बिजनेस स्टैंडर्ड - क्यों सीमित रहेगा पानी की खपत घटाने के उपायों का असर
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क्यों सीमित रहेगा पानी की खपत घटाने के उपायों का असर

रुचिका चित्रवंशी और संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली September 17, 2019

खेती में पानी को बचाने के लिए राज्यों द्वारा किए गए दो उपायों का मिलाजुला परिणाम रहा है जिससे जल संरक्षण की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की नीतियों की खामियां उजागर होती हैं। इनमें मक्के की खेती को प्रोत्साहन और उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देना शामिल है। इनका मकसद किसानों को गेहूं, धान और गन्ने जैसी फसलों के बजाय कम पानी वाली फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करना है। हाल में जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'देश में पानी की खपत का करीब 89 फीसदी हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है। हमें इसे दुरुस्त करना होगा।' इसमें सबसे बड़ी चुनौती किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनाना और उन्हें उपभोग पैटर्न के अनुरूप ढालना है। 
 
उदाहरण के लिए गेहूं और धान की फसल को वरीयता देना चार दशक पुरानी मूल्य समर्थन नीति का परिणाम है जो हरित क्रांति का हिस्सा थी।  पंजाब और हरियाणा जैसे गैर परंपरागत इलाकों में भी अत्यधिक पानी के इस्तेमाल वाली धान की खेती को बढ़ावा दिया गया। उत्तर भारत में हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का देश के कुल धान उत्पादन में करीब 26 फीसदी योगदान है। देश में धान का कुल उत्पादन करीब 10 करोड़ टन है। इसी तरह गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य साल दर साल बढ़ता है जिसके कारण महाराष्ष्ट्र में भी गैर परंपरागत और पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों में गन्ने ही खेती हो रही है। 
 
पंजाब और हरियाणा में मक्के की खेती का अनुभव नीतियों और बाजार के बीच संबंधों के अभाव का अच्छा उदाहरण है। मौजूदा खरीफ सत्र के आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा में 49,000 हेक्टेयर से अधिक में मक्के की खेती हो रही है। यह गैर-बासमती धान के लिए सुरक्षित जमीन का आधा से अधिक हिस्सा है। हरियाणा में इस बार मक्के का रकबा पांच साल में सबसे अधिक है।  पंजाब में भी मक्के और कपास के रकबे में बढ़ोतरी हुई है जबकि गैर-बासमती धान की खेती का रकबा घटा है। राज्य में मक्के का रकबा 100,000 हेक्टेयर से बढ़कर 160,000 हेक्टेयर और कपास का रकबा 268,000 से बढ़कर करीब 400,000 हेक्टेयर पहुंच गया है। हरियाणा में मक्के की वरीयता देने के पीछे सबसे बड़ी वजह भारी प्रोत्साहन है। हाल में मनोहर लाल खट्टर सरकार ने किसानों को 2,000 रुपये प्रति एकड़ सब्सिडी और मक्के के बीजों के मुफ्त वितरण की पेशकश की। साथ ही वह पानी की अत्यधिक खपत वाली फसलों से दूसरी फसलों का रुख करने वाले किसानों की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमे की किस्त वहन करने पर भी सहमत हो गई है। साथ ही राज्य सरकार ने किसानों को आश्वासन दिया है कि वह उनकी सारी उपज खरीदेगी। 
 
पंजाब में कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन देने के लिए इस साल के अंत में व्यापक नीति की घोषणा होने की संभावना है।  समस्या यह है कि मक्का भारतीयों के दैनिक उपभोग का भोजन नहीं है। किसान ज्यादा मक्का उगा सकता है और राज्य की संस्थाएं उनकी सारी फसल खरीद भी सकती हैं लेकिन यह खपत का हिस्सा नहीं है। एक विशेषज्ञ ने पूछा, 'एक देश कितना स्वीटकॉर्न खा सकता है।' इसमें कोई दोराय नहीं है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिये सस्ते में गेहूं, चावल और चीनी की उपलब्धता ने इन चीजों को भारतीय के दैनिक उपभोग का हिस्सा बना लिया। जब तक ये भारतीयों की दैनिक उपभोग का हिस्सा बने रहेंगे तब तक कृषि में जल संकट की समस्या दूर नहीं होगी। 
 
वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज ऐंड एक्टिविटीज नेटवर्क के निदेशक एम वी रामचंद्रुडू ने कहा, 'सरकार को लोगों के बीच वैकल्पिक फसलों की खपत को बढ़ावा देना होगा। पीडीएस के जरिये उसने सफलतापूर्वक लोगों की खाने की आदतों को बदला है। अब हमें विपणन रणनीति की जरूरत है। पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना होगा।' वैकल्पिक फसलों के लिए बाजार बनाने की जरूरत ड्रिप सिंचाई परियोजनाओं पर भी लागू होती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ श्रेणियों में किसानों के लिए ड्रिप सिंचाई में काम आने वाले उपकरणों पर सब्सिडी 90 फीसदी तक बढ़ा दी है और महाराष्ट्र ने गन्ना किसानों के लिए ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य बना दिया है। 
 
किसानों का सुझाव है कि अगर उन्हें गन्ने के बजाय दालें उगानी हैं तो इसके लिए सरकार को उन्हें भारी प्रोत्साहन देना होगा। साथ ही ड्रिप सिंचाई के लिए बिजली की नियमित आपूर्ति की जरूरत है। किसान नेता और महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकरी संघटना के प्रमुख राजू शेट्टी ने कहा, 'ड्रिप सिंचाई के लिए बिजली की आपूर्ति नहीं है।' शेट्टी के लिए यह भावनात्मक मुद्दा है और उन्होंने कहा कि अगर ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य बनाया गया तो हम चुप नहीं बैठेंगे। तो फिर इसका समाधान क्या है? रामचंद्रुडू ने कहा कि इसके लिए दस सूत्री समाधान है और इनमें से सभी पानी से नहीं जुड़े हैं। नाबार्ड और इक्रियर द्वारा पिछले साल कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक देश में कुल 19.8 करोड़ हेक्टेयर के फसलों के रकबे में धान, गेहूं और गन्ना का रकबा 8.5 करोड़ हेक्टेयर से अधिक है। देश में सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का करीब 80 फीसदी इन फसलों में ही इस्तेमाल होता है। 
 
पानी के सतत इस्तेमाल की दिशा में काम करने वाली संस्था अघ्र्यम के प्रोजेक्ट मैनेजर हर्षवद्र्घन धवन ने कहा, 'फसलों में पानी की मांग का अध्ययन होना चाहिए। क्षेत्रवार आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण उन क्षेत्रों की पहचान नहीं की गई है जहां पानी का अत्यधिक इस्तेमाल हुआ है।' किसानों का मानना है कि मोदी सरकार की दूसरी फसलों का रुख करने की नीति में कई जोखिम हैं। अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव वी एम सिंह ने कहा, 'किसानों को इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा। अगर आपके पास कोई योजना है तो यह बात समझ में आती है। लेकिन सोचने वाली बात है कि अगर हर कोई मक्का उगाना शुरू कर देगा तो इसकी कीमत कितनी गिर जाएगी। उसके बाद क्या होगा।'
 
इसमें सबसे पहले किसानों के साथ काम किया जाना चाहिए, न कि ऊपर से फैसले उन पर थोपे जाने चाहिए। जल संसाधनों का बजट बनाने और टिकाऊ कृषि के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए जमीनी स्तर पर लोगों को इससे जोड़ा जाना चाहिए। धवन ने कहा, 'जमीनी स्तर पर लोगों को समझना चाहिए कि इसका क्या मतलब है। उसे इसमें हिस्सेदारी करनी चाहिए। व्यवस्थाओं में यह बदलाव पीढ़ीगत होना चाहिए।' ड्रिप सिंचाई पर नजर डालें तो माना जा रहा है कि गुजरात जैसे कम पानी वाले क्षेत्रों में इसकी खासी अहमियत है। लेकिन कुछ सिंचित क्षेत्र में इसकी हिस्सेदारी महज चार फीसदी है। सिंह ने कहा, 'आपको इसके बारे में किसानों को जागरूक बनाना होगा। वे नहीं जानते हैं कि ड्रिप सिंचाई क्या होती है और यह कैसे काम करती है।'
 
पंजाब किसान आयोग की एक रिपोर्ट में हर किसान के लिए धान का रकबा 4 हेक्टेयर तक सीमित करने और बड़े किसानों को बिजली सब्सिडी में कटौती की सिफारिश की गई है ताकि वे दूसरी फसलों का रुख करें। हालांकि सरकार ने अभी तक इस रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है लेकिन किसान इसे लेकर ङ्क्षचतित हैं। रामचंद्रुडू ने कहा, 'किसानों की एक पूरी पीढ़ी को यह पता भी नहीं है कि 1960 के दशक में पीडीएस के शुरू होने से पहले दूसरी फसलें कैसे उगाई जाती थीं।'
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, IMD, irrigation, water,,
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