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हरसंभव कोशिश

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 20, 2019

पुराने सारे जतन नाकाम होने के बाद गिरती आर्थिक वृद्धि दर को थामने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी ओर से सर्वस्व झोंक दिया है। गत तिमाही में आधिकारिक वृद्धि दर 5 फीसदी पर आ गई और मौजूदा तिमाही के बारे में पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसमें और कमी आएगी। ऐसे में कॉर्पोरेट कर दर को घटाकर 25 फीसदी करके वित्त मंत्री ने वह कर दिखाया है जिसका वादा उनके पूर्ववर्ती मंत्री ने पांच वर्ष पहले किया था। उससे भी पहले इस बारे में प्रत्यक्ष कर संहिता का मसौदा भी पेश किया गया था। ऐसा करके वह कॉर्पोरेट कर दर को क्षेत्र के अन्य देशों के करीब ले आई हैं। यह कदम एक और अनुशंसा सामने लाता है और वह यह कि सरकारी व्यय में इजाफे की प्रतीक्षा के स्थान पर पैसे को निजी कारोबारियों के हाथ में जाने देना चाहिए। 

 
घोषणा का चतुराईपूर्ण हिस्सा है नए निवेश के लिए 15 फीसदी की रियायती कर दर की घोषणा। यह काफी कुछ थाईलैंड की गत सप्ताह की घोषणा जैसा है। उसने चीन से थाईलैंड स्थानांतरित होने वाली कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट कर दर में 50 फीसदी कटौती करने की घोषणा की। वियतनाम भी लक्षित कंपनियों के लिए कम कर दर की पेशकश करता है। स्पष्ट है कि यह रियायती व्यवस्था यह देखने के लिए की गई है कि भारत को अमेरिका और चीन की कारोबारी जंग से लाभ होता है या नहीं। इसके साथ ही ठहरे हुए मेक इन इंडिया अभियान को गति देना भी इसका उद्देश्य है। 
 
क्या यह कारगर साबित होगा? इस पर चर्चा जारी है और इस बात पर आम सहमति है कि अर्थव्यवस्था मांग की कमी से दो चार है। ऐसे में कर पश्चात कॉर्पोरेट मुनाफे में बढ़ोतरी इस मसले को सतही ढंग से ही छूती है। मांग में पर्याप्त बढ़ोतरी के लिए कंपनियों को भारी भरकम लाभांश भुगतान करने की आवश्यकता है। उन्हें ऐसी नई क्षमताओं में भी निवेश करना होगा जो वे अन्यथा नहीं करतीं। इससे पूंजीगत वस्तुओं की मांग बढ़ेगी जबकि अभी इसमें कमी आई है। कमजोर ग्रामीण मांग की समस्या इससे हल नहीं होती। न ही इस नई घोषणा से उन कंपनियों को मदद मिलती है जो मांग में कमी या निर्यात में गिरावट के कारण घाटे में हैं। केवल कर कटौती की घोषणा नहीं की गई है। ऋण मेले की पुरानी गलत आदत की भी वापसी हुई है। वहीं सरकारी बैंकों के लिए भी नया निर्देश है कि छोटे या मझोले उपक्रमों के किसी भी ऋण को वित्त वर्ष की समाप्ति तक फंसा कर्ज न घोषित किया जाए।
 
राजकोषीय संयम को पहले ही तिलांजलि दी जा चुकी है। कर राजस्व पहले ही लक्ष्य से पीछे चल रहा है। घाटे के अघोषित हिस्से (सरकारी कंपनियों के बहीखाते, सरकार के बकाया बिल आदि) के साथ इस वर्ष का घाटा एक दशक के उच्चतम स्तर पर हो सकता है। इससे पहले वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान वर्ष 2009-10 में यह 6.4 फीसदी रहा था। ध्यान रहे कि वित्त मंत्री के संवाददाता सम्मेलन से एक दिन पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर ने घोषणा की थी कि राजकोषीय प्रोत्साहन की गुंजाइश बहुत कम है। पूर्ववर्ती गवर्नर भी ऐसा कह चुके हैं। ऐसा प्रोत्साहन जो सरकार के बड़ी उधारी के कार्यक्रम में तब्दील हो सकता है, उसकी घोषणा कर वित्त मंत्री ने ऋण बाजार का गणित बदल दिया है और आरबीआई द्वारा अगले महीने अनुमानित नीतिगत दर कटौती को भी दिक्कतदेह बना दिया है। इसके अलावा फिलहाल मुद्रा बाजार की जो स्थिति है उसमें दरों की कटौती पूरी तरह परिलक्षित भी नहीं होगी। ऐसे में शेयर बाजार तो जश्न मना रहा है लेकिन ऋण बाजार के लिए समस्या खड़ी हो गई है। अर्थव्यवस्था में हर चीज की कीमत होती है। 
 
कर दरों में कटौती इस तरह की गई है कि यह राज्यों को गहरे तक प्रभावित करती है। इसलिए क्योंकि यह कटौती बुनियादी कर में की गई है जिसका राजस्व राज्यों के साथ साझा किया जाता है। यदि कटौती अधिभार में होती तो पूरा बोझ केंद्र पर पड़ता। सहकारी संघवाद का वादा करने वाली केंद्र सरकार के समक्ष राज्यों की एक और शिकायत होगी। इससे पहले केंद्र ने वित्त आयोग की शर्तों को नए तरीके से तैयार किया था जिसके तहत केंद्र के राजस्व का एक हिस्सा राज्यों के साथ साझा करने के पहले ही खाली होना है। इतना ही नहीं आक्रामक रुख अपनाते हुए उसने प्रस्ताव रखा है कि आयोग केंद्रीय कर में राज्यों की हिस्सेदारी को मौजूदा स्तर से कम किया जाए। इससे पहले किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया इसलिए केंद्र और राज्यों के राजकोषीय संबंध में भी तनाव है। बहरहाल, कंपनियां और निवेशक खुश हैं तो दिक्कत ही क्या है? 
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