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ऐपल कर रही ब्रांड विस्तार जियो से तुलना है बेकार

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  September 19, 2019

ऐपल ने जैसे ही अपनी अल्ट्रा-प्रीमियम (उच्चवर्गीय उत्पाद) स्थिति को छोड़कर कीमतों की जंग में शामिल होने की शुरुआत की, भारतीय पत्रकारों  ने इसे 'जियो जैसी कोशिश' करार देने में गुरेज नहीं किया। ऐसी टिप्पणियां खबरों की सुर्खी बनने के लिहाज से भले ही ठीक हों लेकिन सुविचारित नहीं हैं। अंतर बहुत छोटा लेकिन महत्त्वपूर्ण है। जियो के साथ रिलायंस ने कीमतों की ऐसी जंग शुरू की जहां अपने प्रतिस्पर्धियों से मुकाबले के लिए वह लोगों को लगभग नि:शुल्क सेवाएं दे रही थी। ऐपल के साथ यह बात नहीं है बल्कि कंपनी ने अपनी बुनियादी रूप से अत्यंत महंगे उत्पादों की नीति में बदलाव किया है। इसमें विभिन्न बाजार क्षेत्रों मसलन दूरसंचार, उपभोक्ता हार्डवेयर, इंटरनेट प्रसार आदि में सावधानी से लक्षित प्रतिस्पर्धियों पर लगातार हमले शामिल हैं। 

 
अपने ब्रांड को तमाम मूल्य वर्ग में विस्तारित कर ऐपल ने एक बड़ी छलांग लगाई है लेकिन यह काफी हद तक काल्पनिक है। यह बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए किसी सेवा को मौजूदा सेवा प्रदाताओं से सस्ती दर पर देने का मामला नहीं है। यह उससे अलग है। बल्कि ऐपल के नए साहसी कदम ने भारतीय कंपनियों में नई नीतिगत सोच की लंबे समय से चली आ रही कमी को एक बार फिर उजागर किया है। मौजूदा आर्थिक मंदी शायद इस कमी का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। भारतीय कारोबारी जगत इस मंदी से पूरी तरह लडख़ड़ाता नजर आ रहा है।
 
मंदी, खासतौर पर मांग में मंदी कंपनियों के प्रबंधन को दिक्कत का सामना करना पड़ता है। वैश्विक स्तर पर प्रबंधन के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि ऐसी तमाम कंपनियां हैं जिन्होंने बाजार की चुनौतियों का सामना करने के लिए समझदारी भरे विरोधाभास की नीति अपनाई। फोक्सवैगन जैसी छोटी सी कंपनी के अमेरिका के वाहन बाजार में का उदाहरण हमारे सामने है। किराये पर कार देने वाली अमेरिकी कंपनी एविस का वह मशहूर विज्ञापन हमारे सामने है जिसमें वह कहती है कि दूसरे नंबर पर होने के कारण कंपनी कड़ी मेहनत करती है। इसी तरह फर्नीचर निर्माता कंपनी आइकिया का मध्यम वर्ग के लिए सस्ते फर्नीचर बनाना। 
 
भारत में भी नीतिगत सोच के स्तर पर नवाचार देखने को मिला है लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह काम विदेशी मूल की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ही किया है। उदाहरण के लिए 2000 के दशक में जब प्रतिस्पर्धा बढऩे लगी तो सुजूकी के दबदबे वाली मारुति ने खुद को सस्ती छोटी कार कंपनी से ऐसी बड़ी वाहन कंपनी में बदला जिसके पास हर तरह के ग्राहक के लिए कार थी। कंपनी के तत्कालीन प्रबंध निदेशक जगदीश खट्टर ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा था कि ग्राहक मूल्य शृंखला में आगे बढ़ रहे हैं। मिसाल के तौर पर जेन वाले ग्राहक बलेनो अपना रहे हैं। कोरियाई कार निर्माता कंपनी हुंडई ने छोटी कार के बाजार को अपने मॉडल सैंट्रो से पूरी तरह बदल दिया। यह कार इतनी लोकप्रिय थी कि गत वर्ष जब इसे दोबारा बाजार में पेश किया गया तो यह हाथोहाथ बिकी और ऑर्डर लेने बंद करने पड़े। 
 
