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नीलामी में वैश्विक कंपनियां आमंत्रित!

रॉयटर्स / नई दिल्ली September 18, 2019

भारत ने पहली बार कोयला खनन ब्लॉकों के लिए 2019 के आखिर से पहले वैश्विक कंपनियों से बोली आमंत्रित करने की योजना बनाई है। मामले से अवगत एक सूत्र ने यह जानकारी दी है। सरकार के इस कदम से कोयला क्षेत्र में कोल इंडिया लिमिटेड की एकाधिकार जैसी स्थिति समाप्त हो जाएगी क्योंकि देश आयात पर निर्भरता घटाना चाहता है। भारत द्वारा आयात की जाने वाली शीर्ष पांच जिंसों में कोयला भी शामिल है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ईंधन उपभोक्ताओं में से एक है। 19 महीने पहले उदारीकरण नीति लागू करने के बावजूद इस उद्योग को प्रतिस्पर्धा के लिए खोलने में नाकाम रहने के बाद कोयला आयात में उछाल आ रही है। 
 
कोयला ब्लॉक नीलामी का लक्ष्य ग्लेनकोर पीएलसी, बीएचपी ग्रुप, एंग्लो अमेरिकन पीएलसी और पीबॉडी एनर्जी कॉर्पोरेशन जैसी वैश्विक खनिकों को आकर्षित करना है। सूत्रों ने कहा कि सरकार का लक्ष्य बोली जीतने वाली कंपनियों को 2020 के आरंभ से सुनिश्चित भंडार वाले कोयला ब्लॉक का विकास शुरू करने की अनुमति देना है। फिलहाल यह स्पष्टï नहीं है कि सरकार कब से कोयला ब्लॉकों के उत्पादन की उम्मीद कर रही है। कोयला मंत्रालय ने इस पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।
 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 जून को समाप्त तिमाही में ताप कोयले का कुल आयात पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले करीब एक-तिहाई बढ़कर 5.623 करोड़ टन हो चुका है। ताप कोयले का इस्तेमाल मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में किया जाता है। फिलहाल कोल इंडिया और एक छोटी सरकारी कंपनी को ही देश में कोयला खनन और बिक्री की अनुमति है। सरकार बिजली, इस्पात, सीमेंट और एल्युमीनियम क्षेत्र की कुछ कंपनियों को भी निजी इस्तेमाल के लिए कोयला खनन की अनुमति देती है। 
 
भारत की वार्षिक कोयला मांग मार्च 2019 में समाप्त वर्ष में करीब एक अरब टन बढ़ चुकी है और ईंधन की स्थानीय खपत बढ़ रही है। इसके साथ ही सीमेंट क्षेत्र के विस्तार से खनिकों के लिए भी अवसर पैदा हो रहे हैं। लेकिन ऐसे समय में जब भारत की वृहत आर्थिक वृद्घि धीमी पड़ रही है और वैश्विक निवेशक कोयले से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि सबसे खराब जीवाश्म ईंधनों में शुमार कोयले से उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान होता है, ऐसे में विदेशी कंपनियों की दिलचस्पी हासिल करना चुनौती बन सकता है। उदाहरण के लिए लंदन में सूचीबद्घ रियो टिंटो पहले ही अपनी सभी ताप कोयला खदानों को बेच चुकी है और ग्लेनकोर तथा बीएचपी जैसी खनिकों ने कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग को लेकर शेयरधारकों की चिंताओं को देखते हुए वे भी अपने काम में कमी लाने की योजना बना रही हैं।
 
हालांकि भारत के कोयला क्षेत्र के निजीकरण से अदाणी इंटरप्राइजेज और वेदांत लिमिटेड जैसी स्थानीय खनिक कंपनियों के समूहों के लिए भी मौका होगा जिससे बढ़ते आयात पर रोक लग सकेगी। एक स्वतंत्र वैश्विक धातु और खनन इक्विटी परामर्शदाता सत्यदीप जैन ने कहा, 'भारतीय या एशियाई कंपनियों की ओर से दिखाई जाने वाली रुचि मुख्य रूप से पेश किए गए ब्लॉकों की प्रकृति पर निर्भर करेगी। साथ ही इस पर प्रशासनिक रुकावटों को कम करने के सरकारी प्रयासों और बुनियादी ढांचे में सुधार का भी असर होगा।'
 
कोकिंग कोयले के कम स्थानीय उत्पादन के कारण देश के इस्पात निर्माता अपनी जरूरत के कोयला का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, जबकि इस बात की संभावना है कि तटीय बिजली उत्पादक आगे भी आयात पर ही निर्भर रहेंगे। सूत्रों ने जानकारी दी कि सरकार तटीय केंद्रों और इस्पात निर्माताओं द्वारा किए जाने वाले आयात को छोड़कर पूरे कोयला आयात में कटौती करना चाहती है। उन्होंने कहा कि देश अगले पांच वर्षों में आयात में कम से कम 10 करोड़ टन तक की कमी लाना चाहता है।
 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च, 2019 को समाप्त वर्ष में भारत का कोयला आयात 13 फीसदी उछलकर 23.52 करोड़ टन हो गया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार देश के व्यापार घाटे में कमी लाने के लिए आयात घटाने के लिए कदम उठा रही है। मोदी सरकार कोयला क्षेत्र के उदारीकरण के लिए योजना पर जोर-शोर से काम कर रही है और उनके मंत्रिमंडल ने हाल ही में कोयला खनन में 100 फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति वाला प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि इस क्षेत्र के उदारीकरण के प्रस्तावों को कोल इंडिया के कर्मचारी संघों के विरोध के कारण दबाकर रखा गया है जिन्होंने सरकार के इस कदम के खिलाफ अगले हफ्ते हड़ताल का नोटिस दिया है। सूत्रों ने कहा कि कोयला क्षेत्र के निजीकरण की खातिर कर्मचारी संघों को समझाने के लिए सरकार को सार्थक चर्चा होने की उम्मीद है।
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