बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक वृद्धि की क्षीण होती संभावनाएं
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आर्थिक वृद्धि की क्षीण होती संभावनाएं

शंकर आचार्य /  September 17, 2019

भारत के नीतिगत एवं संस्थागत अवरोधों को देखते हुए आर्थिक वृद्धि को मौजूदा स्तर से बढ़ा पाना खासा मुश्किल होगा। समस्या के संबंधित पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं शंकर आचार्य

 
आठ महीने पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित अपने लेख में मैंने वित्त वर्ष 2019-20 में आर्थिक वृद्धि सात फीसदी से भी नीचे, संभवत: छह फीसदी के आसपास रहने की आशंका जताई थी। उस समय कुछ अर्थशास्त्रियों ने मुझ पर अधिक निराशावादी होने का आरोप लगाया था। वजह यह थी कि इस वित्त वर्ष में वृद्धि दर के 7-8 फीसदी रहने के तमाम घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय अनुमान सामने आ रहे थे। जुलाई में पेश आर्थिक समीक्षा ने 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सात फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया जबकि आम बजट में वृद्धि दर के आठ फीसदी रहने की संभावना जताई गई थी। यहां तक कि अगस्त की शुरुआत में भी भारतीय रिजर्व बैंक ने वृद्धि दर के 6.9 फीसदी रहने का अधिक सटीक अनुमान जताया था। लेकिन पहली तिमाही में वृद्धि दर के पांच फीसदी ही रह जाने के आधिकारिक आंकड़े सामने आने के बाद पुराने अनुमान असंगत लगने लगे हैं। यहां तक कि छह फीसदी वृद्धि का मेरा पुराना अनुमान भी अब नामुमकिन लगने लगा है। विमर्श अब इस पर होने लगा है कि मंदी कहीं और मार तो नहीं डालने वाली है। यह दौर कब तक चलेगा और मध्यम अवधि में क्या संभावनाएं रह गई हैं? इन बिंदुओं पर मैं कुछ शुरुआती राय रख रहा हूं लेकिन आने वाले समय में इनमें बदलाव भी होगा।
 
इतना जरूर है कि अगली दो-तीन तिमाहियों में जीडीपी वृद्धि के सरकारी आंकड़े पांच फीसदी से भी नीचे रह सकते हैं। इसके पीछे तीन कारण हैं। पहला, हालिया समय में अमेरिका, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान को आर्थिक गतिविधियां शिथिल पडऩे का अहसास होने लगा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ), विश्व बैंक और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं 2019 और 2020 के लिए अपने वृद्धि अनुमानों को संशोधित करने में लगी हैं। व्यापार युद्ध के असर, अमेरिकी व्यापार विस्तार का दम फूलने और ब्रेक्सिट के मुश्किल क्रियान्वयन का खतरा होने से यह हो रहा है। सवाल है कि वैश्विक सुस्ती कब तक चलेगी और इसका असर कितना गहरा होगा? इन सवालों का फिलहाल कोई साफ जवाब नहीं है। 
 
दूसरा, घरेलू मोर्चे पर जून के बाद कंपनी आय, औद्योगिक उत्पादन, खरीद प्रबंधक, विदेश व्यापार, कर राजस्व, वित्तीय साख, वाहनों की बिक्री और सीमेंट खपत जैसे तमाम उच्च आवृत्ति संकेतक (एचएफआई) बिगड़ती स्थिति की तरफ ही इशारा कर रहे हैं। इन संकेतकों का असर वित्त वर्ष के बाकी महीनों में आधिकारिक जीडीपी अनुमानों में भी नजर आएगा, खासकर 2011-12 आधारित राष्ट्रीय आय शृंखलाओं की कमजोरी के चलते। 
 
तीसरा, सरकार के स्तर पर आर्थिक वृद्धि संकट गहराने की स्वीकारोक्ति काफी देर से हुई है और अभी तक नीतिगत प्रतिक्रिया भी एक हद तक दुविधापूर्ण है। लगभग दिशाहीन बजट और फिर कई घोषणाओं का पलटना इस पर मुहर लगाते हैं। इसी तरह का बेमतलब एवं संभवत: नुकसानदायक कदम सार्वजनिक बैंकों के विलय का भी है। 
 
मध्यम अवधि की संभावनाएं
 
वर्ष 2019-20 के बाद क्या होगा? क्या हम अगले पांच वर्षों में तीव्र आर्थिक वृद्धि देख पाएंगे? पांच साल पहले योजना आयोग भंग होने  के बाद से ही मध्यम अवधि की वृद्धि संभावनाएं एवं परिदृश्य तैयार कर पाने की संस्थागत क्षमता गायब हो चुकी है। गहरे मंथन के बगैर ही वर्ष 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पांच लाख करोड़ डॉलर कर देने का ऐलान कर दिया गया है। सुस्त पड़ती विश्व अर्थव्यवस्था के अलावा भारत के समक्ष कई संस्थागत एवं नीतिगत अवरोध भी हैं जो उसे 2003-11 का तीव्र वृद्धि वाला दौर वापस लाने से रोकते हैं। इनमें से कुछ अहम अवरोध इस तरह हैं:
 
