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अर्थशास्त्रियों की काबिलियत के मुताबिक मिले पद

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 16, 2019

वर्ष 2014 से मोदी सरकार की जिन तमाम कदमों के लिए आलोचना की जाती रही है उनमें से एक है अर्थशास्त्रियों में सरकार की रुचि न होना। परंतु अगर आप एक दशक पीछे जाएंगे, तब भी आपको यही दिक्कत नजर आएगी। न तो संप्रग सरकार ने और न ही मोदी सरकार ने अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति और काम को बहुत अधिक तवज्जो दी है। इस लिहाज से देखें तो दो किस्म की नियुक्तियां बहुत मायने रखती हैं, बशर्ते कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी इन्हें मायने रखने दें। एक पद है मुख्य आर्थिक सलाहकार का और दूसरा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) में आर्थिक मामलों के प्रभारी डिप्टी गवर्नर का। इन पदों पर बैठे लोगों को कुछ खास चीजों की चिंता करने के लिए वेतन मिलता है लेकिन अगर ये लोग गलत चीजों के बारे में चिंता करने लगें तो?

 
उदाहरण के लिए समाचार पत्रों की कार्यशैली पर बात करें तो यहां संपादन करने वालों को समाचार संकलन को लेकर चिंतित नहीं होने दिया जाता है और समाचार जुटाने वाले संपादन की चिंता नहीं करते। संपादकीय टीम का कोई भी सदस्य अगर समाचार संकलन करने वाले से सवाल जवाब करता है तो उसे तत्काल बता दिया जाता है कि यह गलत है। इसका उलटा भी उतना ही सही है। बहरहाल, सरकार के सलाहकार पदों की बात करें तो वहां यह बुनियादी नियम लागू नहीं होता है। ऐसा लगता है कि आईएएस अधिकारी काबिज हो चुके हैं। अगर सीवी (आत्म विवरण) बहुत प्रभावशाली है तो विशेषज्ञता कतई मायने ही नहीं रखते। मुझे नहीं पता कि हॉर्वर्ड की पीएचडी के अलावा अरविंद विरमानी की काबिलियत क्या थी लेकिन वह लंबे समय तक सरकार में काम करते रहे। उनके पूर्ववर्ती अशोक लाहिड़ी प्रशिक्षित अर्थमितिज्ञ थे। यानी उन्हें अर्थशास्त्र में आंकड़ों, आर्थिक मॉडलों, सांख्यिकी आदि का इस्तेमाल करने और नतीजे हासिल करने में महारत हासिल थी।
 
अर्थशास्त्री : कौशिक बसु मूलतया सिद्धांतकार थे। इतना ही नहीं वह सन 1993 से ही विदेश में रह रहे थे। इससे पहले उन्होंने कभी सरकार में काम भी नहीं किया था। स्वाभाविक सी बात है कि उनमें दो कमियां थीं। रघुराम राजन एक इंजीनियर थे जो भटकते हुए अर्थशास्त्र में आ गए। उनकी विशेषज्ञता वित्त में थी। अरविंद सुब्रमण्यन एक व्यापार अर्थशास्त्री थे। सरकार और देश की आर्थिक दिक्कतों को लेकर उनका रुख भी उन्हें सौंपे गए पद के अनुरूप नहीं था। इन अर्थशास्त्रियों, खासकर अंतिम तीन के बीच एक दशक बीतने के बाद हमें यह प्रश्न करने का अधिकार बनता है कि उनका योगदान क्या रहा? उनका सीवी तो इससे मजबूत हुआ लेकिन बदले में सरकार को क्या मिला?
 
वे भला योगदान कर भी कैसे सकते थे जबकि उनके पास जो जहाज थे, उसे सरकारी नीति के समुद्र को पार करना होता था। उपरोक्त तीनों अर्थशास्त्री अब अमेरिका में विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपने काम पर लौट गए हैं और अकादमिक अर्थशास्त्र में व्यस्त हो गए हैं। हम उनकी बौद्धिकता को चाहे जितना भी मान दे दें, आईएएस अधिकारी उन्हें कतई गंभीरता से नहीं लेते, बल्कि कई बार तो वे उन्हें परेशानी खड़ा करने वाला ही मानते  रहे। यहां तक कि मौजूदा मुख्य आर्थिक सलाहकार भी वित्तीय क्षेत्र के व्यक्ति हैं। अंतत: वे भी अकादमिक जगत में लौट जाएंगे। उनका सीवी भी मजबूत हो चुका होगा। ऐसे में मेरे पास एक सुझाव है: देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार पद पर आवेदन करने वालों के लिए कम से कम 10 वर्ष की शासकीय सेवा अनिवार्य हो। वर्ष 2004 तक कमोबेश ऐसा ही होता भी आया था। भले ही यह अवधि 10 वर्ष नहीं हो लेकिन फिर भी यह एक उल्लेखनीय आंकड़ा होना चाहिए। चाहे जो भी हो बाहर से अर्थशास्त्री लाने का चलन समाप्त होना चाहिए। यह मौजूदा व्यवस्था करदाताओं के पैसे को नुकसान पहुंचाने के सिवा कुछ नहीं है। 
 
सरकार की तरह आरबीआई भी ढेर सारे अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति करती है। सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार उनका प्रमुख होता है और आरबीआई में यह जवाबदेही अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षता करने वाले डिप्टी गवर्नर की होती है। वर्ष 2009 के बाद से देखा जाए तो केवल सुबीर गोकर्ण को ही पर्याप्त भारतीय अनुभव था। परंतु वह भी मौद्रिक या वित्त क्षेत्र से ताल्लुक नहीं रखते थे जबकि उनके काम के लिए यह आवश्यक था। वह मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में अधिक उपयुक्त होते। इसके बाद ऊर्जित पटेल आए। उनकी विशेषज्ञता भी मौद्रिक अर्थशास्त्र में नहीं थी। हालांकि वह सन 1990 के दशक में आरबीआई में बतौर सलाहकार काम कर चुके थे। तमाम बौद्धिक क्षमता के बावजूद उन्हें आरबीआई में शोध विभाग के नेतृत्व का अवसर नहीं मिला। उनका स्थान विरल आचार्य ने लिया। मेरी दृष्टि में उनकी विशेषज्ञता भी भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के लिए ज्यादा थी। अब आरबीआई को उनका उत्तराधिकारी तलाशना है और मेरा सुझाव है कि उसे अपने शोध विभाग पर ही दृष्टि डालनी चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे 1996 में एसएस तारापोर की सेवानिवृत्ति तक वह करता आया है।
 
क्या किया जाना है? : मुझे लगता है कि सरकार को एक काडर तैयार करना चाहिए जो तेजी से काम करने में सक्षम हो। इस पैनल में 40 से 50 की उम्र के अर्थशास्त्रियों को स्थान मिलना चाहिए। आरबीआई के साथ-साथ आर्थिक सेवा के अर्थशास्त्रियों को इसके आवेदन की अर्हता होनी चाहिए। इसके अलावा किसी को इसमें शामिल होने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। खासतौर पर आईएएस, आईएफएस अधिकारियों को तो कतई नहीं। एक बार काडर तैयार होने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार और डिप्टी गवर्नर का चयन इसमें से ही किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योङ्क्षक अगर आपको पता ही नहीं होगा कि आप किसके लिए काम कर रहे हैं तो आपकी उपयोगिता (जैसा कि एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने हाल ही में कहा भी)आर्थिक समीक्षा के संपादक से ज्यादा नहीं रह जाएगी। हालांकि उसके लिए भी अलग किस्म के कौशल की आवश्यकता होती है।
Keyword: india, economy, GDP,,
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