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प्रधान सचिव व प्रधान सलाहकार के साथ पीएमओ में नई व्यवस्था

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 17, 2019

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के कार्यालय के गठन को अभी 50 साल नहीं हुए हैं। इसका गठन सन 1971 में किया गया था जब इंदिरा गांधी ने परमेश्वर नारायण हक्सर को अपना प्रधान सचिव बनाया था। हक्सर दिसंबर 1971 से फरवरी 1973 तक इस पद पर रहे। उनके बाद 11 और लोग इस पद पर रह चुके हैं। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रमोद कुमार मिश्रा को प्रधान सचिव नियुक्त किया। उनसे पहले नृपेंद्र मिश्रा इस पद पर थे। उन्हें मई 2014 में प्रधान सचिव नियुक्त किया गया था और वह पांच साल से अधिक समय तक इस पद पर रहे। 

 
इस प्रक्रिया में पीके मिश्रा पिछली लगभग आधी सदी में प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनने वाले 13वें व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिवों की सरकार में अहम भूमिका होती है। वे शासन-प्रशासन की जटिल दुनिया में प्रधानमंत्री की मदद करते हैं और साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि अफसरशाही तथा मंत्री सरकार की राजनीतिक और आर्थिक नीतियों को लागू करें। वे सलाहकार और कार्यकारी, दोनों भूमिका निभाते हैं। प्रधान सचिव का कार्यकाल इस बात का संकेत नहीं है कि सरकार में उसकी भूमिका कितनी कारगर रही है। टीकेए नायर सर्वाधिक समय (7 साल 4 महीने) तक इस पद पर रहे थे लेकिन उन्हें किसी कारगर भूमिका के लिए याद नहीं किया जा सकता है। लेकिन कम समय तक प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे कई लोगों ने सरकार के कामकाज पर प्रभाव डाला। हक्सर केवल 15 महीने इस पद पर रहे लेकिन इससे पहले वह चार साल प्रधानमंत्री के सचिव रहे थे। बीजी देशमुख ने आठ महीने राजीव गांधी और 12 महीने वीपी सिंह के साथ काम किया। 
 
हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी हैं जिन्होंने संबंधित सरकारों के कामकाज पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। इनमें पीसी एलेक्जेंडर, अमर नाथ वर्मा और ब्रजेश मिश्र शामिल थे। एलेक्जेंडर ने तीन साल आठ महीने तक इंदिरा गांधी के साथ काम किया। वर्मा करीब पांच साल पीवी नरसिंह राव के साथ रहे जबकि मिश्र छह साल और दो महीने अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े रहे। मिश्र राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी थे और सरकार पर उनका गहरा असर था।  इस पद पर रहने वाले अन्य लोगों में वी शंकर (दो साल और तीन महीने), एस के मिश्रा (छह महीने), टीआर सतीशचंद्रन (एक साल), एनएन वोहरा (आठ महीने) और पुलक चटर्जी (दो साल और सात महीने) शामिल हैं। 
 
प्रधान सचिवों की लंबी फेहरिस्त से साफ है कि प्रधानमंत्री इस पद पर वरिष्ठ अफसरशाह को नियुक्त कर अपने कार्यालय को मजबूत करना चाहते हैं। पिछले 50 साल में चरण सिंह को छोड़कर हर प्रधानमंत्री ने अपने कार्यालय में प्रधान सचिव नियुक्त किया।  मोरारजी देसाई भले ही सशक्त प्रधानमंत्री कार्यालय के आलोचक थे लेकिन उन्होंने भी वी शंकर को अपना प्रधान सचिव बनाया। उन्होंने जो कुछ बदलाव किया, वह सतही था। देसाई ने अपने कार्यालय का नाम बदल दिया। इंदिरा गांधी इसे प्रधानमंत्री सचिवालय (पीएमएस) कहती थीं लेकिन देसाई ने इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) नाम दिया। इंदिरा गांधी के पीएमएस में कर्मचारियों की संख्या 229 थी। देसाई ने पीएमओ में कर्मचारियों की संख्या घटाकर 211 कर दी। 2016 तक मोदी ने यह संख्या बढ़ाकर 397 कर दी। 
 
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए पीके मिश्रा पीएमओ में अपनी छाप कैसे छोड़ सकते हैं? दो कारणों से वह बेहतर स्थिति में हैं। पहला कारण यह है कि उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय में पांच साल तक काम करने का अनुभव है। इस दौरान वह प्रधानमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव रहे। वह हक्सर की तरह होंगे जो चार साल तक इंदिरा गांधी के सचिवालय में सचिव रहने के बाद प्रधान सचिव बने थे। पीके मिश्रा के लिए यह पद नया हो सकता है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में वह नए नहीं हैं और इस व्यवस्था से अच्छी तरह वाकिफ हैं। 
 
दूसरी वजह यह है कि अपने पूर्ववर्ती नृपेंद्र मिश्रा की तरह उन्हें अतिरिक्त प्रधान सचिव से नहीं निपटना होगा। नृपेंद्र मिश्रा को अपनी कुछ जिम्मेदारियां पीके मिश्रा के साथ साझा करनी पड़ती थीं। अफसरशाही में इसे शक्तियों को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।  मौजूदा व्यवस्था में संभव है कि नए प्रधान सचिव को कोई जिम्मेदारी साझा नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि अतिरिक्त प्रधान सचिव पद पर किसी को नियुक्त नहीं किया गया है। प्रदीप कुमार सिन्हा पीएमओ में हैं लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री का प्रधान सलाहकार बनाया गया है। अभी साफ नहीं है कि क्या पदनाम में बदलाव का मतलब प्रधान सचिव की शक्तियों को कमजोर करने से रोकना है।
 
इस परिभाषा के मुताबिक प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार की भूमिका अतिरिक्त प्रधान सचिव के समान नहीं हो सकती। प्रधान सचिव पीके मिश्रा और प्रधान सलाहकार पीके सिन्हा के साथ पीएमओ को एक नई व्यवस्था मिली है और यह निजाम पिछले पांच साल की तरह नहीं होगा। यह कैसे अलग होगा और क्या इससे पीएमओ की भूमिका ज्यादा कारगर होगी, यह तो आने वाला समय बताएगा।
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