बिजनेस स्टैंडर्ड - बाह्य मानक : सही कदम गलत उपाय
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बाह्य मानक : सही कदम गलत उपाय

देवाशिष बसु /  September 19, 2019

ब्याज दरों के पारेषण को लेकर आरबीआई ने बाहरी मानक की जो व्यवस्था अब की है, उसे काफी पहले अपना लिया जाना था। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
जब नीति निर्माता गलत वजह से सही कदम उठाते हैं तो क्या होता है? खुशकिस्मती से इसका नतीजा बेहतर आ सकता है लेकिन ज्यादा आशंका यही रहती है कि वे कुछ अनचाहे और गलत परिणामों की जमीन तैयार कर रहे हों। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 4 सितंबर को जारी परिपत्र का हश्र भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। इस वर्ष 1 अक्टूबर से बैंकों को अपने ऋण की ब्याज दर को बाहरी मानक से जोडऩा होगा। अब वे अपने आंतरिक अपारदर्शी मानक का प्रयोग नहीं कर पाएंगे। यह उपभोक्ताओं के लिए अच्छी खबर है। इसलिए नहीं कि उनके ऋण सस्ते हो जाएंगे बल्कि अब बैंकों को अपने पुराने कर्जदारों को भी नई व्यवस्था अपनाने का अवसर देना होगा और नए तथा पुराने कर्जदार अब समान हो जाएंगे।
 
बीते 20 वर्षों तक आरबीआई ने बैंकों को कर्जदारों के साथ मनमाना, अपारदर्शी और भेदभावकारी व्यवहार करते रहने की इजाजत दी। बैंकों को नए कर्जदारों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती लेकिन वे उन्हें पुराने कर्जदारों की तुलना में सस्ती ब्याज दर पर कर्ज देते हैं। जबकि पुराने कर्जदार लंबे समय से महीना दर महीना अपना ऋण चुकाते रहते हैं और बैंकों को उनके अच्छे व्यवहार के बारे में भी काफी कुछ पता होता है। नए और पुराने दोनों कर्जदारों के कर्ज की ब्याज दर को बाहरी मानक से जोडऩे के साथ ही इस भेदभाव का अंतर हो जाएगा। परंतु इस बारे में कोई बात ही नहीं कर रहा है। इसका कारण यह है कि आरबीआई के इस कदम का उद्देश्य भेदभाव समाप्त करना और स्पष्टता तथा पारदर्शिता लाना नहीं है। उसकी कोशिश केवल दरों के पारेषण में सुधार लाने की है। यह सरकार का एक अहम राजनीतिक लक्ष्य है। आर्थिक वृद्धि लाने के सबसे लोकप्रिय तरीकों में एक ब्याज दरों में कटौती करना भी है। हर वित्त मंत्री इसकी मांग करता है। लचीली दर व्यवस्था में जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बैंक तत्काल दरों में इजाफा कर देते हैं लेकिन जब ब्याज दरों में कमी आती है तो बैंक इसका लाभ उपभोक्ताओं को देने के इच्छुक नहीं नजर आते। यही कारण है कि आरबीआई ने अपने परिपत्र के माध्यम से इस समस्या को हल करना चाहा और वह भी केंद्र सरकार के दबाव में। काफी संभव है कि ऐसा करते हुए वह कुछ अन्य किस्म की दिक्कत खड़ी कर दे।
 
पारेषण का संक्षिप्त इतिहास
 
आरबीआई ने करीब 20 वर्ष तक इस अनुचित व्यवस्था का समर्थन किया। सन 1994 में हमारे यहां प्रधान ऋण दर (पीएलआर) की व्यवस्था आ गई थी और अप्रैल 2003 में मानक पीएलआर भी आ गई। ये दोनों दरें पर्याप्त मौद्रिक पारेषण सुनिश्चित कर पाने में नाकाम रहीं। आरबीआई ने पाया कि इससे इन दोनों मानकों की शुरुआत का उद्देेश्य ही नाकाम हो गया। यहां तक कि जब उसे पता था कि बैंक आंतरिक मानकों के साथ मन मुताबिक छेड़छाड़ कर रहे हैं तब भी सात वर्ष बाद आरबीआई ने दोबारा आधे-अधूरे मन से आधार दर के रूप में एक और आंतरिक मानक प्रस्तुत करने का प्रयास किया। जाहिर है यह भी पारेषण सुनिश्चित कर पाने में नाकाम रहा।
 