ऐसे कई कदम बाजार को उन्नत बनाने के उद्देश्य से भी उठाए गए। वाणिज्यिक वाहनों और बस बाजार के एकाधिकार को वोल्वो ने चुनौती दी। कंपनी ने जल्दी ही प्रीमियम बस सेवा के लिए अपना नाम कर लिया। सन 1990 के दशक के आरंभ में प्रॉक्टर ऐंड गैंबल ने महंगे और बढिय़ा किस्म के वॉशिंग पाउडर और अन्य उत्पाद बाजार में उतारे। हिंदुस्तान लीवर (तत्कालीन नाम) और जॉनसन ऐंड जॉनसन जैसे प्रतिस्पर्धियों को जवाबी प्रतिक्रिया देने में जूझना पड़ रहा था। दूसरी ओर, भारतीय कंपनियों के तरकश में कीमतों के मोर्चे पर मुकाबला करना ही इकलौता तीर रहा है। इसमें समस्या यह है कि प्रतिस्पर्धी बहुत आसानी से आपका पीछा कर लेते हैं। करसनभाई पटेल के निरमा डिटर्जेंट पाउडर ने हिंदुस्तान लीवर को परेशानी में डाल दिया था लेकिन बाद में नकदी की मजबूत स्थिति का लाभ उठाया और वैसा ही उत्पाद पेश कर दिया। निरमा के ग्राहक बने रहे लेकिन वह दोबारा हिंदुस्तान लीवर को कड़ी चुनौती नहीं दे पाया। दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तु कंपनी केविन केयर ने शैंपू के एक रुपये के सैशे बाजार में उतारे। इससे कंपनी को यकीनन फायदा हुआ। उसने ऐसा करके पैसे कमाए लेकिन जल्दी ही प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने उसकी नकल कर ली।
 
भारतीयों द्वारा प्रवर्तित कंपनियों में टाटा मोटर्स एक अपवाद रही है। उसने सन 2000 के मध्य में एस नामक मिनी ट्रक लॉन्च करते वक्त नीतिगत सोच के क्षेत्र में मजबूती दिखाई। कंपनी ने इस मिनी ट्रक को छोटा हाथी नाम दिया था और इसने माल ढुलाई के क्षेत्र में एक अहम कमी को दूर किया। परंतु इसी समूह की अब बंद हो चुकी टाटा टेलीसर्विसेज ने प्रति सेकंड बिलिंग की शुरुआत कर की कीमतों की जंग को ही जन्म दिया, जिसकी कीमत खुद कंपनी को चुकानी पड़ी। अगर जियो की विस्तारित 'स्वागत पेशकश' जिसे नियामकीय और आक्रामक कीमत से जुड़े परीक्षणों में उचित पाया गया, उसने अगर बाजार में उथलपुथल मचाई तो ऐसा केवल इसलिए हुआ क्योंकि अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियां जहां आर्थिक दबाव में थीं, वहीं जियो की मूल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास इतनी नकदी मौजूद थी कि वह आसानी से जियो का विस्तार करती रह सकती।
 
वैश्विक स्तर पर देखें तो कम कीमत पर माल बेचने के मामले में चीन को बढ़त हासिल है। इससे पहले जापान एक ऐसा देश था जो विकसित देशों के बाजार में अच्छी प्रतिस्पर्धा करता था। वैश्विक प्रबंधन परिदृश्य में भारत का योगदान केवल 'जुगाड़' का है। शायद इसका संबंध भारत के पारिवारिक प्रभुत्व वाले कारोबारी माहौल से हो। उदारीकरण के तीन दशक बाद भी देश के कारोबारियों को अभी नीतिगत तरीके से सोचने की जरूरत है। 
Keyword: apple, smartphone, mobile, jio,,
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