवेश बना लेने का सबब बनेगी?
 
कन्नूर के इस पथरीले तट पर आकर टकरातीं समुद्री लहरों को देखते हुए मैं यही सोच रहा हूं कि क्या हम अब भी यह समझ पाए हैं कि हम जिस सूचना युग में प्रवेश कर रहे हैं वहां पर इंस्टैंट मेसेजिंग, ऑनलाइन शॉपिंग और ऑनलाइन मूवी हमारे लिए कौन सी चुनौतियां छिपाए हुए हैं? 
Keyword: information, mobile, tech,
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