वर्ष 2016 में एक और प्रयोग किया गया। फंड आधारित ब्याज दर की न्यूनतम लागत (एमसीएलआर) के रूप में। प्रयास यह था कि दरों में बदलाव का कर्ज लेने वालों तक सहज पारेषण हो क्योंकि जमा की न्यूनतम लागत में आरबीआई की रीपो दर के साथ उतार-चढ़ाव आता। परंतु एमसीएलआर भी एक आंतरिक मानक थी और इसलिए पारेषण नहीं हुआ। मनीलाइफ फाउंडेशन ने गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर यह भेदभाव समाप्त करने की गुजारिश की। अदालत ने आरबीआई को इस पर अपना जवाब देने को कहा। गवर्नर ऊर्जित पटेल के नेतृत्व में आरबीआई ने आखिरकार 20 वर्ष बाद 5 दिसंबर को बाहरी मानक अपनाने की बात कही। इसके तत्काल बाद पटेल पद छोड़ गए और नए गवर्नर ने इस विचार को रद्द कर दिया और बैंकों में कामकाज पहले की तरह चलता रहा।
 
यह बैंकों का दुर्र्भाग्य ही था कि आर्थिक वृद्धि औंधे मुंह गिरी और सरकार व्यग्र होकर हालात सुधारने के तरीके तलाश करने लगी। मंदी के दौर में जब राजनेता और कारोबारी एक दूसरे की आंख से आंख मिलाकर नहीं देखते हैं तब वे एक बात पर अवश्य सहमत हैं कि ब्याज दरों में कटौती करने से वृद्धि को गति मिलेगी। अब मुद्रास्फीति की दर कम है और आरबीआई दरों में कटौती कर रहा है लेकिन अब भी पारेषण नहीं हो रहा है। इसकी वजह एकदम वही है जिसे आरबीआई दो दशक तक लागू करने से बचता रहा: बाहरी मानक को लागू करना। पिछले तमाम वित्त मंत्री जहां बैंकों के प्रतिरोध के आगे कुछ नहीं कर सके, वहीं इस सरकार ने एक कड़ा फैसला लिया है। उसने बैंकों को आदेश दिया है कि वे बाहरी मानक का पालन करें।
 
अनचाहे परिणाम
 
यह कदम उपभोक्ताओं के लिए तो बेहतर है लेकिन क्या इससे अन्य तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं? पहली बात, क्या रीपो दर उचित मानक  है? कई अन्य लचीली दरों वाले ऋण मसलन आवास ऋण आदि 15 वर्ष के लिए होते हैं। इन ऋणों को दीर्घावधि की बाह्य मानक दर से जोड़ा जाना चाहिए। आरबीआई को पहले इसका विकास करना चाहिए था। बैंकों की दलील है कि आरबीआई को उन्हें इस बात के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए कि दीर्घावधि के ऋण को रीपो दर जैसे उच्च अस्थिरता वाले अल्पावधि के मानक से जोड़ा जाए। बैंकों को हर तिमाही दरों में बदलाव की इजाजत दी गई। दूसरा, बैंक यह दावा करते रहे हैं कि चूंकि जवाबदेही में लचीलापन नहीं है इसलिए वे पारेषण नहीं कर सकते। अपने बचाव के लिए बैंकों ने तत्काल बचत खाता दर को बाहरी मानक से जोडऩा शुरू कर दिया। इससे भ्रम की स्थिति पैदा होगी और तमाम बचत करने वाले बैंकों से दूर हो जाएंगे। तीसरा गड़बड़ पहलू यह है कि बाहरी मानक केवल बैंकों पर लागू होते हैं, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर नहीं। परंतु उनकी भी बहुत बड़ी बाजार हिस्सेदारी है और वे हर हाल में बैंकों से अधिक ब्याज दर लेते हैं।
 
ऐसे में सही कदम तो यही होता कि इन तमाम मुद्दों को व्यवस्थित ढंग से सुलझाया जाता। आरबीआई के पास इस समस्या पर विचार करने के लिए एक दशक से अधिक वक्त था। हर बार दरों में कटौती के बाद मंत्रालय की ओर से पारेषण की मांग उठी लेकिन समुचित हल के बारे में कोई बात नहीं हुई। इस बीच बैंक भी मनमानी दर वसूलते रहे। ऐसे में इस बार जब सरकार ने कमजोर पारेषण पर सवाल उठाया तो आरबीआई ने प्रतिरोध नहीं किया। बैंक और आरबीआई दोनों को अब कहीं अधिक गंभीर परिणाम का सामना करना होगा। 
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