वर्ष 2011 की तुलना में रोजगार परिदृश्य काफी खराब है। कामकाजी उम्र वाली जनसंख्या का आधे से भी कम हिस्सा इस समय काम कर रहा है या काम की तलाश में है। यह भारत की अब तक दर्ज सबसे कम श्रम भागीदारी दर है जो जी-20 देशों में भी सबसे कम है। यह स्थिति आपूर्ति के मोर्चे पर शिक्षा एवं कौशल के घटिया स्तर और मांग के मोर्चे पर जटिल एवं सख्त श्रम कानूनों एवं नियमों की दोहरी मार का नतीजा है। नई श्रम संहिता में न्यूनतम वेतन सीमा बढ़ाए जाने से औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सृजन की संभावना और भी कम हो सकती है। ऐसे में भारत अपना जनांकिकीय लाभांश गंवाता जा रहा है। 
 
विनिमय दर खासी बढ़ जाने से पिछले सात वर्षों में निर्यात ठहराव की स्थिति बन गई है और प्रतिस्पद्र्धा कर सकने वाला घरेलू उत्पादन हतोत्साहित हुआ है। इससे व्यापार और चालू खाते का घाटा बढ़ गया है जिसने भारत को कच्चे तेल के दाम और पूंजी प्रवाह में उठापटक के प्रति भारत को असुरक्षित बना दिया है। मुद्रा का अधिमूल्यन होने से गत दो वर्षों में संरक्षणवादी रवैया और सीमा शुल्क भी बढ़ा है। इसके अलावा क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसेप) जैसे क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के प्रति दुर्भावना भी जोर पकडऩे लगी है।
 
सार्वजनिक क्षेत्र के वर्चस्व वाली बैंकिंग प्रणाली गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का भारी बोझ बढऩे से तनावग्रस्त है जिससे नए कर्ज दे पाने की क्षमता घटी है। हालिया घटनाक्रम पर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की समस्या भारी पड़ रही है। एनबीएफसी क्षेत्र आईएलऐंडएफएस के धराशायी होने के बाद गहरे दबाव में है। कर्ज के बोझ से दबी कंपनियों की बैलेंस शीट भी नए निवेश को हतोत्साहित करती है।
 
उच्च राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक क्षेत्र की उधारी जरूरतों से भरे दशक में ब्याज दरें चढ़ गईं और निजी निवेश को निकाल बाहर किया। संकीर्ण राजस्व आधार और लोकलुभावन कार्यक्रमों पर खर्च की बढ़ती मांग को देखते हुए राजकोषीय शिथिलता वाला रुख आगे भी जारी रहने की संभावना है।
 
कृषि विपणन का ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और खाद्यान्नों के कीमत निर्धारण, खरीद, भंडारण एवं वितरण की सार्वजनिक प्रणाली भी बेहद महंगी एवं अक्षम साबित हो चुकी है। खाद्य, उर्वरक एवं सिंचाई जल पर भारी सब्सिडी दिए जाने से उत्पादक एवं ग्रामीण आधारभूत ढांचा सार्वजनिक निवेश से वंचित रह जाता है। कृषि क्षेत्र पानी की किल्लत और जलवायु परिवर्तन की वजह से भी मुश्किलों का सामना कर रहा है।
 
ढांचागत सेवाएं अपेक्षाकृत कमजोर एवं अक्षम हैं। सरकारी नियंत्रण वाली अधिकांश बिजली वितरण कंपनियों का घाटे में चलना इसका एक उदाहरण है। बिजली कंपनियां कृषि एवं अन्य विशेषाधिकार-प्राप्त उपभोक्ता समूहों को दी जाने वाली भारी सब्सिडी और परिचालन कमजोरियों से जूझ रही हैं।
 
औपनिवेशिक विरासत वाली अफसरशाही का जटिल, निरंकुश एवं उदासीन ढांचा आर्थिक गतिविधियों पर गहरा असर डालता है। प्रशासनिक निर्णय-निर्माण के प्रति बढ़ता केंद्रीकृत रवैया समस्या को और भी गंभीर बना रहा है।
 
न्यायिक प्रणाली एवं पुलिस संसाधनों की भारी कमी से जूझ रही हैं और गहरे दबाव में है। इससे कानून व्यवस्था कमजोर हुई है और वाणिज्यिक अनुबंधों का अनुपालन भी प्रभावित हुआ है।
 
नीतिगत एवं संस्थागत अवरोधों की इस चुनौतीपूर्ण पृष्ठभूमि में भारत के लिए आर्थिक वृद्धि को मौजूदा स्तर से बहुत अधिक बढ़ा पाना मुश्किल होगा। भविष्य को लेकर अंतर्निहित अनिश्चितता होने से अगले पांच वर्षों में जीडीपी की औसत वृद्धि दर 5-6 फीसदी दायरे में ही बनी रह सकती है। इतनी कम वृद्धि दर के रोजगार सृजन, अंतर-क्षेत्रीय असमता, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक तनाव के अलावा घरेलू एवं बाहरी सुरक्षा और भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर व्यापक एवं नकारात्मक निहितार्थ होंगे।
 
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: india, china, economy, trade,,
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